बांगड़ूनामा

वाल्मीकि उवाच- योगेन्द्र दत्त शर्मा

अक्टूबर 24, 2018 ओये बांगड़ू

अभिशाप मेरे साथ यह कैसा हुड़ा, तमसा नदी!

फिर एक जोड़ा क्रौंच का बिछुड़ा, घिरा तम-सा, नदी!

यह क्या घटा फिर दृष्टियों के सामने

कोई न आया इस प्रलय को थामने

कैसी रची यह सूर्यवंशी राम ने दारुण कथा,

क्यों टूटकर अंबर अभी गिरता नहीं

यह थरथराता-सा समय थिरता नहीं

मन में उमड़ता मेघ यों घिरता नहीं क्या अन्यथा;

 

पर क्या करूं, आघात यह मन पर हुआ सहसा, नदी!

 

वह श्लोक पहला था हृदय का आर्त स्वर

उस शोक-विह्वल क्रौंच-स्वर की गूंज-भर

देखा गया मुझसे न व्याकुल पंखधर मरता हुआ,

वह श्लोक मर्माक्रांत भावावेग था

मेरे हृदय का फूटता उद्वेग था

झुलसे हुए मरु-प्रांत में वह मेघ था झरता हुआ;

 

तुम आदि कवि कहतीं, मगर मैं सिर्फ माध्यम था, नदी!

 

यह श्लोक अंतिम भी उसी दुख में पगा

आपाद मस्तक विरह के रंग में रंगा

अभिशप्त संध्या में भटकते सामगानों-सा विकल,

यह श्लोक विरही राम का अवसाद है

यह जानकी की भूमि-धंसती याद है

यह शेष, मर्यादा-पुरुष का स्वाद है कड़वा-गरल;

 

यह है नियति की क्रूरता का मौन विभ्रम-सा, नदी!

 

धरती फटी, सीता समाई गर्भ में

पर प्रश्न उभरे, इस करुण संदर्भ में,

तीखी अनी-से चुभ रहे जो मर्म में अतलांत तक,

क्या लोक-मर्यादा समय की प्यास है

जिसमें समता दृष्टि का इतिहास है

या वंचनाओं का विकट परिहास है सीमांत तक;

 

क्या यह न टूटेगा कभी उन्मत्त दुष्क्रम-सा, नदी!

 

क्या सिर्फ सीता के लिए था अग्नि-पथ

निर्वास, निष्कासन, परीक्षाएं अकथ

पिसना सहज मन-का नियति के क्रूर रथचक्रों-तले,

यह अंत गाथा का विसंगत, कारुणिक

सुख का मलय-झोंका मिला, लेकिन क्षणिक

सीता-वियोगी राम के आदर्श निकले खोखले;

 

साक्षी न कोई अन्य यह हतभाग आश्रम था, नदी!

 

थे राम विजड़ित, शून्यचित, खंडित हृदय

बोले-‘धरित्री! व्योम! ओ मेरे समय!

निष्काम माटी! बोल, क्या इस दिग्विजय का अर्थ है?

मैं भी हतप्रभ-सा खड़ा यह देखता

हैं राम निष्प्रभ, जानकी अस्तंगता

यह शोक-विह्वल मन स्वयं को मानता असमर्थ है;

 

फिर क्रौंच-क्रंदन कान में गूंजा, हुआ भ्रम-सा, नदी!

मूर्च्छित समय के दंश से मैं भी हुआ, तमसा नदी!

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