गंभीर अड्डा

इसको अपडेट करने की जरूरत है-ग्रह नक्षत्र

मार्च 30, 2018 ओये बांगड़ू

अंध श्रद्धा किस हद तक की जाए और क्यों की जाए ये बड़ा सवाल है.क्योंकि अक्सर आस्था के अंदर सवाल नहीं पूछे जाते जैसे वाक्य कहकर सवाल करने वालों को रोक दिया जाता है,95 वर्षीय बुजुर्ग और पूर्व ज्योतिषाचार्य स्व दिनेश चन्द्र जी से हुई बातचीत पर आधारित इस लेख में कहीं कोइ समस्या लगे या कोइ सवाल मन में उठे तो अवश्य पूछियेगा.हमारा मकसद किसीकी आस्था पर चोट करना नहीं अपितु खुद से सवाल करना है 

आपने ये चिन्ह(कुंडली) मिलाने वाले या छोटी मोटी पूजा पाठ करने वाले पंडित देखें हैं?? देखिएगा कभी,उनसे मन्त्रों के बारे में पूछियेगा,चिन्ह में मौजूद ग्रहों के बारे में जानियेगा,वो आपको उतना ही बता पायेंगे जितना उन्होंने अपने पिता या गुरु से सीखा होगा,एक सीधा साधा व्यापार बना लिया है…
इस व्यापार में सामने वाले का डर का भरपूर फायदा उठाया जाता है..
95 वर्षीय बुजुर्ग पूर्व ज्योतिषाचार्य स्व दिनेश चन्द्र जी बताते हैं कि 70 साल की आयु तक वह लोगों के ग्रह नक्षत्र देखकर उनके भविष्य का पूर्वानुमान लगाया बाद में उन्हें आभाष हुआ कि वो अपने पेशे के साथ न्याय नही कर रहे,इसलिए उन्होंने इसे एक प्रोफेशन के रूप में त्याग दिया और व्यवहारिक रूप से करते रहे..
उनके अनुसार ‘कई वर्ष पहले तब के पंडितों(पंडित मतलब सिर्फ ब्राह्मण नही समस्त जातियां जो उस समय शिक्षा के लिए आती थी ) ने ग्रह नक्षत्र को एक आधार बनाया व्यवहार का,और उसके लिए नगर में मौजूद हजारों बच्चों पर एक अध्ययन किया,अध्ययन का विषय का मनुष्य का व्यवहार,ये टेक्नोलोजी का ज़माना नहीं था,दूरसंचार तो क्या संचार के उचित माध्यम उपलब्ध नहीं थे,एक स्थान से दुसरे स्थान तक जाने में ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता था,उस देश काल परिस्थिति के हिसाब से इन ग्रह नक्षत्र के आधार पर व्यवहार तय किये गए,मसलन पाँव में चक्र है तो घुमक्कड़ प्रवर्ती का होगा,हाथों में चक्र है तो इस तरह का व्यवहार होगा,पैदा होने के समय ग्रह की ये स्थिति थी इसलिए इसका व्यवहार एसा हुआ सातवें ग्रह में शुक्र है तो बच्चे का कैसा व्यवहार है,मंगल है तो क्या व्यवहार है ,शनी है तो क्या व्यवहार है ब्रहस्पति में क्या व्यवहार है.उन्होंने इस तरह ग्रह नक्षत्र तय किये और एक व्यवहार तय किया कि इनके अनुसार एसे व्यवहार होंगे. इस रीसर्च को करने में कई सौ वर्षों का समय लगा.ये कोइ बड़ी साईंस की खोज नहीं थी लेकिन उस समय के लिए बड़ी चीज थी.कई विकारों का पूर्वानुमान लगाने में सहायक थी,भविष्य में रोग संबंधी किसी स्थिति को बता पाने सक्षम थी ताकि जातक अपने भविष्य के रोग के लिए सचेत हो जाए,आज तो क्या है बल्ड टेस्ट कराया रोग सामने,टेक्नोलोजी इतनी विकसित है कि रोगों का पता लगाने में ज्यादा समय नहीं लगता और नाही इलाज ढूँढने में कोइ दिक्कत है.लेकिन तब कई तरह की बीमारियों के इलाज के बारे में कोइ जानकारी नहीं रहती थी,रोग पकड में आने में सालों लग जाते थे,आज के समय की छोटी छोटी बीमारी तब के लिए महामारी थी. ये ग्रह गणित बस उन सबका पूर्वानुमान लगा पाने में सहायक होते थे. तब भी इनकी  प्रमाणिकता कितनी थी ये कहा नही जा सकता लेकिन एक तरह से आखिरी उपायों की श्रेणी में ये जरूर आते थे.इसके अलावा माँ बाप को पहले ही बता दिया जाता था कि बच्चे का व्यवहार कैसा रह सकता है,उस हिसाब से माँ बाप को लालन पालन में मदद मिलती थी. सूर्य की स्थिति चन्द्रमा की स्थिति आदि को देखकर वर्षफल निकाला जाता था जो एक तरह का पूर्वानुमान ही था,कि वर्ष भर स्थिति कैसी रहेगी,वह पूर्वानुमान भी उस रीसर्च में हुए किसी वर्ष की स्थति की तुलना करके निकालते थे,कृषी में सहायता मिलती थी,देशाटन में सहायता मिलती थी, आज की तरह सुविधाएं तो थी नहीं इसलिए इनके आधार पर लगे पूर्वानुमान सहायक सिद्ध होते थे.

