गंभीर अड्डा

कर्बला कथा – अध्याय : 1

अक्टूबर 12, 2016 ओये बांगड़ू

मोहर्रम को ठीक से समझने के लिए इस्लाम के उस हिस्से को समझना जरूरी है जहाँ से ये सब शुरू हुआ . हैदर रिजवी उसी दौर को आसान शब्दों में हमें समझा रहे हैं. इसके लिए इतिहास में जाना पड़ेगा, उस दौर को समझना पड़ेगा. पेश है कर्बला कथा जिसकी पहली किश्त आज सबके सामने है आगे और भी अध्याय आते रहेंगे.

680 ईस्वी में अरब देश में मक्का, मदीना, यमन, कूफ़ा, बसरा, शाम कुछ बड़े शहर थे, जो सत्ता के साथ साथ धर्म (इस्लाम) के भी केंद्र माने जाते थे. 632 ईस्वी में मुहम्मद साहब ने अपना शरीर त्यागा और 661 ईसवी में शाम(सीरिया) के शासक मावियाह ने खुद को खलीफ़ा घोषित कर दिया. मावियाह की मृत्यु के पश्चात उसका बेटा यज़ीद 680 ईस्वी में मात्र 33 वर्ष की आयु में खलीफ़ा बना. जिसे अरब के अधिकाँश बड़े मुस्लिम परिवारों की “राज निष्ठा” (बैय्यत) प्राप्त थी. शाम अरब देशों के सबसे अमीर देशों में एक था और इस्लाम अरब से बढ़ कर एशियाई और यूरोपीय देशों तक पैर पसारने लगा था. इस्लाम एक मात्र केंद्र इस्लामिक खलीफ़ा था जो की यजीद था. किन्तु यज़ीद को खुद मुहम्मद साहब के परिवार की ही राजनिष्ठा (बैय्यत) नहीं प्राप्त थी. जिसकी वजह से उसकी खिलाफ़त का सत्यापन दुनिया के सामने संदिग्ध रह जारहा था.

जैसा कि कल बताया 680 ईस्वी यानि इस्लाम के उद्भव के करीब 50 साल बाद शाम(सीरिया) के शक्तिशाली और मालदार शासक की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र यजीद मात्र 33 वर्ष की अल्पायु में तख्तनशीन हुआ और अपनी खिलाफत का एलान कर दिया. उसने मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन को (मदीना) पैग़ाम-ए-बय्यत (राजनिष्ठा का आवेदन) भेजा, जिसे इमाम हुसैन ने अस्वीकृत कर दिया. अब यज़ीद की खिलाफत अधूरी थी, बिना आले मुहम्मद (मुहम्माद्सहब के परिवार) की निष्ठा के खिलाफत का कोई महत्त्व नहीं था. यजीद ने मुसलमानों को पैसे और ताक़त के दम पर अपनी और खींचना शुरू कर दिया.
यहाँ यह बताना ज़रूरी है, की उस काल में इस्लाम में केवल मुसलमान थे, शिया सुन्नी वहाबी जैसे पंथ नहीं बने थे. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं की मुसलमान एक था. अरब – अजम(गैर अरब) को हेय दृष्टि से देखते थे, उमरी अल्वी और माव्याई तबके भी आपस में बंटे हुए थे. अली, हसन हुसैन के चाहने वाले उनके दोस्त यानी “शिया” कहे जाने लगे थे इन्हें ही अल्वी भी कहते थे. समाज इस क़दर दिग्भ्रमित था की कब कोई अल्वी माव्याई बन जाए कब कोई उमरी अल्वी बन जाय कहा नहीं जासकता था. यानी अरब – अजम वर्ग जन्माधारित थे लेकिन अल्वी उमरी और माव्याई आदमी की अपनी निष्ठां पर निर्भर करता था.
इस झगडे में एक तरफ इराक था तो दूसरी और शाम, इनके बीच एक छोटा सा राज्य था ” मदायन” जो तटस्थ था. यहाँ सभी तरह के मुसलमान शान्ति से रहा करते थे.

कूफ़ा शहर जो इराकी सत्ता का केंद्र था, जब यह खबर पहुंची की माव्या की मृत्यु के पश्चात उसका बेटा यज़ीद खुद खलीफा बन बैठा है ( जो कि इमाम हुसैन के बड़े भाई इमाम हसन के द्वारा माव्या पर निषेध किया गया था, की उसकी खिलाफ़त उसके बेटे को मिले) कूफावासियों ने विद्रोह कर दिया. पूरे शहर में अराजकता फैल गई. आधे यजीद को खलीफा मान रहे थे और आधे नहीं.

आखिर में सुलेमान(कूफा के एक बुजर्ग) ने इमाम हुसैन को मदीने में एक पत्र भेजा, कि कूफ़ा के हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं और अधिकाँश जनता यज़ीद को अपना खलीफ़ा मानने से इनकार कर रही, तो आप जल्द से जल्द कूफा आयें हमसे हमारी बैय्यत (राजनिष्ठा) लेलें. इस पत्र पर कूफ़ा के सभी आदरनीय लोगों की मुहर थी.

