यंगिस्तान

लो आ गया काले कव्वा का सुरीला गाना

जनवरी 14, 2019 कमल पंत

आ गया सुर वाला काले कव्वा, कुमाऊं का त्योहार पुसूड़िया मकर संक्रांति को ही मनाया जाता है और उस दिन बुलाते हैं कव्वो(कौओ) को। घुघते खिलाने के लिए।छोटे छोटे बच्चे इस कविता को बड़े उत्साह से छत में चढ़कर गाते हैं।
और यही से कमल जोशी ने इस कविता को लिया, फिर शुरू हुआ इसे सुर देने का सिलसिला। संगीत में पीएचडी कर रहे कमल जोशी चाहते थे कि गाना मेलोडियस बने, तड़कता भड़कता फूहड़ नही। बच्चे जिस अंदाज में छत में चढ़कर कव्वो को बुलाते हैं उसे थोड़ा सुर दिया जाए। और परिणाम निकला ये गाना। जो कर्णप्रिय है,मधुर है और उसी अंदाज में है जिस अंदाज में बच्चे गाते हैं। बस थोड़ा सा सुर सही किया गया है।

बचपन से उत्तराखंड विशेष रूप से कुमाऊं मंडल का हर बच्चा जनवरी का सेलेब्रेशन मकर संक्रांती को ही करता है,थर्टी फर्स्ट या न्यू सेलेब्रेशन का वहां पहले रिवाज नहीं था,लम्बी जाड़ों(पूस) की सर्दियों के बाद माघ की शुरुआत में सुबह सुबह ‘काले कव्वा काले पूस की रोटी खाले’ या ‘काले कौवा काले घुघुति माला खाले,ले कौवा बड़ा मकें दे सुणो घड़ा,ले कौवा ढाल मकें दे सुणो थाल’ कहकर कौओं को घर के बने पकवान प्रस्तुत करता हुआ जनवरी को सेलिब्रेट करता था.

जो बच्चे पहाड़ से बाहर चले गए उन्होंने वहां भी मकर संक्रान्ति के त्यौहार को इसी उत्साह से मनाया मगर समय के साथ साथ कव्वों को बुलाने की यह कविता गायब होती चली गयी. इस मकर संक्रांति कमल जोशी और उनकी टीम ने अपने ‘भकार'(भकार उनका यूट्यूब चैनल है,जिसका मतलब होता है बक्सा,पहले पहाड़ों में अनाज और अन्य चीजं रखने के लिए बक्से की तरह इसका प्रयोग किया जाता था) से इस गाने को बेहद सुरीले अंदाज में बचपन को याद रखने के लिए निकाल दिया है. गाने का वीडिओ आपको अपने बचपन के पहाड़ के दिनों में ले जाने की क्षमता रखता है.

गाँव के परिवेश में सूट हुआ यह वीडिओ पूरी तरह से पुसुडिया(मकर संक्रांति का त्यौहार) पर आधारित है.सबसे ख़ास बात यह है कि इस गाने को कुछ ही घंटों के अंदर हजारों लोगों ने देख लिया है,इससे पता चलता है कि आज भी पहाड़ के लोगों में अच्छे संगीत के लिए कितनी कद्र है. फूहड़ गानों से अलग बने इस गाने में पहाड़ की आत्मा है पहाड़ का संगीत है और वीडिओ में पूरा ठेठ पहाड़ है.

आपने अब तक यह वीडिओ नहीं देखा तो यह रहा लिंक क्लिक करके वीडिओ जरूर देखिएगा.

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