गंभीर अड्डा

जरुरतमंद की मदद करने से बड़ा कुछ नहीं: संजय गुप्ता

जनवरी 16, 2019 ओये बांगड़ू

समाज में अक्सर हम नेताओ के किये हुए कामों को उनके द्वारा ही लगाएं बोर्ड पढ़कर पहचानते हैं,मगर हमारे इलाके के आस पास बहुत सारे लोग एसे भी हैं जो अपना काम चुपके से कर जाते हैं और उनका क्रेडिट नेता बनने की चाह रखने वाले लोग ले जाते हैं. आज भी सच में समाज से जुड़े लोग सोसाईटी में सुधार के लिए कई तरह के आईडिया के साथ मौजूद हैं.

संजय गुप्ता ऐसे  ही लोगो में एक हैं,एक सफल बिजनेसमैन से एक समाज सेवक बनने तक का सफ़र उनका निराला ही रहा है,उन्होंने अपने व्यापार करने के दिनों में देखा कि आस पास कितनी तरह की समस्याएं हैं और क्या हैं. उन्हें दूर कैसे किया जाए यह सबसे बड़ी समस्या थी तो वह खुद ही विकासपुरी के इलाके में वह अपने काम के लिए निकल पड़े.

ट्रेफिक की समस्या,झुग्गियों की समस्या,आमजन की बिजली पानी जैसी आधारभूत समस्याओं को भी अपने लेवल पर हल करने की पूरी कोशिश की,संजय गुप्ता कहते हैं कि पहले वह अपना 90 प्रतिशत  समय बिजनेस को और दस प्रतिशत समाज सेवा को देते थे,लेकिन बाद में जब लोग बहुत उम्मीद से उनके पास आने लगे तो उन्होंने अपना दस प्रतिशत  समय बिजनेस को और नब्बे प्रतिशत  समाज सेवा को देना शुरू कर दिया.

संजय गुप्ता बताते हैं कि बिजनेसमैन बनने तक का संघर्ष जो था वह मेरा अपना था लेकिन समाज सेवा के दौरान हुआ संघर्ष उन्हें ज्यादा खुशी देता है और इसलिए वह इस पर चर्चा करना ज्यादा पसंद करते हैं,वह बताते हैं कि लोग उनके पास तरह तरह की परेशानी लेकर आते हैं और उन परेशानियों को सुनकर ही एक आदर्श सोसाईटी का माडल धीरे धीरे उनके दिमाग में पनपने लगा.संजय गुप्ता बखूबी जानते हैं कि कैसे देश को वर्ल्ड क्लास पालिसी दी जा सकती है वो भी बिना सरकारी पैसे के , इसी मकसद से वो समाज सेवा कर रहे है .

एसी रूम में बैठकर नीतियाँ बनाने वाले लोग यह नहीं जानते कि एक आम आदमी क्या चाहता लेकिन उनके जैसे लोग जो सीधे आम आदमी से जुड़े हैं उन्हें पता है कि सोसाईटी में किस चीज की ज्यादा जरूरत है,वह बताते हैं कि वह अपने एंड से इन छोटी छोटी परेशानियों को खुद दूर भी कर देते हैं लेकिन वह सब जगह नहीं पहुँच सकते,उनकी पहुँच अभी सीमित है. इसलिए वह चाहते हैं कि जमीन से जुड़े लोग मिलकर समाज की असली परेशानियों के लिए काम शुरू करें.

संसद में बनने वाली नीतियाँ ऊपर ऊपर ही चली जाती हैं, जरुरतमन्द तक नहीं पहुचं पाती,वह रोजाना एसे लोगों से मिलते हैं जिनके लिए सरकार ने हवाई नीतियाँ बनाई हैं मगर जमीन पर फलीभूत नहीं हुई हैं.

एक आम बिजनेसमैन से एक समाज सेवक बनने के सफर में संजय गुप्ता को सबसे ज्यादा प्रेरणा उन उत्साही नारों से मिली जो गरीब और परेशान जनता के दिल से निकलते हैं,वह कहते हैं कि पैसे देकर अपने नाम की नारेबाजी तो नेता भी कराते हैं मगर परेशान जनता की जब परेशानी दूर होती है तो वह जो कुछ भी कहती है वह दिल से कहती है और इसी दिल की आवाज को बार बार सुनने के लिए वह समाज सेवक बन गए हैं,.

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