यंगिस्तान

किस्सा पड़ाव का

जुलाई 27, 2017 ओये बांगड़ू

विनोद उप्रेती कहते हैं कि वो लेखक नहीं हुए, लेकिन लिख एसा डालते हैं कि लेखकों को खुद को लेखक कहने में शर्म आ जाए. ये उनका पहला लेख है हमारे साथ. बांगडू एक बात को सिद्दत से नोट कर रहा है कि खुद को लेखक न मानने वाले लोग अच्छे खासे लेखकों से अच्छा लिख कर देते हैं

लेखक विनोद उप्रेती

बीस बाईस साल पहले की बात है. हमारे गाँव के ऊपर के डाणे(ऊंची जगह) में एक दस दुकानी बजार थी जहाँ कंट्रोल की दुकानें और रोड का आखिरी सिरा था. इसका एक सुन्दर सा नाम भी था पर इसे लोग पड़ाव कहते थे. कोई मारने न आ जाये इस डर से जगह का नाम नहीं लिख रहा हूँ. हमारे घरों में नून- तेल और राशन पानी यहीं से आता था, इसी वजह से हम गधेरे वाले इस जगह को किसी शहर से कम नहीं मानते थे. या यूँ कहें कि किसी शहर के बारे में सुनते तो मन में इसी जगह का चित्र बनता. हमारे गाँव में बिजली नहीं थी, हम लम्फू(लैम्प जैसा) के उजाले में पढ़ते थे जिसकी वजह से हमारी नाक से सुबह मुंह धोते बखत खूब सारा झाला(काला,काला ) निकलता. खैर किसी तरह हम भी गाँव छोड़कर इस जगह के वाशिंदे हो गए और यहीं स्कूल पढ़ने लग गए. यहाँ आकर पता चला कि बिजली क्या होती है, शुरू- शुरू में तो बल्ब जलते ही खुशबू जैसी महसूस होती थी. इस जगह की तो हजारों यादें हैं जो लिखी जा सकती हैं पर आज मुझे अनजान वजहों से भगत जी की कहानी याद आ गयी.
भगत जी सेना से सूबेदार रेंक से रिटायर थे. बड़े राम भक्त थे और खांटी कांग्रेसी. लेकिन राम के नाम पर एक बार कल्याण सिंह के पक्ष में भी वोट कर आये, हालाँकि उसके बाद उम्र भर विधायक को माँ बहन की गालियाँ देते रहे. भगत जी इलाके के जाने माने सयानों में शुमार थे. गुस्से में आते तो दुर्वासा भी डर जाय. उन दिनों हमारे यहाँ मुख्य धारा के अलीट क्लास देवताओं के मंदिर तो थे नहीं इसलिए भगत जी मलैनाथ द्वारा इंद्र लोक से अपहृत किये बालक के मंदिर में हर मंगल को सुन्दर काण्ड पढ़ने जाते. हमारे पिताजी ने हमें संस्कारी बनाने की सदिच्छा से हमको भी उनके साथ भेजना शुरू कर दिया. हम कितने संस्कारी बने यह तो सोचने वाला सवाल है लेकिन पढ़ने की आदत जरूर उपज गयी. दोनों हाथों में खड़ताल लिये भगत जी गाते- गाते अचानक जोश में आकर कूदने लगते थे. पहली बार तो उनको देखकर मुझे ऐसी झसक(डर) पड़ी कि थोड़ी देर तक मैं नून खाए मुर्गे जैसा झुरा(रोंये खड़े हो जाना) गया. उन दिनों राशन की दुकान में मिट्टी का तेल नीले रंग का नहीं आता था. बिलकुल पानी सा साफ़ आता और हम पन्द्रह रूपये में पांच लीटर का जार भरवा लेते थे. हमारा खाना उस बजार में इसी तेल से जलने वाले स्टोव में बनता.
