गंभीर अड्डा

कर्बला कथा -आखिरी अध्याय

अक्टूबर 24, 2016 ओये बांगड़ू

करबला कथा के नौ अध्याय समाप्त हो चुके हैं, जिसमें हुसैन के कर्बला जाने से पहले के राजनैतिक हालात, कर्बला का युद्ध और युद्ध की समाप्ति के बाद परिवार पर किये गए ज़ुल्म थे. अब आखिरी अध्याय बचा है, जिसमें इस्लाम का पुनर्गठन छुपा हुआ है. इतिहास की नजर से देखिये कैसे हुआ इस्लाम का पुनर्गठन हैदर रिजवी की कलम से

अभी तक लिखा गया इतिहास सर्वमान्य और सर्वविदित है. आगे के इतिहास में काफी फेरबदल भी की गयी और मुसलमानों को इसकी सच्चाई आज तक नहीं बतायी गयी. अधिकतर मुसलामानों को यही पता है की मुहम्मद साहब के जीवन तक मुसलमान एक थे और मुहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात हज़रत अबूबकर और अली की खिलाफ़त को लेकर दो गुट बन गए जो शिया व् सुन्नी कहलाये और आज तक वैसे ही चले आरहे हैं. जो सच है किन्तु अधूरा.

मुहम्मद साहब की मृत्यु के अगले 50  सालों में ही 10  अक्टूबर 680 ईस्वी के दिन मुसलमानों के कथित खलीफ़ा यज़ीद इब्ने माव्या ने मुहम्मद साहब के नवासे हुसैन और उनके परिवार को कर्बला के युद्ध में इस्लाम के नाम पर मरवा दिया. यहाँ से इस्लाम में एक ज़बरदस्त राजनैतिक परिवर्तन हुआ. अब्दुल्ला इब्ने जुबैर( जो मुहम्मद के साथी जुबैर का बेटा था) ने अपने अन्य तीन भाइयों के साथ मक्का पर अधिपत्य कर लिया और काबा के कैम्पस में ही अपना दरबार लगाने लगा. उसने खुद को इस्लाम का खलीफा घोषित कर दिया. सीरिया में यज़ीद ने खुद को खलीफा घोषित किया हुआ था. और हुसैन के कर्बला के युद्ध में बचे बेटे जैनुल्लाब्दीन ने मदीने में शरण लेली थी. एक तीसरा वर्ग जो हुसैन की हत्या से क्षुब्द था और जन विद्रोह करना चाहता था वोह जैनुल्लाब्दीन को खलीफा घोषित करना चाहता था, किन्तु जैनुल्लाब्दीन ने राजनीति से दूर रह कर मदीने के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया.

इस प्रकार यदि मोटा मोटा देखा जाय तो मुहम्मद साहब की मृत्यु के केवल पचास सालों बाद ही इस्लाम तीन गुटों में बंटा हुआ नज़र आता है और मजेदार बात ये कि एक ही धर्म के एक ही समय में तीन तीन खलीफ़ा मौजूद थे. यह वह दौर था जब खलीफाओं ने अपनी सुविधाओं के अनुसार मुहम्मद साहब की शिक्षाओं और हदीसों को तोडना मरोड़ना प्रारंभ किया.

683  ईस्वी में खलीफ़ा यज़ीद की फौजों ने मदीने पर हमला किया और मुहम्मद के शहर को खूब लूटा. 31  अक्टूबर 683  ईस्वी को मदीने को लूट वो सेना मक्का पहुंची और आल्लाहोअक्बर का नारा लगाते हुए इन मुसलमानों ने जिहाद के नाम पर काबा को आग लगा दी. आग पूरे खान ए काबा को जला डालती यदि उसी समय बारिश न हुई होती. इस आग से काबा 80% क्षतिग्रस्त हो गया. खलीफ़ा अब्दुल्ला बिन जुबैर ने जान बूझकर युद्ध को मक्का शहर के भीतर खींचा था क्युकी उसको यकीन था, कुछ भी हो जाए इस्लामी सेना काबा के कैम्पस में युद्ध तो नहीं करेगी.

यानी दोनों खलीफाओं की इस्लामी सत्ता की भूख की आहुति काबा चढ़ाया गया. शायद इससे भी बुरा होता काबा कैम्पस में, यदि आग लगने की अगली ही सुबह सीरिया से यजीद के मरने की खबर न आगई होती. यजीद के मरने की खबर आते ही काबा पर चढ़ रही फौजें पीछे हट गयीं. और अब्दुल्ला इब्न जुबेर ने इसका फायदा उठाने का कोई मौक़ा न छोड़ते हुए शहर भर में अफवाह उड़वा दी के काबा में आग लगी तो खुदा ने खुद बारिश करके आग को बुझवा दिया और उसी रात आग लगवाने यज़ीद को भी ख़त्म कर दिया. यानी काबा का असली वारिस और खलीफा मैं ही हूँ, मेरे ऊपर खुदा का हाथ है.

जबकि यजीद की मौत इस घटना से करीब तीन महीने पहले ही हो चुकी थी, घुड़सवार को सीरिया से मक्का आकर खबर देने में इतना समय लग गया था. हाँ बस खबर उस दिन आई जिस दिन काबा में आग लगाई गयी.

( यह अध्याय आपको यह समझने में सहायता करेगा कि इस्लाम कैसे कैसे तोड़ा और गन्दा किया गया, और किस तरह मुहम्मद साहब के साम्यवाद के सिद्धांत को कुछ अवसर वादियों ने साम्राज्यवाद में परिवर्तित कर डाला)

 

 

पिछली कथाओं को क्रमवार पढने के लिए नीचे दिए हर लिंक में चटका लगाते जाएँ.

http://www.oyebangdu.com/karbala-katha-9/

1 thought on “कर्बला कथा -आखिरी अध्याय”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *