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काकू की झील कैबिनेट

मई 19, 2018 Girish Lohni

बीते हफ्ते की दो खबरों से स्पष्ट है कि उत्तराखंड में या तो सरकार बहुत तेज है या उत्तराखंड के लोग अंधे और गूंगे हो चुके हैं. पहली खबर राज्य सरकार की झील में कैबिनट मिंटिग की है. जिसमे मुख्यमंत्री के फेसबुक पेज से उनके पैर प्रसार कर नाव में झील में मीटिंग की फोटो जारी की गयी है. सवाल उठने चाहिये थे लेकिन राज्य की पूरी मिडिया अपने चाटुकारिता की आदत के चलते इसका महिमामंडन करते नहीं थकी.

किसी ने सवाल ही नही किया कि पहले से वित्तीय रुप से खस्ता हाल उत्तराखंड की सरकार के झील में मौज के पैसे कहा से आये. किसी ने सबाल ही नहीं किया की मिटिंग की सजावट में जो फालतू का पैसा खर्च हुआ उसके पैसे कहा से आये? किसी ने सवाल ही नहीं पूछा की साहब झील में बैठकर फैसले लेने से कैसे उत्तराखंड आस्ट्रेलिया से आगे पहुच जायेगा.

वैसे अगर सूत्रो की माने तो काकू नाम से लोकप्रिय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के सिर से अभी थैलींण (थाईलैंड )  की यात्रा का खुमार नहीं उतरा है .आये दिनो अगर मुख्यमंत्री सार्टस और रंगीन बंडी में कैबिनेट मीटिंग लेते दिखे तो अचरज की बात ना होगी.

दूसरी खबर इसी हफ्ते क्रांतिकारी निर्मल पंडित की पुण्य तिथि से संबंधित है. सीमांत जिले पिथौरागढ़ की पुण्यतिथि पर जिस बेशर्मी के साथ प्रदेश की दोनों पार्टी ने छल किया है वह पूरा प्रश्न चिन्ह के घेरे पर है. हालाकि प्रदेश की मीडिया ने इसे भी निर्मल पंडित की याद में भव्य समारोह ही बताया.

किसी ने सवाल ही नहीं उठाया की जिस शराब के विरोध में निर्मल पंडित ने अपनी जन दे दी आज वो क्यों राज्य की अर्थवयवस्था की रीढ़ की हड्डी बनी हुई है? सवाल उठाने चाहिए की 18 साल बाद भी निर्मल पंडित की मौत की जांच क्यों नहीं कराई जा रही है? निर्मल पंडित ने पहाड़ में शराब का विरोध किया था आज जो सरकार घर-घर गाड़ियों से शराब पहुचना रही है उसे निर्मल की पुण्यतिथि में शामिल होने का क्या अधिकार है?

लोकतंत्र में पांच साल में एक बार वोट देना ही जनता की जिम्मेदारी नहीं है लोकतंत्र में सवाल करना भी जनता की ही जिम्मेदारी है.

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