बांगड़ूनामा

जन्म

दिसंबर 24, 2018 ओये बांगड़ू

अंगेठी के चूल्हे पर

मैने शब्दों को रख दिया

उबलने को

 

पतीला अब गर्म हो

चुका आग की धाह से

पानी खौलने लगा

जिससे निकलते बुलबुले

कुछ गढ़ने को आतुर हैं

 

जब ये बुलबुले फूट जाते

आतुरता विलुप्त होकर

ठंडी पड़ जाती

 

आँच में कई बार

ख़ुद को झोंका

तपिश बढ़ाने को

तब जाके कहीं

 

भाप से निकलती

कुछेक कल्पनाएं

जो अदृश्यता की आड़ में

किसी कविता को जन्म देती है

 

-राजीव भारती

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