बांगड़ूनामा

उर्स ए पिथौरागढ़ भाग 5

फरवरी 5, 2018 Girish Lohni

हरकवा मासाप

शाम के सात बजे घर पहुचते ही प्रदीप किताब की पौलोथीन पटकता हुआ बोला

नी जाउंगा आज से में हरकवा मासाब के यहाँ इंग्लिश पढ़ने. पढ़ाता लिखाता है नि अपने लौन्डे की गप्प सुनाता रहता है.

प्रदीप ने अपनी बात पूरी कही भी नहीं थी की ना जाने कहाँ से बिजली की रफ्तार से उसके गाल पर रैपटा पड़ चुका था रैपटा इतना जोर का था कि अगला उसने बस ये सुना

.. है लौन्डे.

प्रदीप ने सामने देखा जोशी मासापा गुस्से में तमतमाए खड़े थे

बताओ कहा से सीखा ये शब्द.

जोशी मासाप की जोर की आवाज ने दो कमरों के मकान से परिवार के सभी सदस्यों को बाहर के कमरे में जमा कर दिया. अगले आधे घन्टे जोशी मासाप का लौन्डे और संस्कार पर व्याख्यान जारी रहा. बाकी का पूरा परिवार लगभग सावधान की मुद्रा में कभी जोशी मासाप का तो कभी प्रदीप का तो कभी आपस में एक दुसरे का मुख तांकता रहा.

आज के बाद ऐसे शब्द सुने तो घर से निकाल दूंगा. 

निकालो अपनी किताब सब के आदिकालीन नारे के साथ जोशी मासाप का लौन्डे और संस्कार पर व्यख्यान समाप्त हुआ.

जोशी मासाप के व्याख्यान के बाद घर का सबसे छोटा होने के दंड स्वरूप अगले एक घन्टे लोन्डे, संस्कार और पिताजी की इज्जत पर फुस-फुसाहटी व्याख्यान प्रदीप को मिलाता रहा और प्रदीप की हराकवा मासाप के यहाँ पढ़ने न जाने की बात लोन्डे नामक असंस्कारी शब्द के भारी दबाव के तले दबी रह गयी.

हरकवा मासाप इंग्लिश के बड़े प्रकांड विद्वान थे किवदंतियो के अनुसार मोराजी देसाई की सरकार के दौरान पिथौरागढ़ के तत्कालीन डीएम को केंद्र को सीधी चिट्ठी लिखनी थी तो उसने हरकवा मासाव की मदद ली. यही कारण है कि बाद में हरकवा मासाप के घर पास ही कलेक्ट्रेट खोला गया.

वैसे हरकवा मासाब हुये जीआईसी स्कूल में इंग्लिश के मासाप. सरकारी कागज़ में ये हुए हाईस्कूल को पढ़ाने वाले मासाप. जहाँ दुर्गम-सुगम के जनजाल में उत्तराखंड बनने के बाद दस साल तक भी इंटर में राज्य के सरकारी स्कूलो में इंग्लिश पढ़ा सकने वाले राज्य में गिनती के मासाप इतिहास में दर्ज हैं फिर उस जमाने में तो इंग्लिश पढ़ाने वालों का अकाल ही हुआ. ऐसे में हरकवा मासाप के ही जिम्मे आये ग्यारहवीं और बारहवी के लौन्डे.

हरकवा मासाप का मानना था कि सरकार तो इन ढ़न्टो को पढ़ाने का अतिरिक्त पैसा देने से रही इसलिये ग्यारहवीं बारहवी दोनों के बच्चों को दिन में एक-एक पीरियड हकाने की वसूली ग्यारहवी के बच्चों से की जानी चाहिये. अपने मानने के अनुसार हरकवा मासाप ने ग्यारहवीं के प्रत्येक बच्चे का अंग्रेजी का टयूसन सत्तर रुपये मासिक की दर पर अपने यहां अनिवार्य कर दिया. जो लौंन्डा हरकवा मासाप के दरबार में ना आये उसे स्कूल रजिस्टर में लाल गोले के निशान में रखा जाता. जिसका मतलब था बेटे अब तुमको किसी का बाप भी ग्यारहवी पास नहीं करवा सकता कम से कम इस साल तो नहीं दूसरा इस स्कूल से तो बिलकुल ही नहीं.

