गंभीर अड्डा

क्या सच में महिलायें सशक्त हो रही हैं ?

जुलाई 4, 2018 ओये बांगड़ू

प्रस्तुत लेख ओयेबांगडू के लिए मोहम्मद सलमान ने लिखकर भेजा है जो एक छात्र हैं 

परिदृश्य बदल रहा है। महिलाओं की भागीदारी सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ रही है। महिला सशक्तिकरण हो रहा है। ये कुछ चुनिंदा पंक्तियाँ है जो आये दिन समाचार पत्रों में पढ़ने और टीवी चैनल पर देखने सुनने को मिल जाएंगी अपने क्षेत्र में ख़ास उपलब्धियां हासिल करने वाली कुछ महिलाओं का उदहारण देकर हम महिलाओं की उन्नति को दर्शाते हैं। अगर ध्यान दें तो कुछ अलग और अद्भुत करने वाली महिलाएं हर काल में रही हैं। सीता से लेकर द्रोपदी, रज़िया सुल्ताना से लेकर रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर इंदिरा गाँधी तक ऐसे तमाम उदाहरण आपको देखने को मिल सकते हैं। परंतु आम महिलाओं की स्थिति में कितना परिवर्तन आया है इस बात का विश्लेषण किया जाये तो महिला सशक्तिकरण जैसी बाते खोखली सी लगती हैं। इस इक्क्सवी सदी में महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं उनका बाहर जा कर काम करने को हम दो अलग अलग नज़रिये से देखते हैं। एक तो वो महिला जो बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करती हैं दूसरी वो जो सड़क पर मज़दूरी करती हैं। खेत में हंसिया लेकर कड़ी धूप में दिन भर फसल काटती हैं।

समाज बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं को बड़े ही आदर और सम्मान की दृष्टि से देखता है मगर दूसरी ओर दिन भर कड़ी धूप में मेहनत मज़दूरी करके अपना घर चलाने वाली महिलाओ को तुच्छ दृष्टि से देखता है। यह महिलाएं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक मेहनत करती हैं और इन्हें मज़दूरी भी उनसे काम ही मिलती है। इस तरह इन बेसहारा, बेबस और मजबूर महिलाओं का समाज में शोषण होता है और कोई भी उनके लिए आवाज़ नहीं उठाता। दूसरी ओर ऑफ़िस जाने वाली महिला को अगर कोई छेड़ दे तो मीडिया समाचार पत्र सभी इस खबर को प्रमुखता के साथ छपते हैं। उस महिला की दुर्दशा के बारे कोई नहीं सोचता जो दिन भर सड़क, तालाब, भवन निर्माण का काम करती है।

अक्सर सुनने में आता है कि कभी उन्हें मज़दूरी देने वाला उनका मालिक या ठेकेदार उन्हें तंग करता है तो कभी शारीरिक शोषण। ऐसे में महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले लोग कहाँ चले जाते हैं? दो महिलाओं के साथ ये अलग अलग नजरिया क्यों और किसलिए? आखिर हमारा समाज इसके प्रति कब जागरूक होगा, पश्चिमी सभ्यता के अनुसार जीने वाली महिलाओं को तो लोग बहुत सम्मान और प्रमुखता देते हैं मगर फिर इन गरीब भारतीय नारी को क्यों अपने पास भी बिठाना पसंद नहीं करते जो दिन भर मेहनत मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालती है।

महिला सशक्तिकरण की वास्‍तविकताओं को देखकर हम पाते हैं कि हमारे देश में शहरी क्षेत्रों में तो संतोषजनक परिवर्तन हुआ है किंतु देहाती क्षेत्रों में इसकी गति काफी धीमी है। साथ ही हमें महिलाओं के सशक्‍त बनने की राह की कुछ चुनौतियॉं भी नजर आती हैं जिनका सुनियोजित तरीके से सामना कर 100 प्रतिशत महिला सशक्‍तता समाज में लायी जा सकती है। शिक्षा महिलाओं के स्‍वतंत्रता एवं सशक्तिकरण के लिए एक शक्तिशाली हथियार है। कहा जाता है कि “Educate a man and you educate an individual; educate a woman and you educare family. महिलाओं के लिए शिक्षा का बहुत महत्‍व है। लड़कियों का स्‍कूलों में कम दाखिला एवं आगे चलकर स्‍कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देना भी महिला सशक्तिकरण के समक्ष बड़ी चुनौती है।

