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क्या है सीबीआई और कोलकाता का खेल

फरवरी 6, 2019 कमल पंत

सीबीआई का कोलकाता अध्याय अभी अभी आपने देखा सुना पढ़ा होगा,जिसमे ममता बनर्जी धरने में बैठ गयी थी. सारदा चिटफंड के मामले में सीबीआई जिस तरह से कार्य कर रही थी या जिस तरह से उसने कार्य किया क्या वह संविधान सम्मत है या सीबीआई सच में अपने आकाओं को मदद पहंचाने के लिए हद से बाहर जाने लगी है.

इन सब विषयों को जानने समझने के लिए आपको सीबीआई क्या है, क्यों है, यह जानना बेहद जरूरी है.

भारत के पास मुख्यतया तीन प्रमुख इंटेलिजेंस एजेंसियाँ हैं ; रॉ , आईबी और सीबीआई .सीबीआई का कार्य इंटेल के अतिरिक्त मुख्यतया भ्र्ष्टाचार और अपराधों (कहने पर ) की जाँच का है .

आईबी की स्थापना 1887 में अंग्रेजों ने की थी जिसका कार्य जासूसी कर सूचनाएं एकत्र करना था . आजादी के बाद इस एजेंसी का काम देश के अंदर और बाहर से सूचनाएं एकत्र करना था . किसी भी राष्ट्र के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण विभागों में से एक होता है , जिसे इसके पहले डायरेक्टर ने ब्रिटेन की ‘MI 5’ की तर्ज पर चलाने की कोशिश की थी मगर 1962 और 1965 में यह महसूस किया गया कि आंतरिक और वाह्य सूचनाओं हेतु अलग — अलग एजेंसियों की जरूरत है अतः 1968 में आईबी से अलग “रॉ” की स्थापना की गई जिसका कार्य विदेशों से सूचनाएं प्राप्त करना है जबकि आईबी का कार्य देश के अंदरूनी भाग से सूचनाएं प्राप्त करना और उपयुक्त रणनीति बनाना है . आईबी और रॉ दोनों ही एजेंसियाँ ऑपरेशनल कार्य भी करती हैं .

आईबी गृह मंत्रालय के अधीन है जो सीधे गृह सचिव और गृह मंत्री को रिपोर्ट करती है मगर रॉ कैबिनेट सचिव के अंडर कार्य करती है जो भारत सरकार में सबसे बड़े अधिकारी होते हैं , जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं । कैबिनेट सचिव तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष , भारत सरकार के सचिव आदि से ऊपर सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी हैं उनका कार्यालय राष्ट्रपति भवन में होता है , अर्थात वे राष्ट्रपति और पीएम दोनों को रिपोर्ट कर सकते हैं । रॉ डायरेक्ट इनको रिपोर्ट करते हैं मगर पीएम के निरंकुश और अति शक्तिशाली होने पर प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रिपोर्ट ले सकते हैं जो सीधे पीएम को रिपोर्ट करते हैं , जबकि आईबी गृह सचिव या गृह मंत्री को ही रिपोर्ट करती है .

सीबीआई की स्थापना 1941 में अंग्रेजों ने ही की थी जिसका उद्देश्य युद्ध सामग्री के लेन देन में हुये भ्रष्टाचार की जाँच करना था जिसे 1946 के “DELHI POLICE ESTABLISHMENT ACT 1946” के तहत पुनर्गठित किया गया है और 1963 के तहत इसको “केंद्रीय जाँच अन्वेषण ब्यूरो (CBI)” नाम दिया गया जिसका अधिकारक्षेत्र इसके स्थापना के एक्ट में स्पष्ट किया गया है जो इसकी स्थापना के “अनुच्छेद 5 और 6” में स्पष्ट है । इनके अनुसार —-

