गंभीर अड्डा

मूर्तियों पर बहस का समय आ गया

दिसंबर 29, 2016 कमल पंत

छत्रपति शिवाजी की मूर्ती लगेगी मुम्बई में 3600 करोड़ की , गुजरात में सरदार बल्लभ भाई पटेल की भी लगाने वाले हैं. मूर्तियों के मामले में पूर्व में अन्य सरकारों की काफी खिल्ली उड चुकी है उसके बावजूद ये मूर्ती व्यवस्था खत्म ही नहीं होती , शिक्षा स्वास्थ सडक हो ना हो मूर्ती जरूर मिलेगी .

अब वो लखनऊ ही देख लो, मायावती ने हाथी ही हाथी बो दिए थे जगह जगह उससे पहले कांग्रेस जहाँ मर्जी हुई वहां गांधी परिवार , कांग्रेस परिवार उगा दिया. वैसे ये मूर्ती परम्परा हम आदिकाल से निभाते आ रहे हैं. पहले जब आदमी गुफाओं में रहता था तो डिजाइन बनाता था , उसके बाद जब थोड़ा विकसित हुआ तो मूर्ती में डिजाइन बनाने लगा, धीरे धीरे यह कला निखरती गयी तो मूर्तियों में हूबहू शक्ल भी आने लगी . धीरे धीरे आदमी ने कैमरे का आविष्कार भी किया.

किसी ने खजुराहो बनाया तो किसी ने कोणार्क जगन्नाथ, मने सबने अपनी अपनी यादों के हिसाब से लोगों को मूर्ती की शक्ल में ज़िंदा रखने की कोशिश की . हमने अपने रामायण महाभारत के पात्रों को भी मूर्तियों में कहीं ना कहीं संजो कर रखा है.

अब क्या है तब फोटो का आप्शन तो था नहीं , इसलिए मूर्तियों में लोगों की यादों को सहेज कर रखते थे , तरीके अलग अलग जरूर थे पर किसी मकसद सिर्फ यादों को सहेजना , आखिर फोटो पासिबल नहीं थी .

मगर हमारे नेता महान हैं, वास्तव में हम नेता नहीं चुनते हम बहुत सारे घटिया आप्शन में एक कम घटिया आप्शन चुनते हैं जो होता घटिया ही है. दिमाग से पैदल. हम एक एसी वस्तु चुनकर संसद में स्थापित करते हैं जिसका काम यह होता है कि वह अपने चुने हुए 5 साल यह सोचने में बिता दे कि वह अगले 5 साल के लिए किस तिकडम से चुन कर आ सकता है.

वह वस्तु वोट के लिए कुछ भी कर सकती है, थ्री डी के जमाने में मूर्ती बनाना , एनिमेशन , वीडियो, रोबोट जैसे आधुनिक जमाने में जब आदमी का क्लोन बनाने की तैयारी चल रही है ये नेता  3600 करोड़ रूपये मूर्ती पर खर्च कर रहे हैं ताकि उसका हवाला दे देकर दोबारा वोट की भीख मांग सकें .

ये 3600करोड़ आ कहाँ से रहे हैं, सिम्पल आप जो 14 प्रतीशत सर्विस टेक्स , सुविधा शुक्ल, इनकम टेक्स, फलाना टेक्स , ढीमकाना टेक्स के नाम पर सरकार की झोली में डाल रहे हो उसी से.

अब उसका यूज तो करना ही है ना कहीं ना कहीं . इसलिए मूर्ती बना रहे हैं .

मूर्ती के उपयोग पर एक सार्थक चर्चा होना बहुत जरूरी है, आखिर चौक चौराहों पर लगी ये मूर्तियाँ किस काम आती हैं , पहले की सरकारों ने जो गलतियाँ करी सो करी उन्हें दोहराया जाना जरूरी है ?

मूर्ती प्रेरणा देती हैं ? हजार रूपये की मूर्ती कम प्रेरणा देगी और 36०० करोड़ में बनी मूर्ती ज्यादा प्रेरणा ?

क्या होगा एसा ? हर बार जनता के पैसे को एसे क्यों लुटाया जाता है? ये वो सवाल हैं जो वोट लोलुप सरकारों से पूछे जाने चाहिए , इसके बदले अगर पेड़ पौधे उगाये जाते तो आक्सीजन मिलती , साफ़ पर्यावरण मिलता. लेकिन हर बार इस सवाल को यह कह कर दबा दिया जाता है कि पहले की सरकारों से क्यों नहीं पूछे गए सवाल ?

आपका काम ये मूर्तियाँ नहीं दिखाती , महात्मा गांधी अपनी बनायी मूर्तियों की वजह से याद नहीं किये जाते , किसी भी देश में राजनेता अपने ऊटपटांग फैसलों के कारण बदनाम होता है और ये मूर्तियों के कारण तो सबसे ज्यादा , मायावती अपने बनाये हाथियों के पार्क के कारण आज भी लखनऊ में गैरबसपाईयों द्वारा पागल करार दी जाती है. मायावती द्वारा किये गए सारे सही काम इस हाथी पार्क के नीचे दब कर मर गए.शायद इसी वजह से दोबारा चुनी भी नहीं गयी.

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