बांगड़ूनामा

कुबाट

फरवरी 14, 2019 ओये बांगड़ू

कुमाउनी में लिखी गयी इस कहानी के लेखक हैं मशहूर कुमाउनी व्यंगकार विनोद पन्त, कहानी का हिंदी ट्रांसलेशन कहानी के आखिर में है

व्यंगकार विनोद पन्त

जूनियर हाईस्कूल में कक्षा छ:बटी आठ तक म्यार दगाड पढणी हरुलि अचानक फेसबुक में देखी गे कूंछा महराज . पुरांण दिन याद ऐ ग्याय . एकै दवात में डोब हालनेर भयां . मेर होल्डरक टांक टुट गे तो हरुलि दिनेर भै हरुलिक टांक टुटि गे तो मेरि कलमैलि लेखनेर भै . हरिलिक जी निब कें घोसिबेर मी बणूनेर भयूं लेखणी लायक . हरुलि और मी अलग अलग चटाई में एक दुसराक बराबर में बैठनेर भयां . बिलकुल पडौस में जस . पुर क्लास में हरुलि एक यसि चेलि भै जैक नांख बटी सिंगाडक तौड नि उनेर भै . भली भलि धीर गम्भीर जस वी भै बाकि चेलि वीकि सामणि में मेकैं छितरु जास लागनेर भाय . पढण लेखण में जरा कमजोर भै ढ्वाल पर देखींण चांण कौला तौ काकडक जसि फुल्यूड भै . जब पणित्ज्यू (आजकल मासाब या सर कूनन ) उकैं डन्ड माराल तो सीद म्यार कल्जूल लै लागनेर भै . जब मासाब मेकैं मारला तो हरुलि क मूख निचोडी जानेर भै मेछै पुछनेर भै खाडहानि – जोरैलि लागछी ?? बस वीक यदुक पुछण में सब पीड हरै जानेर भै . फिर मी बैगक पोथ ले भयूं खाल्ली फौंस मार दिनेर भयूं – नै नै के न हैरय . पर फिरले वीकै भीतरै भीतर जो नक लागिरूनेर वीकि गभाई वीक मूख दि दिनेर भै . सिबौ बिचारिक गोर फनार मूख कई जानेर भै थ्वाड देर क लिजी . उ नानीं भां मास्टर कैं गालि दे दिनेर भै .. नांस हैजाल तू मास्टर क . पर मजै कि बात भै जब मास्टर वीकैं मारलौ तब वीकैं गालि दिंण मैलि कभै नि सुण . यछैणी प्यार कून हुन्याल पैं .. आजि तुम मेकें जामनै बटी कामन झन समझिया यार . दिल भै क्वे ले उमर में धडक सकौं . उसके तो हरुलि क नाम हरिप्रिया भै पर वीक लाड क नाम (जछैं आजकल निक नेम कूनन ) हरुलि भै .
अहा क्या दिन छी . हरुलि क यां क्वे पौण पच्छी आय तो हरुलि बाल मिठ्ठै झ्वालून लुकैबेर मेर लिजी लि उनेर भै . वीकि ईजिके भिटोई ले आई होलि तो म्यर बान पक्क हुनेर भै . मी ले वीकि लिजी कटकि चहा बटी बची आदू मिसिरिक कणिक बचै बेर लूनेर भयूं और हाट्टाइम ( हाफ टाइम ) में इसकूलाक करयैडि जैबेर चीजनक आदान प्रदान हुनेर भै . कदिनै हरुलि इस्कूल नि आई तो म्यार धो दिन काटण है जांछी तसै हरुलि कैं ले हुन हुन्योल . दूसार दिन रत्ती ब्यांण पुछि हालनेर भै बेई कां छिये कैबेर . घर में कदुकै ले जरूरी काम हो इसकूल जरूर जानेर भयूं . इसकूल हरुलि क वीलि जांण हुनेर भै घर वाल सोचनेर भाय च्योल भौते भल छ छुट्टी नै करन .
तीन साल बिति ग्याय आब नौ में मी दुसार ईसकूल न्है गेयूं . हरुलि दुसार ईसकूल जांण भैगे . भौते दिन तक दुसार ईसकूल में मनै नि लाग . पर समय बलवान भै कि करींछी . कति वीक गौं क लौंड मौंड या चेलि देखी ग्याय तो वीक बार में पुछ बेर नराई फेडि लिनेर भयूं . एकाद बार देखीण ले आपुण ईज बाबू क दगाड . पर नै तो उ बुलाणि ना मी बुलाडयूं वीछैं . खालि आँखन देखी धौ करि हालि .
बाद में पत्त चलौ कि हाईस्कूल करी बाद वीक ब्या हैगो . मेर ले दिलैलि मनै मन वीकैं आशीक दे कि जां ले जै रैछी भलो घर बर मिल जौ ..
