गंभीर अड्डा

इस जमाने की हकीकत

नवंबर 8, 2018 ओये बांगड़ू

मेरे एक परिचित बुजुर्ग हैं जिनका हाल ही में अचानक निधन हो गया। उनके निधन का समाचार बड़ा दु;खी कर देने वाला था।जब वह जीवित थे तो अक्सर मुझसे कहते थे कि मुझे मेरी जन्मभूमी ही सबसे ज्यादा प्यारी है।पर मेरे बेटे-बहू मेरी इतनी फिक्र करते हैं कि मुझे घर जाने ही नहीं देते,कहते हैं कि अगर आपके स्वास्थ्य में वहां कोई दिक्कत आई तो आपकी वहां देखभाल कौन करेगा? मेरे बेटे-बहू चाहते हैं कि मैं उन्हीे के साथ रहूं ताकि भविष्य में कोई परेशानी हो तो वह दोनों मेरे पास हों इसलिए बच्चों की खातिर पिछले 10 वर्षों से दिल्ली में रह रहा हूं।

लेकिन उनका मन यहां बिल्कुल भी नहीं लगता था। हांलांकि उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था पर भविष्य में होने वाली किसी आशंका के चलते वह इसी शहर में थे।

उन्होंने तो अपनी आधे से ज्यादा जिंदगी पिथौरागढ़;उनकी जन्मभूमी,उत्तरांचल;में गुजारी थी पर अपनी पत्नी के निधन के बाद से वह अपने बच्चों के साथ आ गए थे। उनके बच्चों की अब तक की जिंदगी इसी शहर में गुजरी थी इसलिए ये शहर उन्हें बहुत प्यारा था।

विगत 2 वर्षों से मैंने उन्हें पल पल पिथौरागढ़ जाने के उद्वेलित देखा, उनके बच्चे छुट्टियों में कभी गोवा, कभी उटी, और कभी वैष्णव देवी घूम आते थे और चूंकी उनकी उम्र थोड़ा ज्यादा थी इसलिये उन्हें साथ नहीं ले जाया जाता।उनका 3 बीएचके अपार्टमेण्ट और एक आलिशान पार्क ही उनकी जिंदगी बन गया था।

उनकी पिथौरागढ़ जाने की इच्छा दिनोंदिन बलवती होती जा रही थी और चूंकि मैं भी पिथौरागढ़ का रहनेवाला हूं इसलिए वह अक्सर मुझसे अपनी इस इच्छा को जाहिर करते थे। मैने उनके बच्चों से इस सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि इस उम्र में पिताजी को अकेले वहां छोड़ना बिल्कुल भी तर्कसंगत नही है। उनकी बात भी मुझे बिल्कुल सही लगी क्यांेकि इस उम्र में उनको कोई भी परेशानी होने पर वहां कौन सहारा देगा।

वह अपने परिवार के साथ होते हुए भी नितांत अकेले थे। वह अलसुबह उठकर पार्क चले जाया करते थे और जब तक वहां से वापस आते तब तक बेटे को छोड़कर बाकी लोग जा चुके होते थे। और बेटे के पास भी इतना समय नही होता था कि दो पल बैठकर बात कर सके।

वह मुझसे अक्सर मिला करते थे और जब भी मेरे पास आते साथ में अपनी एक पिथौरागढ़ से जुड़ी याद लेकर आते जिससे मुझे भी पिथौरागढ़ की याद ताजा करने का मौका मिल जाता।

उनके बेटे व बहू रविवार के दिन कहीं बाहर घूमने जाते थे पर वो हर बार अपने बच्चों के साथ जाने से मना कर देते। उनका तर्क था कि उनके बच्चों को साथ घूमने का मौका कम मिलता है इसलिये वो उनका इतवार बर्बाद नहीं करना चाहते।

इसके उलट उनके बच्चे उनकी कोरी फिक्र के नाम पर उनको पिथौरागढ़ नहीं जाने देते।

बीते दिनों मुझे किसी काम से पिथौरागढ़ जाना था तो मैने उन्हें अपने साथ चलने का निमंत्रण दे दिया। उनके बच्चों ने शुरू में उनको भेजने में थोड़ी आनकानी की पर आखिरकार वो मान गए।उनके बच्चों की उनको सख्त हिदायत थी कि वो मेरे साथ ही लौट आएं।

उनका मन उनकी जन्मभूमी पर पहुंच कर कितना प्रफुल्लित था यह मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। वह शुरु के कुछ दिन तो बहुत खुशी से रहे पर जैसे जैसे उनकी वापसी के दिन निकट आते गए उनके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी ने घर बना लिया और दिल्ली वापसीे के पहले दिन उनके दिमाग की नसें फट गईं और वहीं उनकी मुत्यु हो गई।

भविष्य की स्वास्थ्यगत समस्याओं और उनके अकेलेपन के कारण उनके बच्चों ने उन्हें उनके शहर से दूर रखा पर आखिरकार ये दोनों ही मकसद व्यर्थ सावित हुए। उन्हें अपनी जन्मभूमि का अकेलापन भी प्यारा था। और दोबारा उस पराए शहर जाने की परेशानी ने आखिरकार उनकी जान ले ली।

उनका दिल उनके शहर में रमता था वहां वह अकेले भी खुश थे,और दिल्ली में अपने बच्चों के पास होते हुए भी दुखी।

 

 

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