गंभीर अड्डा

क्या विलुप्त हो जायेंगी बोलियाँ

जनवरी 10, 2018 ओये बांगड़ू

कुछ दिनों पहले की बात है, मैंने एक उत्तराखण्डी ग्रुप में कोई कुमाऊनी चुटकुला पोस्ट किया था। जिसमें एक लड़की का कमेन्ट आया कि उसे कुछ समझ नहीं आया। मैंने उनसे पूछा कि वो पहाड़ी हैं? उनका जबाब था- “हां, पर मुझे पहाड़ी लैंग्वेज नहीं आती।” यह कोइ नयी बात नहीं है कि किसी को अपनी घरेलू भाषा का ज्ञान न हो,हमारी बोलियाँ धीरे धीरे अपना दायरा खो रही हैं.पलायन कर गयी पीढी में सिर्फ पांच से दस प्रतीशत लोग ही अपनी बोलियों की जानकारी रखते हैं.

अगर थोड़ा जमीनी और प्रयोगात्मक होकर हम विचार करें तो उत्तराखण्ड के पास इतना, जल, जमीन और संसाधन नही कि उत्तराखण्ड से पलायन कर चुके लोग वापस आकर प्रदेश में ही कमा खा पाएं, लेकिन इतने कम संसाधन भी नहीं कि इतनी तीव्र गती से पलायन हो और लोग अनाजों से भरे भकार चूहों के खाने के लिए छोड़कर शहरों की तरफ भागें। खैर पलायन का मुद्दा अलग है, इसे यही विराम देता हूं और वापस मुंहबोली पर लौटता हूं।

बीते 30-40 वर्षों में एक बड़ी आबादी की मातृभाषा गुम हो चुकी है। इस दौरान देश की 500 बोलियों में से लगभग 300 पूरी तरह खत्म हो चुकी है(हालांकि ये बहुत कम संख्या में बोली जाने वाली क्षेत्रीय बोलियां रही होंगी।) और कई भाषाएं खत्म होने के कगार पर हैं। ये बोलियां ज्यादातर- छतीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, उत्तराखण्ड और गुजरात की हैं।

यूनेस्को की एक रिपोर्ट “इंटरेक्टिव एटलस” 2010 में आई, जो मुझे इंटनेट पर खोजने पर मिली। इसके अलावा कोई और रिपोर्ट मुझे इंटरनेट पर नहीं मिली, तो इसी के मुताबिक- भारत अपनी भाषाओं को भूलने के मामले में पहले स्थान पर है। जहां 250 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं। दुनिया की कुल 6000 भाषाओं में से 2500 पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। 199 बोलियां ऐसी हैं जिन्हें अब 10 लोगों से अधिक नहीं जानते। और 178 बोलियों/भाषाओं को महज 10 से 50 की संख्या में ही लोग बोलते समझते हैं। यानी इन गिनती के लोगों के साथ-साथ ये भाषाएं भी खत्म जाएंगी।
वैसे तो उत्तराखण्ड में मुख्य रूप से तीन-चार बोली/भाषा ही सबसे ज्यादा बोली जाती है, लेकिन उत्तराखण्ड में जनजातीय विविधताओं के चलते कुल 13 बोलियां हैं जो क्रमशः इस प्रकार हैं- कुमाउनी, गढ़वाली, जौनसारी, जौनपुरी, जोहारी, रवाल्टी, बांगड़ी, माच्छार, राजी, राजी, जाड, रंगल्वू, बुकासाणी और थारू।
इतनी विविधता भी कभी चिंताओं का कारण बन जाती है, युनेस्को के “एटलस ऑफ द वाइल्ड लैंग्वेज इन डेंजर” रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखण्ड की गढ़वाली, कुमाउनी सहित सारी भाषाएं खतरे में ही हैं। पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोल्चा और रंग्कस तो विलुप्त भी हो चुकी हैं। वहीं उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र 12 हजार लोग बोलते हैं। पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यासी। उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं। दारमा को 1761, ब्यासी को 1734, जाड़ को 2000, और जौनसारी को 1,14,733 लोग ही बोलते समझते हैं। जबकि गढ़वाली को 20,79,500 और कुमाउनी को 20,03,783 तथा 8000 लोग रोंग्पो बोली बोलते हैं।(ध्यान रहे ये रिपोर्ट 2010 की है, और 2011की जनगणना में उत्तराखण्ड की जनसंख्या 1 करोड़ थी। अब इन राजकीय बोलियों को बोलने वाले लोगों को जनसंख्या के अनुपात में रखें तो राजकीय बोलियों को बोलने वाले लोगों की संख्या 45% के करीब है। यानी की राज्य के आधे लोग भी राजकीय बोलियों का ज्ञान नहीं रखते। ये हमारे लिए खतरे के संकेत नहीं तो और क्या हैं?)
उत्तराखंड के हजारों-लाखों लोग देश-विदेश के बड़े शहरों में रहने लगे हैं। और इनमें से अधिकतर लोगों को अपने मूल से प्यार है, ऐसा मैंने बहुत बार अनुभव किया है। लेकिन सिर्फ इससे कुछ नहीं होगा, हम प्रदेश से बाहर भी रह रहे हैं तो हमें अपनी भाषा को जीवित रखना होगा, ऐसे में आम बोलचाल का भाषाई ज्ञान देने की जिम्मेदारी उनकी है जो पहाड़ से बढ़-पढ़कर शहर बसे, जिन्हें अपनी मातृ भाषा का ज्ञान है। इन्हीं लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि ये अपने बच्चो को भी अपनी भाषा सिखा पाएं, वो बच्चे जो शहरों में ही पैदा हुए वहीं पले बढ़े। बहुत से शहरी बच्चो में मैंने मातृभाषा का ज्ञान देखा है, पर इनकी संख्या कम है। मतलब की पहाड़ की जो दूसरी-तीसरी पीढ़ी प्रदेश से बाहर है उन्हें अपनी भाषाओं का कोई ज्ञान नहीं, ऐसे में बोलियों का सिकुड़ते जाना लाज़मी है। वैसे देखा जाए तो कई बार ग्रामीण लोग भी मुंह बोली को बोलने में शर्म महसूस करते हैं, जबकी यही चीजें किसी खास प्रादेशिक गांव को गांव बनाती हैं। मेरे एक मित्र हैं अंशुल उन्होंने एक बार लिखा था कि “गांव खुद को शहर बनाना चाहते हैं, इसी कारण गांव की आत्मा मर रही है। गांव को गांव ही रहने दो। उसे शहर बनाने की आवश्यकता नहीं।”

राजेंद्र सिंह नेगी(राजू) पेशे से लेखक नहीं हैं लेकिन फेसबुक ने उन्हें लेखक बनने पर मजबूर कर दिया है,अक्सर दिन भर की थकान को शाम को फेसबुक पर उतारते हैं और एसा करते करते अब गैर व्यवसायिक लेखक बन चुके हैं.उनका लिखा पढने वाले उन्हें नेगी ,राजू और नेगी जी के नाम से ज्यादा जानते हैं 

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