यंगिस्तान

जोहान्सबर्ग से चिट्ठी -7

अक्टूबर 22, 2016 ओये बांगड़ू

अक्सर टीवी पर कान में हेडफोन लगाए हिप्पी लोगों को डांस करते देख हम ये सोचते थे कि इनका पूरा देश ही एसे ही मस्त रहने वाला होगा. कानफोडू म्यूजिक में हिपहॉप करते हुए पूरा वख्त गुजार देते होंगे ये लोग. जोहान्सबर्ग से आ रही चिट्ठियां पढ़कर उस देश को असल में जानने का मौका मिल रहा है . शुक्रिया बनारस के विनय कुमार जी. आज है डायरी का अगला पन्ना.

एक सप्ताह बाद हम लोग अपने फ्लैट में रहने आ गए, एक बड़ी सोसाइटी में स्थित ये फ्लैट काफी बड़ा और सम्पूर्ण सुविधा युक्त था| यहाँ पर किराये के मकान दो तरह से मिलते है, या तो पूरी तरह से सुविधायुक्त (बिस्तर, सोफे से लेकर घर की हर चीज मकान मालिक द्वारा दी जाती है) या सिर्फ फ्लैट जिसमें आप अपना सामान खरीदकर रखें| मेरी इच्छा थी कि फ्लैट ऐसी जगह हो जहाँ हिंदुस्तानी लोग कम मिलें और स्थानीय लोग ही ज्यादा मिलें, जिससे यहाँ के लोगों के रहन सहन और जीवन शैली के बारे में पता चल सके|  फ्लैट बिलकुल ऐसी ही जगह था जहाँ हमारे अलावा एक भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं था| दो तीन कई पीढ़ी पुराने भारतीय परिवार थे लेकिन अब वो भी यहां के हो गए थे| इस वजह से मुझे इन लोगों को नज़दीक से जानने का मौका मिला|

चूँकि सुरक्षा के काफी कड़े इंतज़ाम होते है यहाँ तो हमारी बिल्डिंग भी ऑटोमैटिक गेट से युक्त है, जहाँ तीन चार गार्ड हमेशा मौजूद रहते है| कोई भी व्यक्ति बिना इज़ाज़त अंदर नहीं जा सकता और हमारे पास रिमोट दिया गया जिससे हम गेट खोल सकें| शुरुआत में तो वैसे भी सब कुछ अजीब ही लगा लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने एक ख़ास चीज महसूस किया कि हमारी बिल्डिंग बेहद शांत है, कोई आवाज़ नहीं, हालांकि लगभग 75 फ्लैट होंगे|  अब तो तीन साल से ज्यादा हो गए रहते हुए लेकिन किसी भी शोर शराबे के लिए कान तरस जाते है| आपको अपनी पार्किंग में भी कार ठीक से लगानी है, कहीं आपने पडोसी के पार्किंग में अतिक्रमण कर दिया तो आपके पास नोटिस आ जाएगी और कई बार ऐसा हुआ तो शायद जुर्माना भी|

यहाँ की आबादी में दो बिलकुल अलग वर्ग है, एक श्वेत वर्ग जो बेहद शांत रहता है और किसी भी तरह का शोरगुल घर में पसंद नहीं करता है| इस बात का अंदाज तो था लेकिन बहुत जल्द ही पता भी लग गया| दरअसल हमारे एक मित्र अपने बच्चों के साथ मेरे घर आये और बच्चे तो उछल कूद करते ही है| लगभग दो घंटे बाद मेरे फ्लैट की घंटी बजी, मैं बाहर निकला तो देखा कि सामने एक बुजुर्ग खड़े है, जो मेरे नीचे वाले फ्लैट में रहते है| उन्होंने पहले तो आने के लिए माफ़ी मांगी और फिर कहा कि क्या ये शोर बंद हो सकता है, ये मुझे मार डाल रहा है| मैंने भी उनसे क्षमा मांगी और बच्चों को किसी तरह समझाया कि ज्यादा उछलें मत| आगे भी दो तीन बार ऐसा हुआ तो मैं काफी सतर्क हो गया और बच्चों के आने पर उनको समझाता ही रहता हूँ|

दूसरा यहाँ की अश्वेत आबादी, जो कुछ ज्यादा ही शोरगुल पसंद है| शुरू शुरू में हम लोग जब भी किसी मॉल में जाते थे तो अक्सर दुकानों में काम करने वाले अश्वेत लोग संगीत पर थिरकते दिख जाते| बस इनको बहाना चाहिए नाचने और चिल्लाने का, कोई भी संगीत बज जाए फिर ये रुक नहीं सकते| आप इनकी बस्ती में चले जाईये, आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी बेहद शांत देश में रहते है|electric-fence-resized

लेकिन अगर दोनों तरह के लोग एक ही जगह रह रहे हों, जैसे हमारी बिल्डिंग में ही, तो एकदम शांत रहते है| धीरे धीरे इस विरोधाभास में हम लोगों ने भी जीना सीख लिया और यहाँ की आबो हवा में ढल गए|

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जोहान्सबर्ग से चिट्ठी -6

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