बांगड़ूनामा

काफल पाको मैं नि चाख्यो

अक्टूबर 1, 2016 सुचित्रा दलाल

बांगड़ू आज तुझे एक किस्सा सुनाता हूँ. दूर पहाड़ों की एक दंत कथा. जिसमे एक पहाडी चिड़िया है एक पहाडी फल है और बहुत सारा दर्द है. वो जो पहाडी फल है ना उसका नाम काफल है और काफल बहुत जबर्दस्त स्वादिष्ट फल होता है. प्रिजर्व करके रखना थोडा मुश्किल है इसलिए खा उसे उसके सीजन में ही खा लेते हैं.

काफल की कहानी
कहा जाता है कि उत्तराखंड के एक गांव में एक गरीब महिला रहती थी, जिसकी एक छोटी सी बेटी थी. दोनों एक दूसरे का सहारा थे. आमदनी के लिए उस महिला के पास थोड़ी-सी जमीन के अलावा कुछ नहीं था, जिससे बमुश्किल उनका गुजारा चलता था.

गर्मियों में जैसे ही काफल पक जाते, महिला बेहद खुश हो जाती थी. उसे घर चलाने के लिए एक आय का जरिया मिल जाता था. इसलिए वह जंगल से काफल तोड़कर उन्हें बाजार में बेचती, जिससे परिवार की मुश्किलें कुछ कम होतीं. एक बार महिला जंगल से एक टोकरी भरकर काफल तोड़ कर लाई.

उस वक्त सुबह का समय था और उसे जानवरों के लिए चारा लेने जाना था. इसलिए उसने इसके बाद शाम को काफल बाजार में बेचने का मन बनाया और अपनी मासूम बेटी को बुलाकर कहा, ‘मैं जंगल से चारा काट कर आ रही हूं. तब तक तू इन काफलों की पहरेदारी करना. मैं जंगल से आकर तुझे भी काफल खाने को दूंगी, पर तब तक इन्हें मत खाना.’

मां की बात मानकर मासूम बच्ची उन काफलों की पहरेदारी करती रही. इस दौरान कई बार उन रसीले काफलों को देख कर उसके मन में लालच आया, पर मां की बात मानकर वह खुद पर काबू कर बैठे रही. इसके बाद दोपहर में जब उसकी मां घर आई तो उसने देखा कि काफल की टोकरी का एक तिहाई भाग कम था. मां ने देखा कि पास में ही उसकी बेटी सो रही है.

सुबह से ही काम पर लगी मां को ये देखकर बेहद गुस्सा आ गया. उसे लगा कि मना करने के बावजूद उसकी बेटी ने काफल खा लिए हैं. इससे गुस्से में उसने घास का गट्ठर एक ओर फेंका और सोती हुई बेटी की पीठ पर मुट्ठी से जोरदार प्रहार किया. नींद में होने के कारण छोटी बच्ची अचेत अवस्था में थी और मां का प्रहार उस पर इतना तेज लगा कि वह बेसुध हो गई.

बेटी की हालत बिगड़ते देख मां ने उसे खूब हिलाया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. मां अपनी औलाद की इस तरह मौत पर वहीं बैठकर रोती रही. उधर, शाम होते-होते काफल की टोकरी फिर से पूरी भर गई. जब महिला की नजर टोकरी पर पड़ी तो उसे समझ में आया कि दिन की चटक धूप और गर्मी के कारण काफल मुरझा जाते हैं और शाम को ठंडी हवा लगते ही वह फिर ताजे हो गए. अब मां को अपनी गलती पर बेहद पछतावा हुआ और वह भी उसी पल सदमे से गुजर गई

चैत के महीने में चिड़िया कहती है-काफल पाको मैं नि चाख्यो

कहा जाता है कि उस दिन के बाद से एक चिड़िया चैत के महीने में ‘काफल पाको मैं नि चाख्यो’ कहती है, जिसका अर्थ है कि काफल पक गए, मैंने नहीं चखे.. फिर एक दूसरी चिड़िया गाते हुए उड़ती है ‘पुर पुतई पूर पूर !’ मतलब ‘पूरे हैं बेटी, पूरे हैं’

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