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तो ये है जियो यूनिवर्सिटी का राज

जुलाई 18, 2018 ओये बांगड़ू

देश भर में जियो कालेज पर हो-हंगामा जारी है. ऐसे में पहाड़ कहां पीछे रहे. पेशे से व्यवसायी, दिल से घुमक्कड़, कलम के खिलाड़ी पृथ्वी राज सिंह जियो के कालेज और पहाड़ों में चलने वाली नरुवा के नामकरण की रिति को एक ही पाते है.तो पेश है पृथ्वी राज के शब्दों में जियो यूनिवर्सिटी का राज

पहाड़ में एक रस्म होती है  “नरुवा का नामकरण” इसमें नामकरण की रस्म भर होती है कोई नरुवा नहीं होता.
ऐसा ही नरुवा जियो संस्थान के रूप में सरकार को हुआ है, जिस पर नरेन्द्र मोदी जनता के पूरे एक हजार करोड रूपये निछावर करके भारत के टापम-टाप छह विश्वविद्यालयों में दर्जा देने में तुले हुए हैं।
जियो स्कूल के नाम पर अभी कुछ भी नहीं है बस मुकेश अंबानी ने जो प्रजेंटेशन सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने रखा वही भर है।
कमेटी द्वारा चुने गये अन्य पांच संस्थान वाकई अस्तित्व में हैं पर एक प्रजेंटेशन के आधार पर सरकार ने मान लिया कि जियो भारत का उत्कृष्ट शैक्षिक संस्थान हैं।
केवल जियो ही नहीं एयरटेल, वेदांता और क्रिया फाउंडेशन ने भी अपने प्रजेंटेशन रखे थे पर ना! सरकार की नजर में जियो ही वह उत्कृष्ट संस्थान है जिस पर देश की शिक्षा का दामोदर हैै।
जियो की इस जीत के पीछे केवल मुकेश अंबानी का प्रजेंटेशन नहीं है, एक पूरी टीम है जिसमें अंबानी के शिक्षा सलाहकार  विनयशील ओबेरॉय भी हैं। 2016 के बखत जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय को यह विचार आने शुरू हुए तो ओबेरॉय इस मंत्रालय में उच्च शिक्षा सचिव पद पर विराजमान थे, बाद में सेवानिवृत हो गये। मजबूरी यह है कि उच्च सरकारी बाबू रिटायरमेंट के एकदम बाद किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान में सेवा नहीं दे सकता। मार्च 2018 को सेवानिवृति के बाद वह अंबानी के पाले में आ गए और जुलाई आते आते महज एक प्रजेंटेशन के आधार पर जियो संस्थान को भारत की महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थानों की श्रेणी में भी ला गये।
यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है ऐसा अरविंद पनघरिया कहते हैं, वहीं पनघरिया, जो हाल तक सरकारी नीति आयोग के हर्ता-कर्ता-धर्ता होते थे, फिलहाल कोई बडा कारण बताये झोला उठा कर वापस चले गए। इन्हें लगता है कि मोदी में वह क्षमता है जो विरोध के बावजूद अपने मन की करते हैं, हालांकि यह अंबानी के संबंध में ज्यादा सटीक बैठती है। नोटबंदी के दौर में जियो की एड में प्रधानमंत्री का यह साहस काबिलेगौर था। जिसमें बतौर फाइन देश को पांच सौ रूपल्ली का फायदा हुआ था, फिलहाल अंबानी ने वह पैसा दिया भी या नहीं, पता नहीं चला। पनघरिया कहते हैं कि विकास एकदम नहीं दिखता, कुछ सालों बाद दिखेगा। ऐसा वह जियो संस्थान के संदर्भ में कहते हैं।खुद नीति आयोग में इनके द्वारा जो विकास अबतक किया गया है वह भी आने में टाइम लेगा। शायद इनके पास ही टाइम की कमी थी इसलिए पनघरिया बिना विकास देखे ही सरक लिए।
अरे कहाँ उलझा दिया, आपको शायद “नरूवा के नामाकरण” की पडी है। सही है लोक की बात है, डांडी कांठी की बात है, संस्कृति की बात है, तो हमारी जागरूकता भी होनी चाहिए। हां तो जैसा सबको पता है कि विवाहिता के पहली बार अलग होने के बाद वाले समय को ‘नरुवा के नामकरण’ के रूप में मनाया जाता है। अलग होना मतलब पीरियड्स होना, वैसे सरकारी नौकरी और निजी संस्थान को जॉइन करने के बीच के समय को बाबू लोगों का कूलिंग पीरियड कहते हैं। आपको भी जियो संस्थान के ” नरूवा के नामकरण” की बहुत बधाई।

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