गंभीर अड्डा

कर्बला कथा -अध्याय 8

अक्टूबर 21, 2016 ओये बांगड़ू

हुसैन के मरने के बाद उसके परिवार के साथ क्या हुआ ये शायद मोहर्रम के किस्सों में शामिल नहीं है , इतिहास के आईने से मोहर्रम की एतिहासिक घटनाओं पर लिखा है हैदर रिजवी ने . इतिहास से मोहर्रम को समझना चाहते हैं तो ये कर्बला कथाएं जरूर पढ़ें .

हुसैन के क़त्ल के बाद हुसैनी ख़ेमों में मर्दों के नाम पर केवल सय्यदे सज्जाद बचे थे. सय्यदे सज्जाद हुसैन के बेटे थे, और बुरी तरह बीमार थे. युद्ध काल के अधिकतर समय वोह बुखार से मूर्छित ही रहे. फिर भी युद्ध करना चाहते थे किन्तु हुसैन ने मना कर दिया, ताकि हुसैन के बाद कोई फातिमा का वंश चलाने वाला और ज़ालिमो का विरोध करने वाला ज़िन्दा रहे.

यज़ीदी सेना के घुड़सवार खेमों में घुस आये, हुसैनी खेमों में आग लगा दी. जैनब दौड़ दौड़ कर जलते हुए खेमों से बच्चों को गोद में लेकर लेकर बाहर निकाल रही थीं. औरतों बच्चों में कोहराम मच चूका था. बच्चे घबरा घबरा कर रेगिस्तान में इधर उधर भाग रहे थे. सूरज डूब चूका था अँधेरा बढ़ने लगा था. दूर दूर तक केवल खेमों की आग और चीख पुकार ही भरी हुई थी. शिम्र ने हुसैन की छः वर्षीय बेटी सकीना के कानों के बूंदें नोचे, बच्ची के कानों से खून फूटने लगा, वोह घबरा कर जंगल की तरफ भागी. बहुत देर तक यूं ही लूट पाट चलती रही. मुहम्मद की बेटियाँ अरब मुसलमानों से भीख मांग रही थीं, और मुसलमान हरे कुरते पहने शाम की गलियों में इतराता फिर रहा था.

रात सन्नाटा होने के बाद भागे हुए बच्चों को ढूंढना शुरू किया जैनब ने. सारे बच्चे मिल गए सकीना न मिली. सहरा की तरफ बढीं, सकीना एक सर कटी लाश के सीने पर सो रही थीं. जैनब ने सकींना को आहिस्ता से जगाया, और वापस चलने को कहा. सकीना नहीं मानीं के यह मेरे बाबा का सीना है, मैं हमेशा की तरह यहीं सोऊँगी.

इधर यज़ीद के खेमों में इब्ने ज़ियाद के सामने सभी हुसैनियों के सर रखे जाने लगे. 71 सर थे, एक सर गायब था. किसी ने कहा उस बच्चे का सर नहीं है, जिसे हुसैन पानी पिलाने के लिए लेकर आये थे. घुड़सवार भेजे गए. घुड़सवार मैदान में घोड़े दौडाते और बर्छियां ज़मीन में घुसाते. आख़िरकार एक बरछी में फंसकर एक छः महीने के बच्चे की लाश निकल ही आई.
सभी औरतों बच्चों को गिरफ्तार किया गया. औरतों को सर ढकने के लिए कोई चादर नहीं दी गयी. उन्हें ऊंटों के पीछे लाइन से बाँध दिया गया. बच्चों को 10-10 /11-11 बच्चों के झुण्ड में ऊंटों की नंगी पीठ पर बाँध दिया गया. सबसे आगे आगे भालों पर सभी हुसैनियों के सर उठाये गए. सय्यदे सज्जाद के पैरों में मोटी लोहे की बेड़ियाँ डाली गयीं और गले में लोहे के दांत लगा हुआ लकड़ी का भारी तख्ता.काफिला इसी तरह से चलाया गया.

