यंगिस्तान

फिल्म रिव्यू :जग्गा जासूस, कुछ खट्टी कुछ मीठी जासूसी

जुलाई 15, 2017 ओये बांगड़ू

सहर करीब दस साल से पढ़ने और लिखने के शौक को काम की तरह करते हैं। तीन साल से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं। खुद को अति-प्रैक्टिकल मानते हैं इसलिए इनकी कहानियों में भी प्रैक्टिकल ज्ञान साफ़ झलकता है। फ़िलहाल, प्राइवेट कंपनी में एडमिनिस्ट्रेटर हैं और अपने घर में राइटर। कहानियां लिखते हैं, गज़लें लिखते थे, अब इन दिनों उपन्यास लिख रहे हैं। आगे क्या लिखेंगे इसका क़तई कोई ज्ञान नहीं पर लिखते रहेंगे,इसका भरोसा है।

लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’

रणबीर कपूर की फ़िल्म के बारे में लिखने से पहले रणबीर कपूर के बारे लिखना बहुत ज़रूरी होता है.  ये फ़िल्म रणबीर के अपने प्रोडक्शन हाउस की फ़िल्म हैं जिसका नाम है “पिक्चरशुरू” और जग्गा जासूस पिक्चर शुरू की शायद पहली ही फिल्म है.
अनुराग बासु मर्डर, गैंगस्टर, काइट्स और बर्फी जैसी फिल्म्स बना चुके हैं, इसलिए हमें ये पता है कि इनकी फ़िल्म अच्छी हो या बुरी पर इमोशनल ज़रूर होगी, रोमांटिक ज़रूर होगी और स्लो हंड्रेड परसेंट होगी मगर हट के होगी.
इसी तर्ज़ पर अनुराग की एक और हट फिल्म की…
कहानी 

फ़िल्म की कहानी सन पिच्यानवे को पुरिया, पश्चिम बंगाल में हथियारों से भरी पेटी हवाई जहाज से गिरने से शुरू होती है. फिर अगले ही पल कोलकाता आज ही के दिन बुक फेयर से शुरू होती है. एक प्ले की तरह . जिसको श्रुति यानी कैटरीना कैफ़ नैरेट कर रही हैं. एक कॉमिक सीरीज़ जिसका नाम है – जग्गा जासूस (जो की अंग्रेजी में है) बच्चों में ख़ासी लोकप्रिय है. लेकिन बच्चे यही समझते हैं कि ये एक फिक्शनल करैक्टर है, इसमें सच्चाई नहीं है. यहाँ श्रुति उन्हें जग्गा (यानी अपना हीरो रणबीर) की कहानी गा के सुनाती है. चार फिट का जग्गा एक हॉस्पिटल में पला बढ़ा है क्योंकि उसके माँ-बाप उसे वहां छोड़ तो जाते हैं पर लेने नहीं आते. वो हकलाता है इसलिए कम बोलता है. फिर एक दिन उसको ट्रेन से गिरता एक आदमी (सस्वाता चैटर्जी) मिलता है जो उसे बताता है कि अगर वो हकलाता है तो गा के अपनी बात कह सकता है. फिर वो ही आदमी उसे अपने साथ रख लेता है. दोनों बाप बेटे बन के रहने लग जाते है. एक दिन वो आदमी एक और अज्ञात आदमी (सौरभ शुक्ला) के दिखने भर से जग्गा को बोर्डिंग में पढ़ने छोड़ खुद गायब हो जाता है.

जग्गा जैसे-जैसे बड़ा होता है उसका दिमाग और तेज़ होता जाता है. वो मर्डर मिस्ट्री भी सोल्व कर लेता है. एक दिन उसे श्रुति सेनगुप्ता दिखती है और उसकी ज़िन्दगी अवैध हथियार, पुलिस, गुंडे और न जाने कितने ख़तरों से उलझ जाती है.
कहानी शुरुआत में बाँधने में कामयाब होती है पर बार-बार कैटरीना का नैरेटर बनकर तंग करने आना कंटीन्यूटी तोड़ता है. दूसरा तकरीबन कहानी गा के सुनाई समझाई गयी है, न सिर्फ गा के बल्कि अच्छा ख़ासा म्युज़िक बजा के.
एक्टिंग

