बांगड़ूनामा

इस मामले में मैं इतना तटस्थ हूँ – मनास

फरवरी 22, 2019 ओये बांगड़ू

हरियाणा के छोटे से गाँव में रह कर खेती करने वाले मनास अक्सर अपने गाँव वालों और आस पास वालों को किताबों की दुनियां से रूबरू कराते रहते है. मनास के लिखे शब्द  समाज की कडवी सच्चाई को बताते है.

 

कितनी तरह की दुर्घटनाएँ,

जिनमें सैकड़ों की संख्या में जानें चली जाती हैं

मेरे लिए सिर्फ़

एक सामान्य और रोज़मर्रा की बात हैं।

 

इस मामले में मैं इतना तटस्थ हूँ

जितना कि वह सूरज

जो बेशर्मी से हर अगले दिन चला आता है

ताकि रात का सौंदर्य ढँक न दे,

दुर्घटना में बचे हुए मांस और कौओं की चोंच को

 

और हर वह फूल

जो अगले दिन पुन: खिल जाता है

ताकि उसे किसी क़ब्र पर चढ़ाया जा सके।

 

इस मामले में मैं सचमुच तटस्थ हूँ

ठीक उसी तरह जिस तरह मैं अपने खेतों में

कीटनाशकों के छिड़काव से चींटियों की

एक पूरी की पूरी बस्ती को तबाह कर डालता हूँ

और संज्ञाशून्य बना रहता हूँ।

 

इस मामले में इतना तटस्थ हूँ

कि यदि कोई मुझसे मेरी बेटी भी छीन ले

जो इस दुनिया और मेरे बीच में

मेरे एकमात्र संपर्क का माध्यम है,

तब भी अगले दिन मैं अपने खेतों में काम पर जाऊँगा

अलस्सुबह पंछियों को दाना डालूँगा

और अपने बैलों को गुड़ खिलाऊँगा।

 

सार्वजनिक विरोध तो दूर की बात है,

व्यक्तिगत विरोध के लिए भी

मैं अपने जिस्म की अँधेरी कंदराओं को ही चुनूँगा।

 

मेरा विलाप ढहेगा मेरी चमड़ी के अंदर ही

दो-चार पत्थर फेंक दूँगा

रात को खिले हुए पूरे चाँद पर

पपीहे और टिटिहरी के अंडे फोड़ दूँगा

बस इतना ही…

 

और यह सब करूँगा मैं बेआवाज़

जैसे निशाचरों को लगे कि मानो

सबसे उदास संगीत की धुन ढूँढ़ी जा रही हो।

 

इतना ही जुड़ाव रह गया है मेरा

इस पृथ्वी से, तुम्हारी पृथ्वी से।

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