ग्रह नक्षत्र से पूर्वानुमान लगाया जाता था उससे उस समय की कुछ बीमारियों पर भी काबू पाने में इससे बहुत राहत मिली.क्योंकि एकसमान व्यवहार वाले बच्चों के अध्यन में ये सामने आया कि हैजा डायरिया जैसी बीमारी जब होती है तो बच्चे कैसा व्यवहार करने लगते हैं.जब भी रीसर्च हुई तब की देश काल परिस्थिती के हिसाब से ये बहुत बड़ी रीसर्च थी,इसमें काफी चीजें समाहित थी,जैसे कुछ सम्भावित बीमारियों का इलाज,आपने सूना होगा अक्सर बच्चे के जन्म के बाद कहते हैं कि ये इस नक्षत्र में जन्मा है इसे ग्याहरवें दिन सूर्य दिखाना,इसे नौवें दिन दिखाना,इसके लिए विभूति और सोना रखना वगेरह वगेरह..ये उस समय उस देश काल परिस्थिती के लिए बहुत सही चीजें थी,लेकिन हमने लकीरों के फकीरों की तरह इसे रट लिया इसमें कुछ नया नहीं किया,बीमारियाँ नई आ गयी,टेक्नोलोजी बदल गयी,परिस्थियाँ बदल गयी,व्यवहार बदल गए लेकिन हम ग्रहों और नक्षत्रों पर ही अटके रह गए आगे बड़ने की नहीं सोची,अगर समय के साथ साथ हम भी इसे अपडेट करते तो शायद ये सबसे अच्छी पूर्वानुमान लगाने वाले टेक्नोलोजी होती. मगर हमने इसे सीमित कर दिया.हमने इसे वो पूर्वजों की रिसर्च तक ही सिमित कर दिया.फलस्वरूप इस पर भरोसा खत्म होता चला गया और जाहिर सी बात है होना भी नहीं चाहिए.क्योंकि ये रिसर्च आज की नहीं बहुत पुरानी है.

इसको अपडेट किये जाने की बहुत सख्त जरूरत है.
जैसे पहले हम बादल देखकर अनुमान लगाते थे कि बारिश होगी,या दूरदर्शन वाले अनुमान लगाते थे कि आज आसमान साफ़ रहेगा,ये उनकी पुरानी टेक्नोलोजी थी,अब उन्होंने खुद को अपडेट किया,अब वो और ज्यादा भरोसे से बताते हैं कि आज बारिश होगी या नहीं होगी..
हम अनुमान लगाते हैं कि अष्टम भाव में शनी है तो इसका एसा व्यवहार होगा (इसके साथ ये होगा वो होगा ) मंगल है तो इसका ये व्यवहार रहेगा ,और उसके बाद अपने लालच में कुछ अजीब सा कर्मकांड करने को कह देते हैं मसलन दान करो पूजा करो वगेरह वगेरह…उससे होता कुछ नहीं बस इस पद्धती पर विशवास और कम होता चला जाता है.देखिएगा डायनासोर की तरह विलुप्त न हो जाए पूर्वजों द्वारा उस समय की गयी रीसर्च…सिर्फ आप लोगों के लालच के कारण..

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