एक दिनै कि बात हरुलिक ब्या हई हफ्तेक है रौ हुन्योल मी आपुण गौं क नजदीक एक नानि नानि जसि बजार में बैठी भयूं तो पार बटी उनि हरुलि देखी गै . अहा रंगाई पिछौड में भौते बान लागण लागी भै . लाल लाल जसि साडि , लालै पिछौड , पैरी भै , तलि बटी मलि तक सुन में पिंगई हई भै . उसि गहिलि चाल में खुटन में पायलनैकि छम छम करनी म्यार मुख लै पुजि गे . पैली ले हरुलि मैलि देखिये भै पर आज इदुक भलि लागणै कि मेर कल्ज में धकधकाट हुण लागि गे . हरुलिक चकाचौंध में मी यो ले भुलि गेयूं कि क्वे वीक दगाड ले छ . हरुलि ऐबेर मेर सामणी वाल बैंच में बैठि गे . मेकैं एक बार चोर आँखनलि देखि बेर हरुलि लि नारी सुलभ लज्जा क कारण मुनि चौड करि दि . तब तक वीक दुल्हौ वीकैं उत्ती बैठैबेर सामान खरीदण दुसार दुकान में न्है गे .
मेर कल्जक धकधकाट बदस्तूर चलि भै . जब जरा सामान्य भयूं तो मैलि वीक मूख चाय और वीलि म्यार मूख . हमार बीच मूखैलि तो के फसक नि भाय पर आँखनै आँखन में धौ कै फसक फराव है ग्याय . शायद गिला शिकवा ले . तब तक वीक दुल्हौ ले पुजि गे . चाइयै रै गेयूं मी वीकैं . भल डील डौल वाल नौजवान भै . देखीण चांण ले . हरुलि क दगाड वीकि जोडि ले भली बणी भै . वीलि नजगीक ऐबेर हमन उज्यांण चाय .. तब तक हरुलि कूण लागि – यो फलांण गौं क बिन्दू गुरू छन .. म्यार क्लास फैलो छी नानछना . वीक दुल्हौ लि हाथ जोडिबेर कौय – गुरू पैलाग .. मैलि आशीष दे .. वीक दुल्हौ मेर तरफ देखण लाग तो मेर धकधकाट दुगुण हैगे . उ तो सामान्य तौर पर देखणय पर मेर मन भितरक चोरैलि तो डरणै भै .मी फटाफट उल्लै बटी दुसार जाग न्है गेयूं .
आज मेकें हरुलिक गुरू कूण ले भौते अजीब जस लाग .
खैर हरुलि राठनैलि सामान खरीद और बाट लाग गे . मी ले हरुलि कैं थ्वाड देर और देखणाक चक्कर में उनार पछिल एक निश्चित दुरी में बाट लाग गेयूं . हालाकि उनर मेर बाट एक नि भै फिर ले मी बाट हिटण भै गेयुं . हरुलि बार बार पछिल चांण लागि भै . पर मैलि नोट कर कि हरुलि कैं यसिके मेर पछिल लागण बिलकुल ठीक नि लागी भै . पर मी ले कि करछ्यूं हरुलि क आकर्षण मेकैं खीचण लागि भै .
जरा अघिल जैबेर मैलि आब आपुण गौं उज्याणि क बाट पकडनैकि सोचि और उनर बाट बटी जरा कच्च बाट उतरण बैठ्यू तो खुट रड बेर भडम्म कैबेर लोटि गेयूं .. शायद ध्यान हरुलि तरफ हुन्योल . हाथ खुट खरोडी ग्याय . मेर लोटीण कि आवाज हरुलि राठन तक ले पुजि गे . उ लोग दौडिबेर पछिल आय . हरुलिक दुल्हौलि मी उठायूं .. और कूण लाग – गुरू यो बाट जै कां जाणौछा .. मैलि कौय – शौटकट मारनछ्यू हो . हरुलिक दुल्हौलि कौय – अरे .. भली कै हिटिया पैं .. तब तक हरुलि ले नजदीक ऐगे .. वीक आँखन में मीलि उसै पीड देखि जस मेकें मास्टराक मारण में हरुलि क आंखन में ईसकूला दिनान देखींछी .. पर हरुलि क मूख बटी जो शब्द निकल उ मेर दिल पर जोर क असर कर ग्याय .
हरुलिलि बिलकुल मेर नजदीक ऐबेर कौय – कतु पीड हुणै … मैलि कौय .. के नै केने .. नै लागि .
हरुलि कूण लागि – गुरु ठुल हैगे छा आब तसिके कुबाट नै हिटि करो .. नानतिन ज कि छा तुम . जाओ .. भलीकै आपुण बाटै बाट और .. हम ले आब आपुण बाट लागनू . .
मेकें खिसैनि पडि गे . मैलि सोच अरे .. सही कूणै हरुलि . आखिर मी यो बाट जैबेर कां पुजन्यु .. मी तो वास्तव में कुबाट जांण लागि रौछ्यूं ..
हरुलि क बात सुणि बेर मी सीद पछिल मुड्यूं और बिना पछिल कै चाइयें वापस चलते हुए आपुण गौं क उज्याणि बाट लाग गेयूं …

