ओए न्यूज़

जॉन एलिया जिसने ताउम्र हिंदुस्तान को खुद में कैद रखा

दिसंबर 19, 2018 ओये बांगड़ू

निकल आया मैं अपने अन्दर से

अब कोई डर  नहीं है  बाहर से

अब जो डर है मुझे तो इसका है

अन्दर आ जाएँगे मेरे अन्दर से

जॉन जौनियत जिन्दाबाद !

यों तो लोग जॉन को महज़ एक पाकिस्तानी शायर समझते हैं , जॉन भले ही वहाँ रहे पर अपने वतन की मिट्टी से ख़ुद को कभी अलग नहीं कर पाये वो हिन्दुस्तान को दिल के किसी कोने में किसी उम्र कैद के कैदी की तरह कैद किये रहे, जो जिंदगी उन से कट नहीं रही थी उस पर उन्होने कुछ यों कहा है-

‘जो गुज़ारी न जा सकी हम से

हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है …

और इस तरह 8 नवम्बर 2002 को जॉन ने आख़िरी साँस लेकर रूख़सत हो लिए पर जॉन आज भी जिन्दा हैं,कभी किसी ग़जल में किसी शेर में जॉन के चाहने वाले कमी नहीं है , उनसे राब्ता रखने वालों को गिन पाना मुश्किल है सिर्फ भारत पाकिस्तान ही नहीं जॉन ने दुनिया भर के लोगों के दिल में बसते है.

‘जाने वालों से राब्ता रखना

दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना

निदा फ़ाजली

जॉन ने मुहब्बत भी बड़ी शिद्दत से की ताउम्र ख़ून थूकता रहा वो शख़्स होकर चूर इश़्क में –

‘चर्के तो तुझे दिये हैं मैने

पर ख़ून भी मैं ही  थूकता हूँ

जॉन मज़हबी फर्क से अलग इंसान थे उनकी इक ग़ज़ल के कुछ शेर देंखे –

धरम की बाँसूरी से राग निकले

वो सूराख़ों से काले नाग निकले

 

वो गंगा जल या हो आबे-ज़मज़म

ये वो पानी हैं जिन से आग निकले

 

पिलाया था हमें अमृत किसी ने

मगर मूँह से लहू के झाग निकले

हालांकि जॉन को पढ़ कर जॉन को जान जाना आसान नहीं है .फिर भी जॉन का लिहाज़ किया जाना चाहिए .

राजीव भारती 

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