जीआईसी के ग्यारवी के बच्चों के लिये हरकवा मासाप का दरबार शाम साढ़े चार बजे से लगता था. दरबार में सप्ताह में एक बार हाजिरी अनिवार्य थी लेकिन मासिक 70 रुपये दिये जाने अनिवार्य थे. किवदंतियो के अनुसार हरकवा मासाप ने अपने बडे लौन्डे तक से ग्याहरवी में अंग्रेजी के पैसे वसूले थे. सरकारी शिक्षा पर पूर्ण विश्वास के चलते छोटा लौन्डा प्राईवेट स्कूल में भर्ती करा दिया गया था. हालांकि यह विश्वास आंशिक था क्योंकि हरकवा मासाप की सबसे छोटी बेटी अभी भी बाल अप्सरा स्कूल में ही पढ़ती थी.

हरकवा मासाप स्कूल में पढ़ाने से तो रहे लेकिन महिने के 70 रुपये की वसूली के बाद घर बुलाकर मासाप पहले तो पंद्रह मिनट की देरी से आयें और उसके बाद के पहले पंद्रह मिनट अ‍पने लखनऊ वाले भाई की शान में कसीदे पढ़कर पिथौरागढ़ को और यहाँ के लोगों को क्रमशःनिक्रिष्ट और निपट मूर्ख सिद्ध करने में लगाते. अगले पंद्रह मिनट देहरादून गये अपने लौन्डे के कालेज कैम्पस की चका-चौध तो कभी लौन्डे की जिम सामाग्री का ज्ञान बखारे. कहा जाता है कि पिथौरागढ़ का पहला जिम भी हरकवा मासाप के प्रवचनों से प्रभावित उनके ही किसी प्रताड़ित शिष्य ने खोला था.

हरकवा मासाप के इस बैच का अंत उनको भीतर से चाय के लिये लगने वाली आवाज के साथ हुआ करता था. हरकवा मासाप बीस मिनट बाद चाय पीकर बाहर निकलते और पांच मिनट एकस्ट्रा पढ़ाने के घमण्ड के साथ कहते अपने लौन्डे हो तब पांच मिनट ज्यादा देता हूँ अब निकलो यहां से. हालांकि हरकवा मासाप के यहां दो अन्य बैच चलते थे एक जीआईसी के अलावा स्कूल के लौन्डो के लिये दूसरा बाल अप्सरा विद्यालय की बाल अप्सराओ के लिये.  कहा जाता था कि पिथौरागढ़ में न तो कोई  हरकवा मासाप जैसी इंग्लिश कोई जानता था न ही हरकवा मासाप जैसा अनुशासित कोई अन्य था.

हरकवा मासाब की अनुशासन-प्रियता उन्हें वंशानुगत रुप से मिली थी. उनके पिताजी अंग्रेजी सेना से हवलदार रिटायर थे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब दक्षिण पूर्वी एशियाई हिस्से में जापानी सेना हावी थी तब एक रात बर्मा के पास जापानी सेना ने अचानक ब्रिटिश कैम्प पर हमला कर दिया. कैम्प में तत्कालीन ब्रिटिश सेना के सर्वोच्च सेनापति कमांडर-इन-चीफ वैवेल सोये हुये थे. अपने अति-आत्मविश्वास के लिये प्रसिद्ध कमांडर-इन-चीफ वैवेल को रंगून के कैम्प से एरावदी नदी के किनारे-किनारे मणिपुर बार्डर के रास्ते ब्रह्मपुत्र के सदिया के मैदानों तक बिना रुके अपने कंधे में अकेले बोक कर लाये हरकवा मासाब के पिताजी. इस अचानक हमले में अपनी जान बचाकर निकलने के कारण बाद में वैवेल भारत के वायसराय बने और हरकवा मासाब के पिताजी हवलदार. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंगरेजों द्वारा आजाद हिन्द फौज के सैनिको पर मुक़दमा दायर किये जाने के विरोध में हरकवा मासाप के पिताजी ने ब्रिटिश शाही सेना से इस्तीफा दे दिया. हरकवा मासाप की माने तो पिताजी के इस्तीफे के चलते ही बाद में वेवैल को वायसराय के पद से बर्खास्त कर दिया गया था.

जारी..

इससे पहले प्रदीप कौन था कहाँ से आया था क्यों ये सब हुआ जैसे प्रश्न मन में आ रहे हो और आप इस श्रंखला से नए नए जुड़े हों तो ये रहा पिछ्ला अंक

उर्स ए पिथौरागढ़ भाग 4

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *