बांगड़ूनामा

झन्न गुरु के कारनामे -4

मार्च 17, 2018 कमल पंत

झन्न गुरु झन्नाटेदार थप्पड़ मार देने वाले उस महान विरासत के आखरी किरदार थे जिन्हें अपने जीवन में लगता था कि थप्पड़ जड़ देना ही काम का हो जाना है. पिछले तीन अध्यायों में आपने झन्न गुरु को मोटा मोटी समझने की कोशिश की है झन्न गुरु प्रिंसिपल द्वारा सस्पेंड किये जाने के बाद अयोध्या की तरफ निकल गए थे. ये वो दौर था जब राम मन्दिर आन्दोलन मजबूती से मजबूत होता जा रहा था,झन्न गुरु भी अपने जीवन में बच्चों को थपड़िया थपड़िया कर उकता गए थे,प्रिंसिपल को उन्होंने अचानक भावावेश में थपड़िया तो दिया था लेकिन ये उनके अंदर की क्रांती को दबाने के लिए काफी नहीं था. उन्हें देश और समाज में बदलाव चाहिए था.
इसी बदलाव की चाहत में वह हर उस शख्स से प्रभावित हो जाते थे जो उस समय सरकार के विरोध में आवाज उठाता था,जेपी आन्दोलन के बाद से वह लगातार मुलायम नितीश और लालू के जबरा फैन बन गए थे,उन्हें लगने लगा था कि यही तो असली क्रांती है.अपने आस पास छोटे लेवल पर हुई क्रांतियों को भी उन्होंने डायरी में नोट कर रखा था,और फिर वो साल आया 89 जब कश्मीर से कश्मीरी हिन्दू भगाए गए एसी ख़बरें लगातार अखबारों में आ रही थी,झन्न गुरु का माथा हर खबर के साथ और ज्यादा लाल हो जाता.वैसे उन्होने अब तक के अपने थप्पड़ कैरियर में हजार बच्चों एक जेई, एक ठेकेदार, एक मजदूर, एक चौकीदार ,एक चपरासी,एक बच्चे के बाप और एक मकान मालिक को ही थप्पड़ लगाया था मगर उनका अनुभव एसा था मानो सैकड़ों लोगों को थपड़िया चुके हों.89 में कश्मीर की खबर पढने के बाद उन्होंने तुरंत मन बना लिया कि अब देश से मुस्लिमों को तुरंत थपड़िया थपड़िया कर बाहर कर देना चाहिए.और उनके इस विचार को बल मिला उनके नए मोहल्ले में सुबह सुबह लगने वाली शाखाओं में.
शाखाओं में अक्सर वही बात हुआ करती थी जो उनके मन में चला करती थी,भ्रस्टाचार,घूसखोरी,जमाखोरी,सरकार का निकम्मापन ,देश में फैलती बेरोजगारी इन सब मुद्दों पर शाखाओं में खुल कर बात होती थी,जबकि इमरजेंसी के समय एसे खुलकर बात करने वाले जेल में ठूँस दिए जाते थे.शाखा ज्वाइन करते ही झन्न गुरु को लगने लगा कि उन्होंने कोइ क्रांतीकारी दल ज्वाइन कर लिया है जो जल्द ही देश में क्रांती ले आएगा.वो पूरी फील के साथ दल की हर गतिविधी का हिस्सा बनने लगे .
फिर एक उद्घोषणा हुई ‘मन्दिर वहीं बनायेंगे’ और झन्न गुरु के शाखा के साथियों ने एलान कर दिया कि अब तो अयोध्या में मन्दिर बनाकर ही लौटेंगे.समाज की छोटी प्राब्लम तभी ठीक होंगी जब देश की बड़ी प्राब्लम दूर होगी.ये सब बातें झन्न गुरु को बहुत अच्छी लगी और इसी बीच झन्न गुरु ने स्कूल में प्रिंसिपल थपड़िया दिया.
अच्छा मौक़ा हाथ लगा था,सस्पेंड थे और क्रान्तिकारियों के बीच में देश सुधारने जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ था.देश के हित में मंदिर का बनना बहुत जरूरी था एसा शाखा प्रमुख ने झन्न गुरु को बताया था हालांकि वो अब तक नहीं समझ पाए थे कि क्या मंदिर बनने के बाद सारा राज काज वहीं से चलेगा या क्या जैसा होगा ? मगर कमिटमेंट इज कमिटमेंट .
झन्न गुरु सवाल बहुत करते थे,पूरी अयोध्या यात्रा में उन्होंने 15 हजार सवाल पूछे और 20 हजार थप्पड़ मारे उन्होंने कितने थप्पड़ खाए इसका कोइ आधिकारिक रिकार्ड पास में नहीं है.
झन्न गुरु ने पहला सवाल शाखा प्रमुख से पूछा कि मन्दिर बनने के बाद होगा क्या ? और इसका उन्हें कोइ वाजिब जवाब मिला नहीं,हां एक नया भर्ती शाखा कर्मी झन्न गुरु को समझाने के लिए ज्यूं ही आगे बड़ा झन्न गुरु ने उसके गाल पर सीधे हाथ का प्लेन झापड़ लगा दिया.आखिर जूनियर है जूनियर की तरह रहे भई ,इतने सीनियर आदमी को समझाने क्यों आ रहा है.
इसके बाद अयोध्या जाते हुए उन्होंने जिस जिस से बात की उसको या थप्पड़ मारा या उससे थप्पड़ खाया.
इस पूरी यात्रा के बाद झन्न गुरु को दो बात तो समझ आ गयी पहली कि हर क्रांती क्रांती करने वाला क्रांतीकारी नहीं होता.दूसरी शाखा ,चौपाल,नुक्कड़ वगेरह में भ्रस्टाचार,घूसखोरी वगेरह वगेरह पर लम्बी बात करने वाले सिर्फ टाईमपास करने आते हैं उनका असली समस्या से कोइ लेना देना नहीं.
ये ब्रह्म ज्ञान जैसे ही झन्न गुरु को हुआ उन्होंने तुरंत शाखा छोड़ दी (अयोध्या जाते हुए क्या क्या हुआ ये जब मूड होगा तब बात करेंगे )
अब झन्न गुरु वापस अपनी दुनिया में आ गए थे ,जहाँ उनकी रिटायर्मेंट के दस साल बाकी थे और वो स्कूल में बच्चों को झापड़ कसकर अपनी खुजली मिटाते थे..
आगे और क्या क्या हुआ ये अगले अंक में
(अच्छे लगे तो कमेन्ट के जरिये सूचित करें,झन्न गुरु के किस्से आते रहेंगे )

पुराने किस्से झन्न गुरु के आपको यहाँ जाकर मिलेंगे

झन्न गुरु के कारनामे -3

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