बांगड़ूनामा

उर्स ए पिथौरागढ़ भाग 4

जनवरी 31, 2018 Girish Lohni

बिन घन्टे का घन्टाकरण

अगला दिन प्रदीप के लिए उतना ही सूखा रहा जितना की और कोई. एकबार महर्षि विद्या मंदिर के पीछे से निकलते हुए उसे शरीर में जरुर झुर-झुरी जैसी हुई जिसे उसने अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ टाल दिया. माँ ने देर शाम सबकी उपस्थिति में आँखों से बेटे से कुछ सवाल किये थे जिसका जवाब सब कुछ सही होने के रूप में बेटे ने आँखों से ही दे दिया था.

तीन बड़े सामान्य दिन के बाद चौथी सुबह जब प्रदीप पहले टूसन से दूसरे की दौड़ में बीती रात गणित में एक्स का मान गलत आने के गहन चिंतन में मसगूल था कि महर्षि विद्या मंदिर के पीछे की पतली पगडंडी पर होने वाली फुसफुसाहट ने उसकी गति कम कर दी.

“तू कोअ तू कोअ” की फुसफुसाहट को डर से दबे पाँव चल रहे प्रदीप ने बिना सांस छोड़े पार कर लिया. इससे पहले की वो अपनी ग्यारह नंबर की गाड़ी में दूसरा गेयर डालता महिन लेकिन मोटी आवाज में प्रियंका ने कहा

ए सुन तो रे..

आवाज कान में पड़ी और प्रदीप वोल्ट की रफतार में भाग गया. अचानक सुबह के शांत माहौल में तीन अवाजे गुजने लगी. पहली प्रदीप के भागने से चप्पलों की टप-टप के साथ पौलोथीन की पन्नी की कड़कड़. दूसरी उसके भागने से लडकियों की खिल-खिलयाट और इन दोनो से गंगोलीहाट के पन्तजी के कुत्ते का भौकना. प्रदीप का दिन तो जैसे-तैसे गुजरा लेकिन शाम की शुरुआत घंटाकरण के तिराहे में प्यार की पहली दुर्घटना से हुई.

घंटाकरण जिसका घंटा पिथौरागढ़ की पिछली तीन पीड़ियों में शायद ही किसी ने देखा हो. सालों से पिथौरागढ़ का एक प्रमुख स्थान रहा है. नई पीढी को आज पढाई के गुर सिखाने वाली पुरानी पीढ़ी ने भी स्कूल के दिनो में यहाँ एक-तरफे प्यार के फ़िल्मी गुल खिलाये हैं. हालाँकि फ़िल्मी अंजाम तक उंगली में गिने जाने लायक प्यार ही कायदे से अंजाम तक पहुंचे बाकि अधूरे किस्सों में बदल गये.

इन दिनों भी घंटाकरण की ये तीन सड़के आज की तरह ही जाती थी. एक जाती थी पिथौरागढ़ के पैरासीटामोल वितरण केंद्र रूपी जिला अस्पताल को. जहाँ इन दिनों जिला अस्पताल में मरीज केवल किसी दुर्घटना में हाथ पैर सिर टूटने-फूटने और पिथौरागढ़ के घरेलू रोग दांत के दर्द होने ही पर ही घुसता था बाकि बीमारियों का इलाज देबताओ के हाथ में था. सत्तर वें दशक के अंतिम वर्षों में जब इंदिरा गांधी पिथौरागढ़ की गरीब-भूखे-नंगे लोगों वाली जगह की तस्वीर अपने दिमाग में लिये चुनाव प्रचार के लिये एक खादी की धोती लपेटे पिथौरागढ़ में आई तो पिथौरागढ़ की महिलाओं के सोने के गहने देख गंभीर ज्वर से पीड़ित हो गयी. असुर देवता के थान के धामी की द्वारा इंदिरा गांधी को हैलीकाप्टर में चढ़ने से पूर्व लगाई गयी एक फूंक टिक्का का असर यह रहा की दिल्ली पहुँचने से पूर्व उनका ज्वर पूरी तरह टूट गया और उन्हें आजीवन ज्वर की शिकायत नहीं रही. रॉ ऐजेंसी की मानें तो इसके बाद इंदिरा ने एक बकरी के पैसे स्थानीय युवा कांग्रेसी नेता को दिये थे जिसने उन पैसों को स्वयं के शिकार-भात और रम के भोग में प्रयोग किया. स्थानीय ऐतिहासिक पुस्तकों के अनुसार उसकी इस गलती के प्रकोप के कारण ही इंदिरा गाँधी को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

