गंभीर अड्डा

जनता जो पढ़ती है हम वो पढ़ाते हैं vs जो हम पढ़ायें जनता वो पढ़े

अक्टूबर 27, 2018 कमल पंत

पाठक जो पढ़ रहे हैं हम वह पढ़ा रहे हैं इस भावना के साथ अधिकतर अख़बार बस जनभावना को ध्यान में रखते हुए,करवाचौथ मनाने के दस तरीके,दिन भर में ये न करें,ये करें टाईप की खबरों के साथ पेज भर देते हैं.पर क्या सच में अखबार जनभावना के ही हिसाब से या पाठकों के हिसाब से खबरों का चयन करते हैं ? और सबसे बड़ा सवाल क्या उन्हें एसा करना चाहिए ?

अखबार पाठकों को ख़बरें देते हैं,अखबार पाठकों को सच से रूबरू कराते हैं ये सब तो बहुत सुना था हमने लेकिन अखबार पाठकों को वही पढ़ाते हैं जो वह पढ़ना चाहते हैं ये पहली बार देखा. पिछले दिनों चार पांच अखबारों में जाना हुआ (नौकरी मांगने के लिए नहीं दुसरे काम से) मैंने देखा कि टीम के हिसाब से काम हो रहा है. जैसे स्टील फैक्ट्री में जाओ सब प्रोडक्शन में लगे हैं वैसा ही कुछ माहौल था.

मजदूरों की शिफ्ट बंटी हुई थी(माफ़ करना साथियों यही फील आयी) एक तरफ हेल्थ पेज बन रहा है जिसके प्रोडक्शन की जिम्मेदारी फलां फलां टीम लीडर पर है उसके टीम की शिफ्ट 10 से 6 है. थी 1 बजे लंच होता है. 2 बजे वापस अपनी शिफ्ट पर.

चलो कोइ बात नहीं,कार्परेट कल्चर अपना ही लिया है तो यह सब होगा ही. और ये रूटीन कोइ दस साल से फोलो कर रहा है कोइ 20 त्योहारों में ज्यादा एड आते हैं इसलिए त्योहारों में छुट्टी मांगने की भूल न करें. और शेड्यूल एकदम टाईट है. इन सबको बुरा मैं तब नहीं कहता जब अपने मन से काम करने की आजादी होती जिसके लिए आए हैं.

अधिकतर होता ये था कि एडिटर और रिपोर्टर खबर बनाने में ध्यान लगाते थे,खबर के हर हिस्से की बारीकी से जांच पड़ताल होती थी,पेज हेल्थ वाला ही क्यों न हो डाक्टर और सबंधित विशेषज्ञ से पूरी बातचीत और उसके बाद एक सही बेलेंस रिपोर्ट जो जनता के लिए कारगर होगी,उन्हें फायदा पहुंचाएगी.

लेकिन अब एजेंसी से या पुराने संकलन से कोइ हेल्थ वाली उठा ली (भले ही वो आज के समय में रिलिवेंट हो या नहीं) उसको थोडा एडिट किया. पासिबल हुआ तो किसी डाक्टर से बात कर ली नही तो कह दिया कि लन्दन की एक रिसर्च में पता चला है. अब खबर को सजायेंगे लेकिन बहुत मेहनत से. पूरी मेहनत उसे सजाने में,रिपोर्टर एडिटर दोनों मिलकर एक ही काम करते हैं पेज सजाने का. पहले ये काम होता था पेज डिजायनर का.

मगर पैसे बचाने के लिए लाला ने कहा नौकरी करनी है तो ये काम भी सीखना होगा, और जितने एडिटर हैं सबने अपना मुख्य काम छोड़कर यही का सीख लिया.

अब हाल ये हैं कि सभी लोग सिर्फ पेज डिजायनिंग करना सीख कर रेगुलर मजदूर बन गए हैं,ख़बरों पर मेहनत पुराने जमाने की बात हो गयी है.नया ज़माना सिर्फ और सिर्फ डिजायनर पेज बनाने का है जिस पर आकर्षक विज्ञापन लग सके और लाला को फायदा पहुंचे.

खैर छोडिये हमें क्या, हम जब अपने मित्रों के यहाँ बारी बारी पहुंचे तो देखा कि सबका फोकस बस एक जगह था और वह जगह थी पेज कैसे सजाना है. ख़बरें भी इम्पोर्टेंस रखती हैं लेकिन वही आटे में नमक बराबर ये मानना था हमारे मित्र एडिटर्स का.

अखबारों की दुनिया में फिलहाल करवाचौथ के दस फायदे जैसी ख़बरों के लिए भरपूर जगह है मगर मीटू के दस फायदे बताने में जान जाती है. करवाचौथ से क्या अंतर आएगा पता नहीं मगर मीटू से अवेयरनेस फैलेगी ये सब जानते हैं.लेकिन अखबार मालिक कहता है हम वो पढ़ाना चाहते हैं जो जनता पढना चाहती है.जबकि हकीकत ये है कि जनता वही पढ़ती है जो अखबार पढवाता है और अखबार ख़बरों का फैसला मार्केट के हिसाब से लेता है.

मीटू की खबर के पेज पर कोइ विज्ञापन शायद ही मिले,सम्भावना नहीं होती न, मगर करवाचौथ की खबर पर भरपूर विज्ञापन की संभावना होती है. ज्वेलरी से लेकर होटल्स तक की ख़बरों की भरमार आखिर सिर्फ वहीं पायी जा सकती है.

चलो हमको क्या,हमतो ओयेबांगडू के लिए पैसे ढूंढ रहे हैं किसी के पास हों तो बताना…बाकी अकाउंट में भेजने की इच्छा हो तो अकाउंट नम्बर मांग लेना ..

 

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