बांगड़ूनामा

इस उत्तरायणी सुनिए सुर में काले कव्वा

जनवरी 2, 2019 ओये बांगड़ू

बचपन से छतों में चीख चीख कर कव्वों को बुलाया होगा आपने , काले कव्वा काले घुघते की माला खा ले, ये हमने इतना बेसुरा होकर गाया है कि कई बार कव्वों ने आकर हमें चुप कराया है कि शांत हो जा भाई अब न गा मेरे कान दुखने लगे हैं।

कव्वों को बुलाकर इस तरह खिलाने के लिए गाई जाने वाली यह कविता कभी हमने सुर में सुनी ही नही इसलिए आज तक हम बेसुरे होकर छत से कव्वों को आवाज मारते रहते हैं।

और वैसे भी कव्वे कौनसा सुरीले होते हैं सुरीली तो कोयल होती है।

लेकिन कमल जोशी शायद कव्वों में भी सुर ढूंढ कर लाये हैं।

आपने काले कव्वा बेसुरा होकर बहुत गा लिया मगर आपके बच्चे इसे सुर में गाएंगे इसका प्रॉमिस हमारा रहा।

इस पुसड़िया आपके कानों को सुकून देने और कव्वों को सुर में बुलाने के लिए आ रहा है काले कव्वा सुर में।

कमल जोशी और गणेश मर्तोलिया की आवाज में सभी कव्वे अब सुरीला काले कव्वा सुनकर घुघते खाने आएंगे और आप भी इस सुरीले काले कव्वा में कहीं खो जाएंगे।

Audio – अभी सिर्फ अलाप सुनिए 

2 thoughts on “इस उत्तरायणी सुनिए सुर में काले कव्वा”

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