1, सीबीआई केंद्रीय सरकार के विभागों में भ्रष्टाचार की जाँच कर सकती है ।

2,सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) यानी केंद्रीय बैंक , ONGC , आदि केंद्रीय संस्थाओं में हुए भ्रष्टाचार की जाँच कर सकती है ।

3, राज्यों की “सहमति से राज्यों में भी” जाँच कर सकती है ।

यह एजेंसी कोई संवैधानिक एजेंसी नहीं है बल्कि केंद्रीय आदेश पर बनाई गई एजेंसी है । कोई भी राज्य इसे अपने राज्य क्षेत्र में जाँच करने से रोक सकता है । बिना राज्य की अनुमति के यह एजेंसी राज्य के अधिकारक्षेत्र में जाँच नहीं कर सकती लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जाँच कर सकती है क्योंकि ये आदेश किसी भी राज्य सरकार पर बाध्यकारी हैं .

अब आते हैं इस मुद्दे पर कि आखिर क्यों सीबीआई को कोलकाता के पुलिस कमीश्नर पर इतना इंटरेस्ट था,

सीबीआई की तरफ से शुरू से इस घोटाले की जांच को लीड अस्थाना ही करते आये हैं ऐसा जब से चल रहा था जब आलोक वर्मा को सीबीआई चीफ नियुक्त नही किया गया था चिटफंड घोटाला की जल्द से जल्द जांच कर आस्थाना स्वयं सीबीआई चीफ बनना चाहते थे.

चिटफंड घोटाले की जांच अस्थाना की निगरानी में हो रही थी ओर ममता बनर्जी की सरकार की तरफ से गठित SIT के एक वरिष्ठ सदस्य के तौर पर कुमार ने चिट फंड मामले की जांच का नेतृत्व किया था

अस्थाना द्वारा पिछले साल पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को तीन समन भेजे गए थे जिसमें पिछले साल अक्टूबर में कुमार ने पहले समन का जवाब दिया था उन्होंने कहा था कि वह मेल किए गए क्वेस्चनेर का जवाब देने या इस पर किसी भी बैठक में शामिल होने के लिए तैयार हैंपर CBI चाहती थी कि वह जांच के लिए खुद उपस्थित हों क्योंकि नोटिस CrPC के सेक्शन 160 के तहत भेजा गया था.

लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही राजीव कुमार को दूसरा समन भी भेज दिया गया इसके बाद कुमार ने चार साल पुरानी जांच पर राजनीतिक प्रभाव का आरोप लगाते हुए डायरेक्टर आलोक वर्मा को पत्र लिखा CBI ने इसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस के DG से संपर्क साधा। कोलकाता से सुझाव आया कि मामले पर चर्चा के लिए एक मीटिंग आयोजित की जाए, जबकि सीबीआई को यह स्वीकार नहीं था

लेकिन उसके सात महीने के बाद एक और नोटिस और तीन दूसरे IPS अफसरों को भेजा गया

उस वक्त कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अफसर के हवाले से यह बात सामने आई थी कि अगर एजेंसी कानूनी विकल्प की तरफ बढ़ती तो कुमार सीबीआई को कोर्ट में ले जाने की तैयारी कर चुके थे

इस बीच राकेश अस्थाना पहली बार इन मामलों की जांच की समीक्षा के लिए कोलकाता गए इससे पहले वे दिल्ली से ही मामलों पर नजर रखते थे।

उनके दौरे के दूसरे ही दिन कोलकाता में इस मामले को देख रहे मुख्य जांच अधिकारी अभय सिंह का तत्काल तबादला कर दिया गया तथा उनसे मामले की जांच की सभी फाइलें सीबीआई दफ्तर में जमा करवाने को कहा गया सूत्रों के हवाले से यह खबर भी बाहर आई कि अस्थाना साफ कहा है कि 2019 के पहले हर हाल में मामलों की जांच पूरी कर चार्जशीट पेश करनी होगी।

तो क्या सीबीआई को इस तरह जांच के लिए आगे आना चाहिए था ? क्या सीबीआई

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