यंगिस्तान

बाज बहादुर एनएसडी में

जुलाई 28, 2018 कमल पंत

उत्तराखंड के राजाओं रियासतों का इतिहास जानना मैंने कभी जरूरी नहीं समझा,क्योंकि स्कूल सेलेबस में ये था नहीं और इन्हें जानकर मुझे कहीं नम्बर नहीं मिलने वाले थे,बचपन की पढाई अक्सर हम नम्बरों के लिए ही किया करते हैं. अपने आस पास के कुछ राजाओं की जानकारी कभी उड़ते उड़ते कानों में आ गयी तो याद हो गयी. इससे ज्यादा ढूँढने खोजने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई,शायद यही सोच मेरे जैसे बहुत से लोगों के मन में रही होगी तभी उत्तराखंड की बहुत सी चीजें आज भी हमारे ज्ञानकोष से कोसों दूर हैं.तराई भाबर में बसा बाजपुर एक पहाडी राजा के नाम पर है ये सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ और खुद पर शर्म भी आयी कि अब तक क्यों नहीं था हमें ये पता. और हमें ये सब बताया पहाड़ से कोसों दूर रहकर पहाडी राजाओं पर रीसर्च कर चुके अमित सक्सेना ने,अपने नाटक बाज बहादुर चंद के माध्यम से .

मुगल बादशाह शाहजहाँ के समकालीन बाज बहादुर चंद के बारे में मैंने बस उलाहने सुने थे,मसलन कोइ कह देता कभी कि अरे ज्यादा बाज बहादुर न बन तो हम सोचा करते कि ये एक उलाहना भर है.एक तरह से ताना समझ लो, कोइ बच्चा ज्यादा बहादुर बनने की कोशिश करता तो अक्सर बड़े ये ताना मार देते थे. दिल्ली के नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के सम्मुख ऑडिटोरियम में 27 जुलाई की शाम मुझे पता चला कि बाज बहादुर चंद कौन थे,क्या थे.और इस जानकारी को मुझ तक पहुंचाने वाले कोइ पहाडी नहीं थे,बल्कि एक जिज्ञासु अमित सक्सेना थे.

नेशनल स्कूल आफ ड्रामा से पास आउट अमित सक्सेना ने एक खूबसूरत संगीतमय नाटक के माध्यम से बाज बहादुर चंद की जीवनी मेरे सामने रख दी. रंगकर्मी कैलाश कुमार द्वारा अभिनीत इस नाटक को परफार्म किया दिव्यदिक्षा सेंटर आफ परफार्मिंग आर्ट्स ने.रंगकर्मी स्वर्गीय नईमा खान को समर्पित इस संगीतमय नाटक ने मेरे जैसे न जाने कितने लोगों को उत्तराखंड के गरिमामय इतिहास से रूबरू कराया.इसके लिए हम निर्देशक अमित सकसेना और रंगकर्मी कैलाश कुमार के आभारी रहेंगे. उत्तराखंड के फोक संगीत की संगत में छोलिया जागर कत्थक के माध्यम से बहुत ख़ूबसूरती के साथ कैलाश कुमार ,दिव्या उप्रेती ,दीक्षा उप्रेती और उनकी टीम ने एक खूबसूरत नाटक की प्रस्तुती दी.

अल्मोड़ा रियासत के राजा बाज बहादुर चंद ने मुगल बादशाह शाहजहा से मुलाक़ात की ये बात इस नाटक के बाद ही मुझे पता चली,मैं नहीं जनता और किस कुमाऊँ या गडवाल के राजा ने इतिहास में एसा किया था, बाज बहादुर चंद के किरदार के साथ बिना कोइ छेड़छाड़ किये, एतिहासिक तथ्यों का ध्यान रखते हुए बड़ी ख़ूबसूरती से नाटक को आगे बढाया गया. जिससे जानकारी तो मिलती ही रही साथ ही मनोरंजन भी भरपूर हुआ.

एसे नाटकों की कमी के कारण ही शायद हम आज उत्तराखंड के इतिहास को भुला चुके हैं, गिने चुने बुद्धिजीवी और इतिहास के छात्र ही इन एतिहासिक बातों को जानते हैं,बाकी सब बाज बहादुर से कई लोगों को भुला चुके हैं.

मुझे इस नाटक के बाद पता चला कि शाहजहाँ गडवाल को जीतने की कई नाकाम कोशिश कर चुका था, उसकी लाखों की फ़ौज रानी कर्णवती की सूझ बूझ के आगे घुटने टेक चुकी थी, तब बाज बहादुर मुगल बादशाह के पास पहुँचता है, अपनी तराई भाबर जीतने की इच्छा को साथ लिए,दोस्ती का हाथ आगे बडाता है,जिसे बड़ी चालाकी से मुगल बादशाह स्वीकार तो कर लेता है मगर साथ ही यह शर्त भी रख देता है कि पहले गडवाल जीतकर देना होगा.

बाज चंद तब गडवाल में मुगल सेना को लीड करते हुए युद्ध लड़ता है और अविजित गडवाल घाटी को जीतकर दिखाता है. इस जीत के बाद ही शाहजहाँ उसे एक उपाधी देता है ‘बहादुर’ बाज बहादुर.पहाडी राज्य को फैलाकर तराई भाबर तक लाने वाले बाज बहादुर चंद के जीवन के कई आयाम इस नाटक में दिखाए गए हैं. उसके मन में चल रहे द्वंदों को अभिनेता कैलाश कुमार बहुत ख़ूबसूरती के साथ प्रस्तुत करते हैं.

वहीं दूसरी तरफ दिव्या और दीक्षा उप्रेती अलग अलग किरदारों में नाटक में जान डाल देती हैं. पहाडी वाध्य यंत्र ढोल ,दमुआ,तीतुरी,शंख ,बिगुल हुडका के साथ इस संगीतमय नाटक में एक बहुत ही कर्ण प्रिय म्यूजिक दिया मनीष कुमार ने. छोलिया और जागर के बीच नाटक किस तरह आगे बडता है इसकी आप हल्की सी झलक इन वीडियो में देख सकते हैं.

 

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