भगत जी हर मंगल को मंदिर जाते तो देवता को चढ़ाने के लिये हमारे ही घर से पानी ले जाते थे. एक बार भगत जी अपना झोला टाँगे भागते हुए आये, पांच लीटर के जार से अपने लोटे में पानी उड़ेला और निकल लिये मंदिर की तरफ. मंगलवार था, सुन्दरकाण्ड पढ़ना था इसलिए पिताजी ने हमें भी उनके साथ लगा दिया. हम दोनों भाई भगत जी के बगल में बैठकर सुन्दरकाण्ड की किताब पर ध्यान लगाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जैसे ही भगत जी खड़ताल बजाते हुए जोश में उछाल काटते हमारे लिये हँसी रोकना बड़ा मुश्किल हो जाता था. जोर- जोर से सुन्दर काण्ड पढ़ते- पढ़ते अचानक उनका गला अखर(सूख) गया तो उन्होंने वह लोटा हाथ में लिया जो हमारे घर से भर के आये थे. जैसे ही लोटे से एक घूँट मुंह में गयी, भगत जी अपनी जगह से तीन फुट ऊपर उछल गए. थू… थू….आक थू की आवाज के साथ जो गालियाँ उनके मुंह से बरसने लगी उनका जिक्र करना बेकार ही है. फिलहाल उस दिन के बाद हमको भी सुन्दरकाण्ड पढ़ने से छुट्टी मिल गयी. भगत जी तो बिला नागा हर मंगल को मंदिर जाते ही रहे लेकिन अब वह जार को सूंघ कर पानी लेते क्योंकि उस दिन बेचारे पानी की जगह कैरोसीन ले बैठे थे. भगत जी का सुन्दरकाण्ड और खड़ताल चलता ही रहा और उनका भक्तिभाव भी यदा कदा दिख जाता.
इसी बीच अखबारों में ख़बरें आने लगी कि गणेश जी की मूर्तियाँ दूध पी रही हैं. शुरू में इस बात पर भगत जी को यकीन नहीं था लेकिन स्टाफ के बाकी भगत जो उनके हम- चिलम थे इस बात पर विश्वास करने लगे थे. एक बार बूटी की धुन में स्टाफ के दूसरे भगत के मुंह से निकल पड़ा कि भगवान उसी के हाथों से दूध पी रहे हैं जिसकी भक्ति बिलकुल सच्ची है, जो दिखावेबाज हैं उनके हाथ से भगवान दूध नहीं पी रहे. तब व्हाट्सएप विश्वकोष तो था नहीं और न गूगल महराज कि जिनसे ज्ञान की बारिश हो जाती. यहाँ तक कि उस छोटी सी बाजार में कुल टीवी भी पांच ही थे. उनमें भी आज की तरह तेज और सबसे तेज न्यूज चैनल नहीं आते जिससे कि भगत जी को सत्य का ज्ञान होता. अब अपनी भक्ति को सच्चा साबित करें तो कैसे. भगत जी बैचैन हो गए, दूध पिलायें तो किसे, गणेश जी का तो कोई मंदिर था ही नहीं. उन्होंने सोचा गणेश नहीं तो क्या हुआ बालक का मंदिर तो है. मेरी भक्ति में दम हुआ तो यह भी दूध पियेंगे. चल पड़े लोटे में दूध लेकर. जैसे ही संगमरमर के बुत के मुंह में चम्मच लगाया दूध कम हुआ ही नहीं. बेचारे भगत जी ने बहुत कहा कि पी लो पर भगवन ने नहीं पिया. भगत जी के अंदर का सूबेदार ऐसा जागा कि वह दिन भुलाए नहीं भूलता. गुस्से में बौखलाए आ गए बाजार में वापस और जोर से चिल्लाने लगे…. नहीं पी रहा माद….. भैन …..मुझे अब समझ आता है कि भगत बीस बाईस साल पहले भी वैसे ही थे जैसे आज हैं. अगर उनके मन की नहीं हुई तो अपने भगवान् की भी वाट लगाते देर नहीं लगाते. एक बात और समझ में आ गयी कि कोई सूबेदार अगर कुछ खिलाये तो चुपचाप खा लो. नहीं तो गाली खानी पड़ सकती है. अब भगत जी संसार में नहीं लेकिन तमाम खामी खूबियों के साथ उनकी कहानियां मेरे मन में हैं. सॉरी भगत जी मिट्टी के तेल वाला किस्सा आज बाहर निकल ही गया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *