ओए न्यूज़

क्योंकि घोटाले,घोटाले नहीं है

दिसंबर 30, 2017 ओये बांगड़ू

दिल्ली के रामलीला मैदान में अर्जुन अपने रथ पर आरूढ हैं . भगवान श्रीकृष्ण उनके रथ पर सारथी हैं . कुछ कुछ द्वापर युग के रणभूमि का दृश्य सा प्रतीत हो रहा है . वही धूल धक्कड उड रहा है पर ये घोडों की टापों से नही मानव के पापों से हो रहा है मानव के प्रदूषण से हो रहा है . भगवान ने अपना मुह मास्क से ढका है .
अर्जुन भगवान को रथ आगे ले जाने का आग्रह करते हैं पर रथ है कि ट्रैफिक जाम में फसने के आसार हैं . नारायण अन्तर्यामी हैं कहते हैं –
हे पार्थ , यही से सब अवलोकन कर लो . आगे बढना सही नहीं है . ये कलियुग है .
अर्जुनोवाच – हे केशव ! बताइये मैं ये बाण किस पर संधान करूं ..? यहां तो पता ही नहीं चल रहा कौन दागी है कौन घोटालेबाज है . कौन सा घोटाला है कौन सा नहीं है . क्या सब व्यर्थ का कोलाहल था .. यदि व्यर्थ का था तो फिर यह सब शोर क्यों मचा था . क्या फरक है प्रभू पुराने और नये लोगों में . मेरा मार्गदर्शन करें प्रभू . मेरी आँखो से ये परदा हटायें .
श्री भगवानोवाच – हे पार्थ ! ये सी बी आई की तरह कन्फ्यूज ना हो . ये कलिकाल है पार्थ . यहां आकर कुछ राजनीति सीख . ये तेरा काम नहीं सोचना कि कौन दोषी है कौन नहीं . ना ही ये मेरा काम है बताना कि किसने घोटाले किये . ये सब बिधि पर छोड दो .
अर्जुनोवाच – पर प्रभु बिधि भी तो नाकाम हो गयी . सबूतों के अभाव में .
श्री भगवानोवाच .- मैं ये वाले विधि की नहीं विधाता की बात कर रहा हूं पार्थ . बात को समझा करो .
अर्जुनोवाच – पर विधाता तो आप स्वयं है प्रभू .
श्री भगवानोवाच – नहीं पार्थ . अब मैं विधाता नही . अब तो भारत भाग्य विधाता का युग है .
अर्जुनोवाच – प्रभू .. बिलकुल कनफ्यूज हो गया हूं . आप बिस्तार से समझाइये कि इन टू जी . आदर्श . ब्यापम , खेल , कोयला आदि क्या हैं .. इन्हें किसने किया .
श्री भगवानोवाच – हे धनुर्धारी .. ये सब मायाजाल हैं . तुझे मान लेना चाहिये कि टू जी एक घोटाला था पर किया किसी ने नहीं , ये भारत है वत्स . यहां चमत्कार होते रहते हैं
अर्जुनोवाच -जैसे
श्री भगवानोवाच – जेसिका को गोली मारी वो मर गयी पर गोली किसी ने नहीं चलाई . आरुषि हेमराज मारे गये पर मारा किसी ने नहीं , काला हिरन मरा पर मारा किसी ने नहीं , फुटपाथ पर लोग मरे पर गाडी कोई नहीं चला रहा था . घोटाले होते हैं पर करता कोई नहीं .
अर्जुनोवाच – प्रभू इनका सोल्यूशन क्या है ?
श्री भगवानोवाच – अरे गांडीवधारी धीर वीर ये सामान्य जनता की तरह प्रश्न क्यों कर रहे हो . ? आसान है . जब भी कुछ हो जाय उसका फायदा उठाओ . यदि पत्रकार हो तो इसमें से सनसनी का तडका लगाकर छापो . यदि न्यूज चैनल से हो तो अपनी टी आर पी बढाओ . यदि विपक्ष के नेता हो तो इन सवालों पर सरकार को घेरो . यदि सत्ताधारी हो तो कह दो कानून अपना काम करेगा ,कभी पिछली सरकार पर आरोप लगा दो कभी कभी अपने विरोधी नेता पर , यदि जांच ऐजेन्सी हो तो चार्जशीट दाखिल करो और सो जाओ , यदि किसी आयोग के अध्यक्ष हो तो जवाब तलब करो , यदि वकील हो तो बचाव करो , यदि बुद्धिजीवी हो तो रात में कोर्ट का दरवाजा खटखटाओ , कुछ भी करो पर समस्या हल न होने दो , और हां यदि सामान्य जनता हो तो अपना सिर पीटो और बोलो – इस देश का कुछ नहीं हो सकता .
अर्जुनोवाच – हे केशव ! हे चराचर जगत के स्वामी आपकी बातों मैं कम्पायमान हो गया हूं . मेरी भुजाए शिथिल हो गयी हैं . मेरे हाथ से मेरा गांडीव खिसक रहा है . मैं अब ये गांडीव उठाने में असमर्थ हूं . बताइये मैं क्या करू प्रभू ..?
श्री भगवानोवाच – खबरदार अर्जुन ! गांडीव कसकर पकडो .. अगर गांडीव कहीं खो गया तो दोबारा न मिल पाएगा . थाने में सूचना देनी होगी फिर सिफारिश लगवाकर रपट दर्ज करनी होगी फिर किसी मन्त्री से प्रेशर डलवा कर पुलिस को कहना होगा कि जल्दी ढूंढें . यदि नाकामी मिली तो सीबीआई जांच होगी . फिर तो तुम्हें पता ही है ढाक के तीन पात . और यदि तुम नया गांडीव खरीदना चाहेगे तो इस क्वालिटी का भी नहीं मिलेगा , चायना का बना हुवा इण्डियन कम्पनी का ठप्पा लगाकर डुब्लीकेट खरीदना पडेगा . जिससे तुम दो चार बाण ही चला पाओगे और उसकी डोरी हाथ में आ जाएगी . इसलिए हे पार्थ धनुष सभालो और किसी पर भी बाण छोडने का विचार दिल से निकाल दो . ये युग ही घोटालों का हैं . इस युग में घोटाला अजर है अमर है अविकारी है ,अविनाशी है अगम है ,अगोचर है , जब तक राजनीति है नेता हैं घोटाले होते रहेगे
अर्जुनोवाच – समझ गया प्रभू . अब क्या आग्यां है ?
भगवानोवाच – आग्या क्या … चलो फूट लेते हैं चुपचाप . अपना युग गया . इस युग के अधिपति घोटालादेव को राज करने देते हैं .
अर्जुनोवाच – ठीक है प्रभु चलो ..
( दोनो चले जाते हैं )

लेखक परिचय

व्यंगकार विनोद पन्त

विनोद पन्त ‘खन्तोली ‘ वाले वैसे तो पहाडी में तीखी मारते हैं लेकिन कभी कभी हिन्दी में भी कहर ढाते हैं..कुमाऊँ के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार का खिताब पा चुके का ये व्यंग्य हिन्दी में

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