खैर लगभग दस फीट चौड़ी तीन इंच उंचीं अस्पताल की सत्ताईस सीढ़ियाँ प्रत्येक मरीज के भव्य स्वागत को हमेशा तैयार रहती थी. जल संस्थान के सरकारी पाईप के बने दो से तीन स्ट्रेचर अस्पताल के मुख्य द्वारपाल के रुप में हमेशा सीढ़ियों के बाद लगने वाले काले भव्य गेट से लगे मिल जाते थे. सरकारी कागजों में जमसेदपुरी इस्पात और बर्मा की प्लाई से बनी तीन सौ अठाईस पलंग वाले इस अस्पताल में तब कुल तैतालीस पलंग हुआ करती थी. जल संस्थान और विद्युत विभाग के सामूहिक प्रयास से इन पलंगों को खास मजबूती दी गयी थी.  आपरेशन थियेटर की खास उपर-नीचे होने में सक्षम अस्पताल की एकमात्र पलंग को मिलाकर चौवालीस हो जाती थी.  चिरकाल से बने हल्के गुलाबी रंग में रंगी अस्पताल की बाहरी दीवारों पर कुत्ते समेत आदमियों के मुतने की परम्परा वर्षो पुरानी थी. इसी कारण ब्रिटिश कालीन साक्ष्यो में अस्पताल के सामने से गुजरने वाली यह सड़क चुरैन सड़क के रुप में दर्ज है.

दूसरी सड़क आज के पिथौरागढ़ के कनौट प्लेस बन चुके सिमलगैर को जाती थी हालाँकि तब इसे पोस्ट आफिस वाली सड़क के नाम से जाना जाता था.

सड़क के एक तरफ किले के आकार का लकड़ी का बना जनसंख्या अनुसार जिला घोषित किये जाने लायक पुनेठा भवन था तो दूसरी तरफ पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त की ढाई किलो के हाथ व पाव भर की छड़ी वाली मूर्ति. पंडित जी की मूर्ति में साल में कुल तीन बार गेंदे के फूलों वाली मालाये बदली जाती थी. एक पंद्रह अगस्त को, दूसरा छब्बीस जनवरी, तीसरा उनके बड्डे पर. बड्डे स्पेशल को स्माल रूम बिग बालकनी साईज के बड़े से पंडित गोविन्द वल्लभ पार्क की सफाई का जिम्मा भी उठाया जाता था. 1937 में संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद पण्डित गोविंद वल्लभ पंत ने शपथ से पूर्व घण्टाकरण शिव मंदिर में जागर का आयोजन कराया गया. कहा जाता है कि इस जागर में एक स्थानीय कांग्रेसी कार्यकर्ता के शरीर में लाला लाजपतराय जी भी आये. साईमन कमीशन के विरोध में जहां लाला लाजपतराय जी ने अपनी जान गंवाई वही पण्डित गोविन्द गोविन्द वल्लभ पंत ने अपने माथे का पुटका पाया था. स्थानीय इतिहास में कहा जाता है कि बोल-बचन के दौरान दोनों के मध्य बहस हुई. प्रारम्भ में लाला लाजपतराय ने कांग्रेस के चुनाव जीत कर अँगरेजों के अधीन सरकार बनाने की तीव्र आलोचना की गई लेकिन जल्द ही पण्डित गोविन्द पंत से अपनी मृदुभाषीता से लाला साहब को यकीन दिला दिया की उनकी सरकार अँगरेजों के ताबूत में आखिरी कील होगी. लाला साहब की आत्मा ने अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष इसी क्षेत्र में गुजारे.

तीसरी सड़क जाती थी बाल-अप्सरा लोक की ओर. बालों में लाल-हरे-काले रिब्बन लगाये मनमोहक सफ़ेद दुपट्टे और हरी सलवार के विश्व स्तरीय लुप्तप्राय काम्बिनेशन में स्कूल को आने-जाने वाली कन्याये भी मन ही मन जानती थी कि वो किसी अप्सरा से कम भी नहीं हैं. चिरकाल से लडकियों के मन की बात जान लेने की जन्मजात प्रतिभा लिए जन्मे पिथौरागढ़ी लौंडो ने ही इस सड़क को बाल-अप्सरा सड़क और जीजीआईसी स्कूल को बाल-अप्सरा लोक नाम दिया था.

ख़ैर घन्टाकरण से लोक अप्सरा सड़क की ओर जाने पर खड़ककोट जाने वाली पगडंडी पर ही तल्ली जाखपूरान के भट्टजी के मकान में किराये पर ही जोशी मासाप का परिवार पिछले 18 सालों से रहता था. ये जोशी मासाप का परताप ही था कि बाल अप्सरा सड़क के दो सौ मीटर की दूरी में रहने के बादजूद प्रदीप के दसवी में नवासी  दसमलव तीन आठ प्रतिशत आये थे.

पर आज शाम अंग्रेजी के टयूशन की दौड़ में प्रदीप दुर्घटना का शिकार हो गया. प्रदीप खड़कोट वाली पगडण्डी से बाहर निकला ही था कि उसे उसी महीन लेकिन मोटी आवाज में सुनाई दिया

ओ बेटे की.. ए उरमिल्ला वो वाला लहड़का धेख..

कौन-सा, कौन-सा.. अरे वई है ये तो. ओ ईजा करने वाला

( लडकियों की सामूहिक खिल-खिलयाट )

जारी..

इससे पहले प्रदीप कौन था कहाँ से आया था क्यों ये सब हुआ जैसे प्रश्न मन में आ रहे हो और आप इस श्रंखला से नए नए जुड़े हों तो ये रहा पिछ्ला अंक

उर्स ए पिथौरागढ़ भाग 3

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