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अनदेखी का शिकार देश के अन्नदाता आज संसद के सामने

नवंबर 30, 2018 ओये बांगड़ू

दिल्ली में आये किसानों को सबसे ज्यादा कवरेज सोशल मीडिया का एफबीलाईव दे रहा है। बाकी टीवी चैनल ने जितनी कवरेज बाबा रामरहीम की गिरफ्तारी को दी थी उसकी एक चौथाई भी इन किसानों को मिल जाती तो शायद संसद में इनकी आवाज बहुत ज्यादा गूंजती।

खैर एक और बात संज्ञान में आई, किसानों के द्वारा कमाए जा रहे अंधाधुंध मुनाफे पर कुछ लोगों की भयंकर टिप्पणी सुनने को मिल रही है. तो इस टिप्पणी पर हमने राय की धरने में मौजूद किसान राजेन्द्र से। राजेन्द्र इस सोशल मीडिया में फैल रहे मेसेज पर कहते हैं कि देखो भाई 18000 का बीज, आठ महीने का समय, देखभाल रखरखाव, मजदूर(खेतों में काम करने वाले) की दिहाड़ी। सब मिलाकर हमे पड़ता है मान लो 1 लाख का, सरकार खरीदती है एक लाख 18 हजार का 20 हजार का 25 हजार का।

तो हमने 8 महीने में कितना कमाया? 25 हजार मैक्सिमम। आप लोग कितना कमाते हो इस 8 महीने में? और नुकसान हुआ तो वो किसका?

देखिए, हम अपने खाने के लिए खेतों में उगा लेते हैं इसका ये मतलब नही हमें पैसों की जरूरत नही पड़ती, हमारे भी बच्चे हैं  उन्हें भी स्कूल भेजना है। उन्हें भी पढ़ाना है।

खैर छोड़िये, मुद्दा ये है कि कवरेज कितना मिल रहा है, तो सर जी टीवी में इन्हें उतना ही दिखाया जा रहा है जितना कैडबरी की चॉकलेट में काजू डाला जाता है। स्वाद आया तो ठीक वरना खाली फील कर लो कि काजू खाया था

अभी भी चैनलों का फोकस राजनीती आरोप प्रत्यारोप पर जोरो से है , एंकर चिल्ला रहे है पाकिस्तान गेम पर, सिद्धू की दोस्ती और इमरान की गूगली पर . कोई सिद्धू को सही ठहराने में लगा है तो कोई गलत . एक दूसरा चैनल मुद्दा गर्म में बिहार की राजनीती का रोना रो रहा है. कही हमेशा की तरह कश्मीर का मुद्दा सुलझाने में लगा है तो कोई राजस्थान पहुंच कर राज्य सरकार में रही रानी के गुणगान गाने में लगे है. और इन सबसे ऊपर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के पीछे दौड़ने वाली डीएम साहिबा के दौड़ने की तारीफ की जा रही है.

बाकी किसानों को कर्ज मुक्त बनाने और फसल की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिए जाने की मांग को लेकर दिल्ली पहुंचे किसानों के 200 से ज्यादा संगठन जनता से ‘माफ़ कीजिएगा’ के साथ अपना दर्द पैम्फलेट के जरिए भी बयान कर रहे है. इन किसानों को मीडिया कवर नहीं करना चाहता ,राजनीती में यह सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बने हुए है और आए दिन ज़िन्दगी से परेशान हो कर आत्महत्या करने को मजबूर हुए है. दिल्ली में संसद तक मार्च कर रहे किसानों की बात पर एक मिनट निकल कर जरा आप भी ध्यान दीजिए.

 

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