गंभीर अड्डा

क्यों चुनावी वर्ष में बढ़ जाती हैं आतंकी घटनाएँ

फरवरी 15, 2019 कमल पंत

लगभग अनुमान के आधार पर,गूगल सर्च करके थोड़ा सा डाटा बनाया है,मोरारजी देसाई की सरकार जाने वाली थी और चुनाव होंगे एसा अनुमान था तब, 1980 के दशक के दौरान उग्रवाद तेज हो गया, जब आंदोलन ने हिंसक मोड़ लिया और खालिस्तान नाम फिर प्रासंगिक हो उठा और भारतीय संघ से स्वतंत्र होने की मांग की गयी। जरनैल सिंह भिंडरांवाले के नेतृत्व में आंदोलन की मांगों की पूर्ति के लिए आतंकवाद का उपयोग शुरू किया गया, हालांकि वे खालिस्तान के निर्माण के न तो समर्थक थे और ना ही उसके विरोधी. जब भारत ने यह आरोप लगाया कि पड़ोसी देश पाकिस्तान इन आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है.
1990 विश्वनाथ प्रताप सिंह जाने वाले थे और नए चुनाव होंगे इसका अनुमान लगाया जा रहा था, कश्मीर में आतंकी गतिविधियाँ अचानक बड गयी और सेना और आतंकियों के संघर्ष शुरू हो गए,हालाँकि इसकी नींव 87 में ही चुनाव के दौरान पड़ गयी थी लेकिन वख्त चुना गया चुनाव से कुछ महीने पहले का.
1998 में एक तरफ जहाँ पोखरण टेस्ट हुआ वहीं चुनाव से पहले अलग अलग जगहों से भारी मात्र में विस्फोटक बरामद किये गए,हालाँकि मुम्बई बम हमलों के बाद से देश में सुरक्षा एजेंसियां काफी सक्रिय थी इसलिए कोइ अप्रिय घटना नहीं घटी,अटल/देवगौड़ा/गुजराल से पीएम उसके बाद आये अटल.
चुनावी साल था 2004 और 2003 में 27 जनवरी 2003 – विले पार्ले में एक साइकिल पर बम फटने से 1 व्यक्ति की मौत
14 मार्च 2003 – मुलुंड में एक ट्रेन में बम फटने से 10 लोग मारे गये
28 जुलाई 2003 – घाटकोपर में एक बस में बम विस्फोट कर 4 की हत्या
25 अगस्त 2003 – झवेरी बाजार और गेटवे ऑफ़ इंडिया के पास कारों में रखे दो बमों के फटने से 50 लोग मारे गये.
बम विस्फोट वैसे आगे पीछे भी बहुत सारे हुए हैं,मसलन 2001,1993,और भी बहुत सारे हुए हैं.लेकिन चुनाव के आगे पीछे होने वाले एसे कृत्य हमेशा संदेह की दृष्टि से देखे जाने चाहिए.
हमारे राजनेता अपने घरवालों के सगे नहीं हैं हमारे या देश के क्या होंगे. किस पार्टी का कौन सा बन्दा कब जाकर कही किसी से मिल ले कह नहीं सकते,विविधताओं का देश है,कौन क्या कब कहाँ कैसे सोचता है कौन जानता है.
हा सोशल मीडिया या मीडिया में बड़ी बड़ी बातें उछाल सकते हैं लेकिन पर्दे के पीछे चुनाव जीतने के लिए कौन कैसी तिकडम लगा रहा है आपको नहीं पता.
न कांग्रेस पाक साफ़ है न भाजपा और दोनों में देशभक्त तो कोइ भी नहीं,इन्होने राजनीति को रोजगार बना रखा है,जैसे सरकारी महकमे का बाबू अपने रोजगार के अलावा घूस भी खा लेता है वैसे ही यह राजनेता भी हैं जो अपने रोजगार के साथ साथ पैसा भी बना रहे हैं.
आप पूछिए न इनसे कि करोड़ों कैसे खर्च कर रहे हैं एक क्षेत्र में,कहाँ से आ रहा है पैसा ? जबकि आपकी तनख्वाह और डीएम की तनख्वाह लगभग बराबर है.फिर आप कैसे चुनाव में करोडो लगा रहे हैं.
शक करना चाहिए और राजनेताओं पर सबसे पहले करना चाहिए,क्योंकि अशांत देश में वादे करके चुनाव जीतना सबसे आसान है,90 के बाद कश्मीर मुद्दा और आतंकवाद चुनावी भाषणों में खूब बोला गया.2014 में सैनिकों फोकस था,और अब दोबारा आतंवाद एक मुद्दा है(जो कभी खत्म ही नहीं हुआ )
किसी का बेटा भाई पति इनके कारण शहीद हो जाये तो उसे पूछने का पूरा अधिकार है कि क्यों मारे जा रहे हैं जवान,कहाँ हैं आपके सुपर जासूस,कहाँ हैं रणनीतीकार,हर बात में पकिस्तान पकिस्तान करके जवानों की शहादत का गुस्सा पकिस्तान की तरफ मोड दिया जाता है जबकि सन्गठन पाकिस्तान का है और उसने खुद अपने यहाँ उसे बैन किया हुआ है.

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