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कौन सही कौन गलत ?

मार्च 28, 2018 कमल पंत

बहुत सी ख़बरें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि आखिर हम किस तरफ जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं.हमारा प्रशासन हमारे लिए सही कर रहा है या गलत इस बात का फैसला करने में हम असमर्थ हो जाते हैं और उसके बाद निकलने लगते हैं बातों के अनेक अर्थ. बहुत सारे उदाहरण आपके आस पास ही मौजूद हैं. अभी जैसे नोटबंदी हुई ,जीएसटी लगा सब होने के बाद अभी तक समझ नहीं आया कि फायदा किसका हुआ क्योंकि एक जनता के रूप में हम तो एसा ही फील कर रहे हैं कि प्रशासन ने ठग दिया. आप ज्यादा कुछ मत कीजिये अपने आस पास होने वाली घटनाओं से सबक लीजिये वहां से आपको पता चलना शुरू होगा कि असल में आप ठगे जा रहे हैं या आपके साथ अच्छा हो रहा है. पिछले कुछ सालों में रिपोर्टिंग के दौरान कुछ अनुभव हुए तीन केस नीचे लिख रहा हूँ जिसमे प्रशासन ने क्या किया ये समझ नहीं पाया,केस पूरी तरह लोकल हैं.

श्रीराम कालोनी दिल्ली में आज से कुछ साल पहले हुए एसे ही एक संभावित दंगे को रोकने के लिए पुलिस ने तुरंत एक समुदाय को घेर लिया और उनका कुछ समय के लिए बाहर निकलना रोक दिया क्योंकि पुलिस को डर था कि कहीं दोनों समुदाय आपस में मारपीट न करने लग जाएँ. उधर दुसरे समुदाय के मुखिया का कहना था कि पहले जब हमें पीटा गया तब पुलिस मूकदर्शक बनी थी और जब हम उन्हें पीटने को आगे बड़े तो हमें बन्दूकों की नोक पर एक स्थान में रोक दिया गया. पुलिस का कहना था कि स्थिति को नियन्त्रण में लाने के लिए एसा किया जाना बहुत ज्यादा जरूरी था,स्थानीय लोगों का कहना था कि राजनितिक शह में ये सब हुआ. आगे इस मामले में दोनों पक्षों में सुलह करवा ली गयी लेकिन असल मामला क्या था ये आज तक पता नहीं चला ,क्यों आखिर स्थितियां बेकाबू हुई ,? क्यों एक पक्ष को मारपीट करने दिया गया? दुसरे पक्ष को रोकना क्या सच में स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिए किया गया उपाय था या कोइ राजनितिक प्रभाव में एसा किया गया ?

एसे बहुत से उदाहरण हमारे आस पास मिलते हैं जिसमे प्रशासन के कामों में संदेह पैदा हो जाता है, एक बुजुर्ग महिला के पति की मृत्यू के बाद उसकी सारी प्रापर्टी किरायेदारों ने हडप ली करोड़ों की प्रापर्टी के लिए आठ दस लाख खर्च करके उसके किरायेदार ने नकली प्रापर्टी के पेपर बनवा लिये,मामला कोर्ट तक गया कोर्ट में भी वृद्धा को न्याय नही मिल पाया.कोर्ट परिसर में ही मौजूद एसडीम ने वृद्धा को हाईकोर्ट में अपील करने की सलाह दी .वृद्धा निसंतान थी और उम्र भी काफी हो चुकी थी वह कोर्ट कचहरी से उकता गयी थी उसने एसडीएम साहब से कोइ और रास्ता निकालने की गुजारिश की तो उन्होंने दुसरे पक्ष को इस बात के लिये राजी करवा लिया कि वो एक निश्चित रकम वृद्धा को हर महीने भेजेंगे और बदले में वृद्धा आगे से उन पर कोइ कोर्ट केस नहीं करेगी. मामला सुलझ गया लेकिन ये समझ नहीं आया कि एसडीएम साहब ने असल में मदद किसकी की.???

एक सरकारी हास्पिटल में मामूली से बुखार के लिए एडमिट हुए एक मरीज की गलत इंजेक्शन लगने के कारण हालत गम्भीर हो गयी,दुसरे निजि हास्पिटल के डाक्टर ने इस बात की पुष्टी भी कर दी कि इन्हें कोइ गलत इंजेक्शन लगा दिया गया है.मरीज के भाई ने पुलिस में कम्प्लेंट करने का मन बना लिया,समस्या यह थी कि उस गलत इंजेक्शन की जानकारी नहीं मिल पा रही थी, इधर प्राईवेट हास्पिटल में सिरियस हुए मरीज का बिल लगातार बड़ता जा रहा था. मरीज के भाई ने सीधे डाक्टर से बात करने की ठानी और उसे कहा कि उस पर कार्रवाई होगी,पहले डाक्टर ने थोड़ी अकड दिखाई और ये भी कहा कि मरीज जिस हास्पिटल में चला जाता है उस हास्पिटल के डाक्टर की सारी जिम्मेदारी होती है उसकी नहीं . लेकिन डाक्टर भी जानता था कि उसकी गलती है उसने मरीज के भाई से मानवता के नाते कहा कि वो निजी रूप से उनकी मदद करने को तैयार है .मरीज की प्राईवेट हास्पिटल में डेथ हो गयी और डाक्टर ने हास्पिटल का सारा बिल चुका कर मरीज के परिवार पर एहसान कर दिया,बदले में मरीज के परिवार जनों ने कोइ केस दर्ज नहीं कराया.
बिल चुकाने भर से डाक्टर की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है ?
एसे बहुत से केस रोजाना अलग अलग रूपों में सामने आते हैं जहाँ हमारा प्रशासन हमारी मदद कर रहा होता है.    लेकिन क्या वो सच में हमारी मदद कर रहा होता है ?

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