ख़त मिलते ही इमाम हुसैन ने अपने चचाज़ाद भाई मुस्लिम इब्ने अक़ील को कूफा रवाना कर दिया, ताकि वहां के हालात मालूम चलें. हज़रत मुस्लिम का कूफा में ज़ोरदार स्वागत हुआ. पहले दिन में ही 18000 कूफ़ियों ने हज़रत मुस्लिम के हाथ पर बय्यत(राजनिष्ठा) की और मुस्लिम से आग्रह किया की अब जल्द से जल्द मुहम्मद साहब के नवासे और वारिस इमाम हुसैन को बुलवा लिया जाय. मुस्लिम ने उसी रात इमाम हुसैन को ख़त लिखा कि खबर सही है कूफ़ा के हालात बहुत खराब हैं, जनता त्राहि त्राहि कर रही है, आप जल्द आकर यहाँ की बाग़ डोर संभालें.

इधर जनाबे मुस्लिम ने इमाम हुसैन को कूफा आने के लिए ख़त लिखा उधर कूफा के हालात बदल गए. उसी रात कूफ़ा के गवर्नर इब्ने ज़ियाद ( जो एक वैश्या का पुत्र था) ने हानी जिसने जनाबे मुस्लिम को पनाह दी थी और कूफा की एक इज्ज़त दार शख्सियत थे, धोखे से गिरफ्तार करवा लिया.

हानी के गिरफ्तार होते ही कूफावासियों ने पूरा महल घेर लिया और गवर्नर के खिलाफ आधिकारिक विद्रोह की घोषणा कर दी. कूफा का महल करीब 15000 कूफ़ियों द्वारा घेरा जा चूका था जबकि कूफा के गवर्नर के पास उस समय 2000 से अधिक की फ़ौज न थी. इब्ने ज़्याद घबरा गया और उसने महल का सारा सोना निकाल कर अवसरवादी शहरियों में बाँट दिया की वे कैसे भी विद्रोही सेना में फूट डाल दें और क्रान्ति टूट जाय. कई तरकीबों में सबसे कारगर तरकीब ये रही की कूफा की औरतों को डरा दिया गया यह कह कर की यज़ीद ने शाम से 10हज़ार हाथियों का लश्कर भेजा है विद्रोहियों को कुचलने केलिए और उनके पास रोमन तोपे भी हैं. अगर उन औरतों के बेटे पति या बाप जो विद्रोही हैं अपनी तलवार गवर्नर के सामने समर्पण कर दें तो उनके मर्दों की जान बख्श दी जाएगी और तलवार के वज़न के बराबर सोना उन्हें दिया जाएगा.

बस फिर क्या था रात की नमाज़ से पहले ही औरतें अपने अपने मर्दों को वापस लेकर चली गयीं और विद्रोह टूट गया. कूफा को “हज़ार चेहरों वाला शहर” कहा जाता था, क्युकी यह शहर कब अपना रंग बदल ले भरोसा नहीं किया जा सकता था, और वही हुआ. एशा की नमाज़ के बाद जनाबे मुस्लिम और उनके साथ केवल 10-12 साथी ही रह गए थे जो विद्रोह का झंडा उठाये हुए थे. सुबह जो भीड़ 15000 की थी 10-12 घंटों में वोह पंद्रह लोगों की भीड़ रह गयी थी.

अब विद्रोह का कोई फायदा नहीं रह गया था. रात होते ही कूफा के 2000 सिपाही कूफा की गलियों में गश्त करने लगे और कूफा में सन्नाटा पसर गया. घबरा कर वोह 10-15 साथी भी जनाबे मुस्लिम को छोड़कर भाग गए. मुस्लिम अब तनहा थे. जिस शहर ने उन्हें 12000 ख़त लिख कर कूफा आने की दावत दी थी वोह शहर उन्हें तनहा छोड़ अपने अपने घरों में बंद हो चूका था. एक तरफ सिपाहियों से बचना दूसरी और नए शहर के रास्तों का न पता होना. सुबह तक मुस्लिम को एक कूफा वासी की जासूसी पर घेर लिया गया. अकेले मुस्लिम ने काफी देर सिपाहियों का मुकाबला किया, जब वे मुस्लिम को गिरफ्तार न कर पाए तो कूफा के दरोगा ने मुस्लिम को “जान की अमान” देने का वादा करके समर्पण करवाया.

मुस्लिम को गिरफ्तार करके महल ले जाया गया जहाँ गवर्नर इब्ने ज़ियाद के हुक्म से उन्हें सजाए मौत सुनाई गयी. मुस्लिम ने वसीयत की के ” इमाम हुसैन को एक ख़त लिख कर कूफा आने से रोक दिया जाय और 700 दिरहम जो उनके ऊपर कूफा वासियों के खाने रहने के दौरान उधार हैं उसे उनकी जिरह-बख्तर और तलवार बेच कर वापिस करवा दिए जायें”. जैसा की ज़ाहिर था दोनों ही वसीयत पर अमल नहीं किया गया. और उन्हें महल की सबसे ऊंची मीनार से धक्का देदिया गया. लाश का सर शरीरसे अलग किया गया और मुस्लिम जो अली का भतीजा और मुहम्माद्सहब के परिवार से था, उसकी लाश का भी सम्मान नहीं किया गया. कूफा शहर में पूरा दिन घोड़े से बंधी एक सर कटी लाश पूरे कूफा की गलियों में घसीटी जारही थी और मुस्लिम का सर भाले पर लगा कर पूरे शहर में घुमाया जारहा था.

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