हिन्दी 

मेरे साथ जूनियर हाईस्कूल में पढने वाली हरुली एक दिन अचानक फेसबुक में नजर आ गयी,एकदम से पुराणी यादों में खो गया,एक ही स्याही की दवात में कलम डालते थे,मेरी कलम की नोंक टूट जाती तो वह देती थी उसकी टूट जाती तो मैं देता था ,हरुली की कलम की नोंक को घिस घिस कर लिखने लायक मैं बनाता था,स्कूल में चटाई में एक दुसरे के अगल बगल बैठा करते थे हम दोनों,पूरी प्राईमरी क्लास में हरुली ही एकमात्र एसी लड़की थी जिसकी नाक नहीं बहती थी,एकदम धीर गम्भीर सी लडकी,बाकी लड़कियां उसके मुकाबले बहुत तेज थी,पढने लिखने में हरुली कमजोर थी लेकिन दिखने की इतनी सुंदर की कमजोर पढाई वाली कमी उसकी सुन्दरता से कम हो जाती थी.

जब मास्टर जी उसे डंडा मारते तो मेरे दिल में दर्द उठता,और जब मुझे मास्टर जी डंडा मारते तो हरुली के चेहरे के भाव बदल जाते,मेरे पिटने के बाद वह मुझसे पूछा करती थी कि ‘जोर से लगी क्या ?’ बस उसने इतना पूछ लिया सारा दर्द गायब हो जाता था,और मैं भी आखिर था तो लडका ही,यूं ही कह देता था ‘न न कुछ भी नहीं हुआ ‘ मगर फिर उसके दिल में हूंक उठती थी शायद,मेरे दर्द को उसका चेहरा बयाँ कर देता था,एकदम गोरी रंग वाली लडकी मेरे दर्द को खुद में झेलकर काली सी हो जाती थी,कभी कभी तो वह धीमी आवाज में मास्टर को गाली भी दे देती थी और मजे की बात यह थी कि जब मास्टर उसे मारते थे तब वह मास्टर को कभी गाली नहीं देती थी इसे ही शायद आजकल प्यार कह देते होंगे अब आप लोगो मुझे छिछोरा न समझना,आखिर दिल ही तो है किसी भी उम्र में धडक सकता है.उसका असली नाम हरिप्रिया था,और प्यार का नाम हरुली(जिसे आजकल निक नेम कहते हैं).

हरुली के यहाँ कोइ मेहमान आता था तो मेरे लिए वह छिपाकर बाल मिठाई लेकर आती थी उसकी मम्मी का भिटोला(मायके का गिफ्ट) भी आता था तब भी वह मेरे लिए एक हिस्सा छिपाकर ले ही आती थी,मैं भी उसके लिए चाय से बची हुई मिश्री लेकर जाता था,हाफ टाईम में दोनों जन स्कूल के पिछवाड़े जाकर इन सामानों का आदान प्रदान करते थे.किसी दिन हरुली स्कूल नहीं आयी तो उस दिन मेरा स्कूल में जी ही नहीं लगता था,और शायद एसा ही हरुली के साथ भी होता हो,दुसरे दिन सुबह सुबह पूछती थी ‘कल क्यों नहीं आया ‘. घर में कितना भी जरूरी काम हो मेरा स्कूल जाना जरूरी होता था,हरुली के कारण और घर वाले सोचते थे कितना अच्छा लड़का है एक दिन भी छुट्टी नहीं करता.