महिलाओं के लिए आर्थिक आत्‍मनिर्भरता भी एक चुनौती है जिसके बिना उनके सशक्तिकरण की कल्‍पना नहीं की जा सकती है। सरकार के अनेकानेक प्रयासों के फलस्‍वरूप शहरी क्षेत्रों में तो महिला सशक्‍त हुई भी है पर गॉंवों में वे आज भी बदलाव की हवा से अछूती रही है। वे अभी भी दयनीय हालत में गरीबी अज्ञानता अंधविश्‍वास एवं गुलामी की जिंदगी जीने को अभिशप्‍त हैं। अत: गॉंवों में भी महिला को सशक्‍त बनाना बड़ी चुनौती है। आजकल महिला सशक्तिकरण के नाम पर देश में बहुत कुछ हो रहा है और काफी संसाधन भी इसके पीछे निवेश किए जा रहे हैं। किंतु चुनौती यह भी है कि कागजों पर क्‍या हो रहा है और जमीनी तौर पर क्‍या हो रहा है। महिलाओं के सशक्तिकरण के राह में सबसे बड़ी चुनौती महिला स्‍वयं भी है। ऐसा कहने के पीछे कारण यह है कि घर परिवार में महिला ही महिला की दुश्‍मन होती है। महिला के सशक्तिकरण के लिए जरूरी यह है कि सभी महिलाऍं एकजुट होकर अपने खिलाफ चल रहे बुराईयों को दूर करने के लिए उठ खड़े हों।

महिलाएं अपनी भूमिकाओं और क्षमताओं के पारंपरिक अवधारणाओं से बाहर आ चुकी हैं। सरकार ने भी कई संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधान उनके सशक्तिकरण के लिए किया है। इन सब के बदौलत महिलाएं काफी सशक्‍त हुई हैं पर वास्‍तविकता यह भी है कि अभी भी शत-प्रतिशत सशक्तिकरण से महिलाऍं काफी दूर हैं। महिला सशक्तिकरण की राह में अनेक चुनौतियां भी हैं जिसका सामना सरकार, समाज और सबसे बढ़कर महिलाओं को करना है।

दुर्भाग्य की बात है कि नारी सशक्तिकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों की चकाचौंध तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र, नई सोच वाली, ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएं हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों को किसी भी रूप में सहन नहीं करना चाहतीं। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाएं हैं जो ना तो अपने अधिकारों को जानती हैं और ना ही उन्हें अपनाती हैं। वे अत्याचारों और सामाजिक बंधनों की इतनी आदी हो चुकी हैं की अब उन्हें वहां से निकलने में डर लगता है। वे उसी को अपनी नियति समझकर बैठ गई हैं।

शायद अब तक महिला सशक्तिकरण जैसी बातें झूटी ही है। सशक्तिकरण हुआ तो है मगर उच्च वर्ग की महिलाओं का आम महिलाओं का नहीं या यों कहें कि अब तक सिर्फ सशक्तिकरण के नाम पर उदाहरण स्वरूप कुछ चेहरे बुने गए हैं उसी तरह जैसे राजनीतिक पार्टियां एक दो मुस्लिम-दलित नेता रखते हैं।

अंत में इस लेख को स्‍वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध कथन से पूर्ण करना उपयुक्‍त होगा कि ‘महिलाओं की हालत सुधारे बिना दुनिया का कल्‍याण संभव नहीं है क्‍योंकि किसी परिंदे का एक डैने से परवाज भरना नामुमकिन है।

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