गंभीर अड्डा

फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता

नवंबर 21, 2018 कमल पंत

फर्जी खबरों की डिजिटल में एक अलग वेल्यू हो गयी है ये बहुत तरीके से काम आती है,न्यूज वेबसाईट्स जहाँ अपने बिजनेस (व्यूवर्स) को बढाने के लिए इसकी मदद लेते हैं वहीं पोलिटिकल पार्टी,कारपरेट आफिस ,बिजनेस मैन,स्माल इंडस्ट्री इसे एक एडवर्ड एजेंसी की तरह प्रयोग में लाती है,आपने बहुत सी वेबसाईट्स में एसी ख़बरें पढी होंगी जिनमे किसी एक पर्टिकुलर प्रोडक्ट या व्यक्ति की तारीफ़ पब्लिश की गयी होती है. इसका दायरा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. हर वो खबर जिसका सच से कोइ वास्ता नहीं ,अधूरी एक तरफ़ा खबर,बिना किसी आधार के लिखी गयी खबर फर्जी ख़बरों में आती है.डिजिटल के ही एक हिस्से सोशल मीडिया में फर्जी ख़बरों की रोजाना बाढ़ सी आती है.

आये दिन अपने मोबाईल में व्हाट्सप के जरिये,सोशल मीडिया के जरिये आप बहुत सारी फर्जी ख़बरों से घिरे रहते हैं. कई बार आप खुद असली खबर और फर्जी खबर में भेद नहीं कर पाते क्योंकि आपकी आस पास की सक्रीय सोशल मीडिया आपको विशवास दिला देती है कि आपको जो खबर दिखाई या पढाई जा रही है वह एकदम सच है. विशवास दिलाने के लिए सदियों पुराना एक फार्मूला अपनाया जाता है जो कहता है कि एक झूठ को सौ लोग बोलेंगे तो वह सच सा लगने लगता है. कुछ एसा ही यहाँ भी होता है. कोइ खबर जब दस अलग अलग वेबसाईट के जरिये आप तक पहुँचती है तो आपको यकीन हो जाता है कि वास्तव में ये एक असली खबर है जबकि असली बात ये है कि किसी एक वेबसाईट की देखादेखी ख़बरों को कापी पेस्ट या रीराईट कर दिया जाता है.कोइ भी खबर-रचियता(पत्रकार नहीं ) ख़बरों को क्रास चेक करने नहीं जाता.इन ख़बरों को दो तरह से तैयार किया जाता है पहला अपने व्यूवर बढाने के उद्देश्य से दूसरा किसी को निजी फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से.

डिजिटल जर्नलिज्म का एक बहुत बुरा पक्ष ये भी है कि यहाँ ‘कंटेंट जनरेटर’ बनाये जा रहे हैं बजाय पत्रकार बनाने के, डिजिटल फार्मेट में पब्लिक के मूड के हिसाब से जो एडिटर कंटेंट जनरेट करने में सक्षम है उन्हें ही नौकरी पर रखा जाता है इसलिए मॉसकम्यूनिकेशन के ज्यादातर छात्र कंटेंट जनरेटर बनने की कोशिश करने में लग जाते हैं. अभी पब्लिक आईपीएल से रिलेटेड खबर ज्यादा लोगों द्वारा पढ़ी जा रही है तो कंटेंट जनरेटर तुरंत गूगल करके अपने संस्थान के लिए आईपीएल से जुडी ख़बरें बनाना शुरू कर देता है,डिजिटल में कीवर्ड्स कभी भी चेंज हो सकते हैं कभी भी आडियंस  ट्रेफिक डायवर्ट हो सकता है इसलिए ये काम बहुत जल्दी में किया जाता है और क्रास चेक की गुंजाईश लगभग खत्म हो जाती है. कंटेंट जनरेटर जिन्हें आम भाषा में एडिटर भी कहने लग गए हैं,वह तुरंत अपनी रिस्पेक्टिव   साईट के लिए आडियंस के मूड के अकार्डिंग कंटेंट जनरेट करने लग जाता है. और इस तरह जन्म होता है फेक न्यूज की चेन का. ऊपर एक शब्द प्रयोग हुआ है कीवर्ड जिसे समझना बहुत जरूरी है तभी आप फर्जी खबरों की जरूरत को समझ पायेंगे. रोजाना वेब की दुनिया में (गूगल और अन्य जगह) सबसे ज्यादा ढूंढा जाने वाला शब्द उस दिन का कीवर्ड है. उस कीवर्ड का फायदा भुनाने के लिए और अपने व्यूवर बढाने के लिए न्यूज वेबसाईट उस कीवर्ड से जुडी खबर को अपने प्लेटफार्म में भी जगह देते हैं भले ही वह या उनके कंटेंट जनरेटर उस टापिक पर कुछ ना जानते हों.

जारी है ………………………………………………………………………………..

नोट-लेख को डिजिटल मीडिया और फर्जी खबरों का बड़ता दायरा नाम के रिसर्च पेपर से लिया गया है.आगे और भी अंश प्रकाशित किये जायेंगे.

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