यंगिस्तान

रिस्की डोयाट -घुम्मकड़ी की कहानी 2

सितंबर 27, 2018 कमल पंत

इस घुम्मकडी की आधिकारिक शुरुवात तो वैसे उत्तराखंड के अल्मोड़ा से मानी जा सकती है, लेकिन अल्मोड़ा तक पहुँचने में भी एक खूबसूरत सफर के साथी बन गए थे हम तीनों इसलिए अल्मोड़ा तक की यात्रा को इस घुम्मकडी से अलग कर देना उसका सरासर अपमान होगा, हम तीनों ने अपनी अपनी यात्रा अपने अपने नगरों से शुरू की. रिस्की और मैं जहाँ दिल्ली से अलग अलग साधनों से हल्द्वानी की तरफ निकले वहीँ डोई लखनऊ से इस मंजिल के लिए निकल चुका था.
तय कार्यक्रम के अनुसार हमें सुबह 9 बजे से पहले हल्द्वानी से विदा ले लेनी थी,लेकिन अचानक डोई का बाईक प्रेम जाग गया और उसने रात्री में ही एक प्रस्ताव रखा कि क्यों न बिनसर वाईल्ड लाईफ सेंचुरी तक का सफर बाईक से तय किया जाए. प्रस्ताव अच्छा था और बाईक के अपने अलग फायदे भी थे. लेकिन दिक्कत यह थी कि आदमी तीन और बाईक एक एकदम शोले के गब्बर सिंह वाला सीन बनकर आँखों के सामने आ गया.

‘कितनी बाईक चाहिए रे कालिया?’

‘सरदार दो ‘
‘क्यों ?’
‘हम तीन हैं न सरदार’
‘तुम तीन और बाईक दो बहुत नाईंसाफी’
मगर हमारे लिए ये नाईंसाफी नही बल्कि इंसाफी थी, मुझे पीछे बैठकर सफ़र करने में कोइ गुरेज नहीं,चलाने में हो सकता है आप कई दफा प्रकृति की ख़ूबसूरती मिस कर दें,लेकिन पीछे बैठा आदमी हर चीज पर बारीक नजर रख सकता है.वैसे असल रीजन ये था कि पहाड़ में बाईकिंग का मेरा कोइ अनुभव नहीं है.
तो डोई जी ने अपने मित्रों से बाईक के लिए अपील कर डाली, रात्री में हुई अपील का सुबह तक अच्छा असर हुआ और सुबह होते होते बाईक के साथ साथ दो जबर्दस्त लोगों से   मुलाक़ात हो गयी.दीपक पनेरू और गणेश मर्तोलिया.
सुबह हल्द्वानी में रिस्की जी की ट्रेन रेलवे की कृपा से 4 घंटे करीब देरी से चल रही थी और इस दौरान हमारी मुलाकात हुई एक युवा गायक से.

आज के दौर में जहाँ गायक यो यो हनी सिंह बनने की तमन्ना पाले अपनी प्रापर्टी बेचकर एल्बम निकाल रहे होते हैं वहीं दूसरी तरफ गणेश मर्तोलिया जैसे युवा गायक अपनी सेविंग्स से अपने क्षेत्र को प्रमोट करने के लिए’लाल बुरांश’जैसी यूट्यूब विडिओ निकालते हैं जहाँ उन्हें पहले से पता है कि उनका निजी फायदा इसमें न के बराबर है.एसे लोगों से मिलकर प्रेरणा तो मिलती ही है साथ ही एसा कुछ करने का लगातार मन भी होता है. लाल बुरांश का विडिओ ये है

फिलहाल यात्रा को आगे बढाता हूं.

काठगोदाम रेलवे स्टेशन प्लेन्स एरिया को पहाड़ से जोड़ने का आखिरी रेलवे स्टेशन है,इसके बाद आगे कहीं भी रेल नहीं जाती, ऊपर पहाड़ों में बड़ी बड़ी गाड़ियाँ हांफ जाती हैं लम्बी लम्बी रेल से तो उम्मीद ही क्या करना, मेरा निजी रूप से मानना है कि नैनीताल में टूरिस्ट इसलिए ज्यादा है क्योंकि काठगोदाम तक रेल है, वरना अल्मोड़ा और पिथोरागढ़ में भी टूरिस्ट बहुत ज्याद होते अगर अंग्रेज वहां भी रेल पहुंचा गए होते.

काठगोदाम में रिस्की के आने तक हम तीन चार लोगों ने चाय पर चर्चा कार्य्रक्रम में हिस्सा लिया,जहाँ गणेश के गाने पर टिका टिपण्णी तो की ही गयी साथ ही आगे की यात्रा को लेकर डराने धमकाने वाले उपदेश का भी आदान प्रदान हुआ,इस बीच इन्तजार था तो बस रिस्की के आने का. 

और रेलवे की कृपा से रिस्की का अवतरण पहाड़ के द्वार पर जल्दी हो गया, देहली पूजने के साथ ही हमने यामहा और पल्सर को खाना खिलाया और आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े.

समय सीमा बाँध कर अक्सर हम सोचते हैं कि बढिया टाईम मेनेजमेंट हमें आ गया लेकिन बचपन से ही दिमाग में एक कीड़ा कुलबुलाता है कि जो समय फिक्स किया है उसमे हर हाल में काम पूरा नहीं ही करना है, याद है आपको बचपन में पढाई के लिए एक टाईम टेबल बनाकर दीवार में चिपकाते थे,कि इस समय से उस समय तक गणित फिर विज्ञान फिर अंगरेजी.मतलब टाईम टेबल पढकर कोइ भी सोचेगा कि यार गजब टाईम मेनेजमेंट कर रखा है.मगर हकीकत में वह कभी फोलो ही नहीं होता.

तो हम तीनो भी उसी तरह से टाईम टेबल बनाकर बड़े हुए थे, यहाँ भी टाईम टेबल बना लिया कि इस समय भीमताल क्रास करेंगे,फिर इस समय अल्मोड़ा में होंगे फिर ये टाईम हमारा वाईल्ड लाईफ में कटेगा वगेरह वगेरह.मललब टाईम टेबल चकाचक.लेकिन हरकतें वही बचपन वाली..
आगे क्या हुआ ये कल बताऊंगा.तब तक के लिए बने रहिये ..पिछली कड़ी ये रही .

रिस्की डोयाट -घुम्मकड़ी की कहानी 

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