काफिले को पहले कूफा ले जाया गया फिर शाम यजीद के पास. रास्ते में जब ऐसा लगता कि औरत या बच्चा प्यास से मर जायेगा या बेहोश हो जाता तभी उन्हें पानी दिया जाता था. औरतें बच्चे यदि सामने बर्छियों पर उठे हुए सरों को देख कर रोतीं तो उन्हें तमाचे मारे जाते थे, किसी को रोने की आज्ञा नहीं थी (आज भी हुसैन पर रोने की आज्ञा नहीं देते ये मुसलमान). रास्ते भर यज़ीदी काफिला जिस गाँव शहर से गुज़रता यह मुनादी करता हुआ चलता था की यह खलीफा के गद्दार और काफिर थे इसलिए इन्हें ये सजा दी गयी है. लोग भी कैदियों पर पत्थर बरसाते और थूकते. किसी को असलियत नहीं पता थी कि यह कैसा काफिला है.

एक गाँव में जब यह काफिला रुका और सेना खाने पीने में व्यस्त हो गयी तभी जैनब के पास गाँव की एक बूढी औरत अपने जवान बेटे को लेकर आई. और कहा ऐ बेटी मैंने सुना है कैदियों और यतीमों की दुआ खुदा जल्दी सुन लेता है, मेरे बेटे के लिए दुआ कर दो. जैनब ने उसके बेटे के लिए दुआ कर दी. फिर कहा बेटी एक दुआ और कर दो कि मैं एक बार मदीना चली जाऊं. जब जैनब ने अपने वतन का नाम सुना तो तड़प गयीं, बोलीं मदीने में तुम्हारा कौन है? बुढिया ने कहा यूं मेरा अपना तो कोई नहीं लेकिन सुना है मदीने में मुहम्मद का परिवार आज भी रहता है, वहां मेरे मौला अली की बेटी जैनब रहती हैं, मैं मरने से पहले एक बार उनका दर्शन करना चाहती हूँ. जैनब तड़प गयीं बोलीं ऐ जईफ़ा तुम्हारी यह दुआ तो कुबूल हो हो गयी, मैं ही हूँ वोह अली की बेटी जैनब……..

यह काफ़िला इसी तरह पैदल घुमाया जाता रहा. यदि सबसे कम दूरी भी देखि जाय तो कर्बला से कूफा 84 किमी दूर है और कूफ़ा से शाम(यजीद का महल) की दूरी 150 किमी. यह काफ़िला शाम के समय यजीद के दरबार पहुंचा. लेकिन यजीद क्युकी अपनी अय्याशियों में व्यस्त था इसलिए कैदियों को बाहर ही रुके रहने का आदेश दिया गया. औरतें बच्चे जंजीरों में बंधे पूरी रात महल के बाहर खड़े रहे. सुबह की नमाज़ के वक़्त यज़ीद बाहर आया और सय्यदे सज्जाद जो सर झुकाए खड़े थे उन्हें देख व्यंग्य से बोला ” क्यों सय्यद , अब तो समझ में आ गया होगा न कौन जीता और कौन हारा” तभी पीछे से सुबह की अज़ान की आवाज़ गूंजी. सय्यदे सज्जाद ने नज़रें यजीद की नज़रों में डालीं और एक ऐतिहासिक जवाब दिया ” ऐ यज़ीद अगर तेरे महल में हो रही इस अज़ान में तेरे बाप का नाम लिया जा  रहा है, तो तू जीत गया. और अगर मेरे बाप का नाम लिया जा रहा है, तो मैं जीत गया”

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कर्बला कथा -अध्याय 7

1 thought on “कर्बला कथा -अध्याय 8”

  1. आप का कर्बला अध्याय काफी अच्छा है . इस अध्याय में आप ने इमाम हुसैन (अ.स.) की बेटी जनाबे सकीना की उम्र 6 वर्ष दी है जो की गलत है . उनकी उम्र उस वक्त महज़ 4 बरस थी . कृपया इसे सही कर लें .

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