बांगड़ूनामा

उर्स-ए-पिथौरागढ़ भाग 2

जनवरी 6, 2018 Girish Lohni

मुलाकात का पंच 

वाकिया कुमौड़ से आरा मशीन को जाने वाले पतले पगडंडी वाले रास्ते का हैं. इस पूरे रास्ते में तब आज की तरह मकानों की कतार के बजाय कुल मिलाकर चार घर, टिन की छत से ढ़का एक अंग्रेजी मीडियम महर्षि स्कूल, स्कूल के पीछे साल के पेड़ो का जंगल और बीच में सिचाई विभाग के सरकारी कमरे हुआ करते थे. कुल मिलाकर देश और काल के अनुसार अपने आप में एक सुनसान रास्ता.

जिसने अपनी ही कई सारी भूतिया कहानी गढ़ रखी थी. जिसके चलते महिलाओं का इस रास्ते पर अकेले जाना खतरे से खाली नहीं माना जाता था वहीँ मर्दों के लिए अकेले अँधेरे में रास्ते से गुजरना भले ही बंद दरवाजा फिल्म देखने पर मिलने वाला मर्दानगी का ऑल इंडिया मान्यता प्राप्त क्लासिफाईड सर्टिफिकेट न दिलाता हो लेकिन शहर में मर्दानगी का एक स्थानीय तमगा जरुर दिला देता था.

कहने को ये रास्ता कुमौड़ से रोडवेज जाने के लिए सार्टकर्ट माना जाता था पर असल में ये सड़क के रास्ते से थोड़ा लम्बा और अधिक थकान भरा हुआ करता था. रास्ते पर अति भीषण दो मुख्य पड़ाव थे. पहला पुराने महर्षि स्कूल से पीछे पड़ने वाला साल के पेड़ो का जंगल. जगह का नामकरण ही पेड़ो के नाम पर सल्याडी हुआ. ढेढ मिनट के सल्याड़ी के इस पड़ाव को खत्म करने पर आपको वही अनुभूति होगी जो उस समय कैसेट वाले कौनट्रा में अकेले अंतिम मशीन फोडने पर होती थी.

दूसरा पड़ाव सिचाई कलौनी के सरकारी कमरे खत्म होने के बाद झाड़ियों वाले जंगल के साथ हुआ करता था. अंधेरे में अजीबो-गरीब आकार ले लेने वाली इन झाड़िओ में अधिकतर पगडंडी की ओर झुकी रहती थी जिसमें अचानक से होने वाली जरा सी सर-सराहट किसी भी साबूकाय व्यक्ति की त्वचा और आँखों के अलावा शरीर के अन्य हिस्से से भी पानी निकालने को काफी थी. एक से ढेढ़ मिनट के इस पड़ाव को पार करने पर निश्चित ही प्रिन्स की कैसेट के बारवें लेवेल में कंकाल को मारने पर मिलने वाली अनूभुति मिलना लाज्मी था.

प्रदीप भी सार्टकट के इस फेर में हर सुबह इसी रास्ते अपने एक ट्यूसन से दूसरे ट्यूशन के दिन के दो फेरे इसी रास्ते से लगाता था. पहला घुप अंधेरे में दूसरा हल्की दूधिया रोशनी में. चार बेटियों के बाद बड़े सारे देवी-देवताओं के मंदिर साख-घांट चढ़ाने और कई एक जागर के लगाने के बाद जोशी मासाप को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी. जिसके चलते जोशी मासाप की घरवाली ने अपने लाड़ले को कभी किसी चीज की कमी न होने दी. फिर चाहे वो उस दौर का परम तिलसमी युवा शान पर चार चांद लगाने वाला वाकमैन ही क्यों न हो या उससे बढ़कर काले रंग का कान में घुसेड़ने वाला हेडफोन कहा जाने वाला इयरफोन ही हो. प्रदीप के पास घर पर सब मौजूद था.

हालाँकि मॉ के इस अतिरिक्त लाड़ का अब तक प्रदीप पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ा था. जोशी मासाप के अनुशासन और बड़ी बहन के कड़े मार्गदर्शन ने प्रदीप को माँ के अतिरिक्त लाड़ का विपरीत प्रभाव से बचाकर रखा. पिता के अनुशासन और बड़ी बहन के मार्गदर्शन का ही प्रभाव था कि संगीत प्रेमी प्रदीप कभी अपने साथ टूयसन को वाकमैन ले न जा सका. हालांकि कान में घुसेडे जाने वाला हैडफोन वाला इयरफोन ले जाने की उसे खुली छुट थी.

उर्स-ए-पिथौरागढ़

हर दिन की तरह कान में बेमतलब हैडफोन वाले इयरफोन घुसेडे प्रदीप कुमौड  से आरा मशीन के अपने रास्ते पर आज राजा को रानी से प्यार हो गिया.. पैली नजर में पैला पियार हो गिया.. गुनागुनाता हुआ मदमस्त चल रहा था कि अचानक

“ ऐ सूंण तो रे ”  की महीन से थोड़ा मोटी लेकिन लड़की की एक आवाज ने प्रदीप के कदमों पर जैसे जाम लगा दिया हो.

आज के पहले प्रदीप ने अपनी मां और बहनों के सिवा किसी और महीन आवाज वाली से घर के बाहर बात शायद ही की होगी. गाने सुनने का शौकीन प्रदीप इतना डरा था कि इस मौके पर उसे हनुमान चालीसा से ज्यादा कुछ ना गुन-गुनाया गया. लाल चेहरे और थरथराते हाथों के साथ प्रदीप पीछे मुड़ा ही था कि थपाक से एक पंच उसके मुँह पर ही पड़ा.

जारी..

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