तीन साल बीत गए और हम नौवीं क्लास में आ गया,जमाने और स्कूल के दस्तूर के हिसाब से अब हमें अलग अलग स्कूल में जाना था,बहुत दिनों तक दुसरे स्कूल में मेरा मन ही नहीं लगा,लेकिन समय की मार थी झेलनी तो थी ही,लेकिन मैं हमेशा उसके गाँव के लड़कों से उसकी खैर खबर लेता रहता था और वह भी शायद मेरी खबर लेती हो.एक आद बार मैं अपने मम्मी पापा के साथ उसके गाँव भी गया,लेकिन उसके सामने आते ही न मैं कुछ बोला न वह बोली दोनों आँखों में ही एक दुसरे का हाल चाल लेते रहे.

दो साल बाद पता चला कि उसकी हाईस्कूल करते ही शादी हो गयी,अब मैंने भी दिल ही दिल उसे खूब आशीर्वाद दिया कि जहाँ भी जाए वह घरबार अच्छा हो पति अच्छा हो.

एक बार मैं अपने गाँव से कुछ दूरी पर रोड में एक जगह दूकान में चाय पी रहा था,हरुली की शादी को कुछ समय हो गया था ,अचानक मुझे दूर से हरुली आती दिखाई दी,पिछोड़ा,हाथ में चूड़ी ,श्रंगार (पहाड़ी) इसमें मैंने हरुली को पहली बार देखा था और मैं देखता ही रह गया मेरी नजर उससे हट ही नहीं रही थी,वह लाल साडी,पिछोड़ा,सोने के आभूषणों में अप्सरा लग रही थी और वह आकर सीधे मेरे सामने वाली कुर्सी पर चाय की दूकान में बैठ गयी,मैं अब भी उसे नजर नहीं हटा पा रहा था,मेरा दिल दुगनी गति से धडक रहा था.मैं यह भी भूल गया कि हरुली के साथ भी कोइ आया है,शायद उसका पति.हम दोनों आँखों ही आँखों में बातें कर ही रहे थे कि उसका पति आ गया सामने,एकदम लम्बा चौड़ा स्मार्ट बन्दा,हरुली और उसकी जोड़ी जबर्दस्त लग रही थी.उसने नजदीक आकर हम दोनों को देखा तब अचानक हरुली बोली ‘ये फलाने गाँव के बिन्दु गुरु हैं,मेरे क्लास फेलो थे ‘उसके दुल्हे ने मेरे से हाथ जोडकर नमस्कार की और मैंने भी आशीर्वाद दे दिया.उसके द्ल्हे को देखकर मेरे दिल की धडकन और तेज हो गयी और मैं वहां से निकल लिया.

आज मुझे हरुली का मुझे गुरु कहना कुछ अजीब लगा,खैर हरुली ने बाजार से सामान खरीदा और वह फिर अपने मायके की तरफ निकल लिए,लेकिन मेरा भी दिल आज कहाँ मानने वाला था ,बार बार उसे देखने की जिद पकड़े बैठा था और बस इसी जिद के कारण मैं भी चोरी चोरी उसके पीछे पीछे हो लिया,बिलकुल एसे कि उसे और उसके पति को पता न चले.

हालाँकि हम दोनों के रास्ते एक नहीं थे,लेकिन क्या करें दिल आज जिद्दी था,मैंने सोचा वहीं से कहीं से दूसरा रास्ता ढूंढ लूँगा,उधर हरुली ने मुझे पीछे आते देख लिया था वह कनखियो स मुझे देख रही थी,थोड़ी दूर तक पीछा करने के बाद मैंने अपना गाँव का रास्ता पकड़ लिया जो खराब था,उन खराब रास्ते में अभी कदम रखा ही था कि मैं फिसल गया और बड़ी जोर की आवाज के साथ गिर पड़ा.हरुली ने शायद वह आवाज सुन ली और वह दौड़ी आयी,आते ही उसने पूछा ‘क्या हुआ,कितना दर्द हो रहा है’

मैंने भी लडके वाला आंसर दिया’न न बिलकुल नहीं हो रहा ‘

हरुली बोली ‘गुरु,बड़े हो गए हो अब,ये बच्चो वाली हरकतें मत किया करो,एसे कुबाट(खराब रास्तों) से कौन जाता है,अपना रास्ता पकड़ो और सीधे सीधे जाओ’.

मुझे बड़ी ग्लानी सी हुई,मैंने सोचा कि ये सही कह रही है,आखिर मैं इस रास्ते से कहाँ पहुंचूंगा,मैं तो सच में कुबाट जा रहा था.’

हरुली की बात सुनकर मैं बिना पीछे मुड़े,अपने गाँव के रास्ते की तरफ चल निकला .

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