रणबीर कपूर के हौसले की तारीफ करनी चाहिए कि साढ़े चार साल से बनती इस अनोखी फ़िल्म को आख़िरकार उन्होंने खत्म किया. अनुराग के साथ बर्फी जैसी सुपरहिट और क्लास फ़िल्म बनाने की वजह से भी ये फ़िल्म की हो सकती है. रणबीर के एक्सप्रेशन कमाल के हैं. इमोशनल होकर हकलाते कुछ सीन में वो आँख में आंसू लाने के काबिल लगे है. ख़ास तौर पर तब जब उन्हें अपने जन्मदिन पर पापा के कोरिअर आने का इंतज़ार होता है पर डाकिया मना कर देता है.
कैटरीना फ़िल्म में सिर्फ इसलिए रखी गयी होंगी कि किसी खूबसूरत गुड़िया की दरकार होगी. कैटरीना कुल जमा सोलह बार कहीं न कहीं टकराई हैं या गिरी हैं. नैरेशन का काम उन्हें देकर अनुराग ने सबसे बड़ी भूल की है.
सौरभ शुक्ला वेस्ट हुए हैं. उन्हें ये रोल देने का औचित्य समझ से परे है. सस्वाता चैटर्जी बंगाली कलाकर हैं. बेहतरीन कलाकार हैं, उनकी एक्टिंग छाप छोड़ती है.
बाकी अनजाने कलाकार भी कहीं नहीं दिखे हैं. किसी को ऐसे सीन ही नहीं मिले हैं जिनसे वो हाईलाईट हों.
डायरेक्शन/स्क्रीनप्ले 

यहाँ दोतरफा बात सामने आती है, डायरेक्शन बुरा नहीं है पर स्क्रीनप्ले धीमा है. मुझसे पीछे बैठे कुछ लोग कई बार बोले कि फ़िल्म बोर कर रही है. डायरेक्शन इसलिए भी बुरा नहीं है कि रणबीर ने अच्छी एक्टिंग की है और रणबीर ही तकरीबन फ़िल्म में बने हुए हैं. फिर भी स्क्रीनप्ले धीमा है. अनुराग से और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं.
डायलॉग्स 

डायलॉग्स हैं ही कब ये ये समझना मुश्किल है. क्योंकि गानों और संवादों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. फिर भी डायलॉग्स ठीक हैं, एवरेज हैं, कुछ ख़ास नहीं है सिवाए इसके कि “दिमाग के दो हिस्से होते हैं, एक लेफ्ट, और एक राईट,.. जो लेफ्ट है वो लॉजिकल है, पर जो राईट है वो थोड़ा पागल है, क्रिएटिव है”
म्यूजिक/लिरिक्स 

फिल्म में प्रीतम का म्यूजिक है, और बहुत सारा है, कुछ जगह भला लगता है तो कुछ जगह शोर लगने लग जाता है. ख़ास तौर से इंटरवल तक. फिर भी जो ख़ास गाने हैं उनमें से कोई भी बहुत ज्यादा चलने वाला नहीं. उल्लू का पट्ठा हो या गलती से मिस्टेक बुरे नहीं लगते पर डाउनलोड करने लायक भी नहीं हैं. सारे गाने अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं. उनका अब तक का रिकॉर्ड देखते हुए गाने उस लेवल के नहीं हैं. अकेला झुमरीतलैया गाना नीलेश मिश्रा ने लिखा है और अच्छा लिखा है.
“खाना-खा के दारु पी के चले गये” गाना सुनने योग्य हैं. ज़रूर सुनिए, इसमें सेंस है. बाकी काम चलाऊं हैं.
क्लाइमेक्स 

दौड़-भाग उछल-कूद होते हुए भी क्लाइमेक्स “वाह” कहने पर मजबूर नहीं करता. हथियारों की तस्करी जैसे गंभीर मुद्दे को उठाने के बावजूद फ़िल्म का अंत बहुत जल्दबाजी में किया गया लगता है. आखिर में मेन विलन के रूप में जाने-माने ऑफ बीट फिल्म कलाकार का चेहरा दिखा कर अगले पार्ट के लिए जगह छोड़ना मुर्खता लगी है.
फ़िल्म क्यों देखें?

बाप बेटे की अच्छी केमेस्ट्री देखनी हो तो, रणबीर की बेहतरीन एक्टिंग, अफ्रीका के खूबसूरत जंगल और जानवर और बचपना अभी भी कूट-कूट कर भरा हो तो.
क्यों न देखें?

सिर्फ एंटरटेनमेंट के भूखे हैं तो न जाएं. इसे कोई जासूसी फ़िल्म समझ रहे हैं तो भी तौबा करें.

rating – 3*/5.

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