ओए न्यूज़

केदारनाथ के बहाने

दिसंबर 7, 2018 कमल पंत

आज जगह जगह से हिंदूवादी संगठन केदारनाथ फिल्म को बंद करने की मांग रहे हैं, उन्हें लगता है ये संस्कृति का नाश है वगेरह वगेरह,हालांकि फिल्म संजय लीला भंसाली की नहीं है इसलिए मामला तूल नहीं पकड रहा मगर इस बीच में मुझे मेरे बचपन में पिताजी द्वारा बताई एक बात याद आ गयी.

हुआ यूं था कि मेरे गाँव वाले कस्बे बेरीनाग में तब कुछ ही मुस्लिम फैमिली थी,एक चूढी,सिन्दूर ,सिन्दूर पिटारी वगेरह बेचने वाले दाढी वाले मुल्ला जी को मैं बड़े गौर से देखा करता था,इतने हिन्दुओं के बीच यह रह किसे लेते हैं वह भी एसी जगह जहाँ जातिगत भेदभाव बहुत ज्यादा है.गाँव में तो एससी एसटी पानी तक हमारा छुआ नहीं पी सकते लेकिन इसके यहाँ हाथ आगे कर करके चूढी पहन रहे हैं.मंदिर के लिए सामान ले जा रहे हैं. मेरे लिए ये आश्चर्य का विषय था.

तो किसी तरह से उनके बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी.तभी पिताश्री के जरिये उनसे बात भी हो गयी. बातों बातों में पता चला कि वह मुस्लिम से पहले तिवारी थे,कोइ गाँव का नाम भी बताया जो याद नहीं अब. ये एकदम नया था कि ये कैसे हो सकता है,कोइ अपना धर्म कैसे छोड़ सकता है. उन्होंने ही इस पर प्रकाश डाल दिया ,बोले गरीबी बहुत ज्यादा थी इसाई मिशनरी और मुस्लिम कम्यूनिटी में आने पर कुछ पैसा और जमीन मिल जाते थे तो उस समय की भुखमरी खत्म करने के लिए उनके परदादाजी ने मुस्लिम होना स्वीकार कर लिया.क्योंकि पेट की भूख पहले है.मंदिर का पुजारी तो कुछ खाने को नहीं दे रहा था,हालात बद से बदतर होते जा रहे थे,कई कई हफ़्तों के फाकों के बाद एक या दो रोटी नसीब होती थी एसे में धर्म बदलकर अगर रोटी मिल रही थी तो उन्होंने धर्म बदलना स्वीकार कर लिया.बदले में रोजगार भी मिला और पैसे भी,परिवार के भरण पोषण का अच्छा प्रबंध हो गया.

मैंने पूछा आपने वापस हिन्दू धर्म क्यों नहीं अपना लिया जब सब ठीक हो गया था तो,बोले मेरे लिए तो आसान था हिन्दू बन जाना क्योंकि परदादा मुस्लिम हुए थे परिवार नहीं.मगर हम ऊंची जाती में म्लेच्छ हो गए. परदादा के धर्म बदलते ही हमारा भी सामाजिक बाहिष्कार हो गया.मेरे पिताजी ने बहुत कोशिश की वापस हिन्दू धर्म अपना लेने की.मगर कोइ अपनी लडकी शादी के लिए देने को तैयार ही नहीं हुआ. सबकी नजर में हम अछूत से भी गए गुजरे थे.

अब लेकिन मन भी नहीं करता वापस होने का,एक समय पिताजी के मन में बहुत ख्वाहिश थी हिन्दू बन जाने की मगर अब हमारी कोइ इच्छा नहीं.उस समय बन जाते तो बन जाते.हमारे आस पास कई लोगों ने इसाई धर्म स्वीकार किया.

वह जानते हैं कि वह तिवारी थे यही बड़ी बात है,बाकी चीजों से उन्हें कोइ मतलब नही था,उनके जानने वालों में उनके गाँव के रिश्तेदारों में सबको पता था कि वह उन्ही के परिवार के हैं मगर किसी ने मदद नहीं की वापस हिन्दू बनने में . लेकिन यहाँ अच्छा व्यवहार हुआ,पेट भरने का जुगाड़ मिला,शादियों के लिए लड़कियां देने से किसी का इनकार नहीं था तो बस यहीं रह गए.हाँ कस्बा नहीं छोड़ा ,उसका भी आप्शन था ,यहीं रोजगार जमा लिया.

केदारनाथ फिल्म केदारनाथ में काम कर रहे एक मुस्लिम की है जो वहां खच्चर घोड़ों से यात्रियों को पहाड़ की चढाई पार करवाता है,एसे बहुत से लोग मंदिरों के आस पास काम करते हैं.उनके अंदर की फीलिंग आप नहीं जान सकते.वह सिर्फ पैसे कमाने नहीं गए हैं वहां उनका कुछ और जुड़ाव है.

दिल्ली में एक मंदिर के गेट पर मुस्लिम व्यक्ति घंटियाँ बेचा करता है,वह कहता है कि काम और भी हैं मगर इस काम में अन्दूरनी शांति मिलती है,किसी की मन्नत में,किसी की दुआ में हम एक छोटा सा जरिया बन जाते हैं तो दिल खुश हो जाता है.

खैर मन्दिर मस्जिद बांटने वालों को ये सब समझ नहीं आएगा.क्योंकि गंगा जमुनी तहजीब उनके लिए एक ढोंग है दिखावा है.मगर भारत के इतिहास में राम नाम की पालकी में रहीम ही सबसे आगे नाच रहा होता है ‘राम जी की निकली सवारी’ . शाहरुख अपने घर में गणेश चतुर्थी मनाता है,मगर हम ईद में गले मिलने में डर जाते हैं.

केदारनाथ के बहाने राम मन्दिर जपने वालों को भोले माफ़ नहीं करेंगे याद रखना.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *