ओए न्यूज़

अब कूड़ा कौन उठाएगा बे ?

अक्टूबर 19, 2016 ओये बांगड़ू

आजकल लोग अपने फ़ोन में भयंकर बिजी रहते है इतना कि आस-पास क्या हो रहा है, ये जानकारी भी सोशल मीडिया के जरिये फोनवा पर आए तो ही पता चले. लेकिन इन सब के बीच बांगड़ू राहुल मिश्रा जैसे वेले लोग भी है जो आस-पास ना सिर्फ देखते है बल्कि बिना शौचालय जाए सोचने भी लगते है. आज तो यह जनाब मन की बात करने वाले मोदी जी से मन ही मन बतिया रहे है . आप भी पढ़िए

यूं ही बैठा-बैठा चाय सूटक रहा था तो सामने पड़े हुए कूड़े के ढेर को देखकर स्वछता अभियान दिमाग में कुदकने लगा. और मैंन मोदी जी पर मन ही मन कई सवाल दाग दिए. भई मोदी जी, आपके वो सारे मंत्री महोदय कहाँ गए जो 2 अक्टूबर के दिन हाथ में झाड़ू पकड़ लेते हैं, क्या अब खुद कूड़ा फैलाकर मजमा जुटाने की जद्दोजहद ठंडी पड़ गयी है. अब तो आपका भी कोई वीडियो सामने नहीं आ रहा, जनता यू-ट्यूब पर प्रधान सेवक के सफ़ाई वीडियो का इंतज़ार करते-करते थक चुकी है,मन की बात सुनने के लिए रेडियो खरीद कर अघा चुकी है। भाई बता देता हूँ कि ये सब कुछ मैंने अपने मन में ही बोला, क्योंकि आप भी तो सिर्फ मन की ही बात करते हो.

लेकिन अब तो सब टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सभी सदस्य जब हमें सफ़ाई का महत्व बता चुके हैं, एनडीटीवी पर अमिताभ बच्चन गंदगी से हर बीस सेकंड में एक बच्चे की मौत की भयावयता रोज़ बता चुके हैं, बाल दिवस बाल स्वच्छता अभियान में तब्दील हो चुका है, पूरा देश इस अभियान के धुआँधार विज्ञापनों, विज्ञप्तियों से अटा पड़ा हो, लेकिन फिर भी आपके अंधभक्तों का कुछ तो कर्तव्य बनता है कि कान पर जूं को रेंगने दिया जाये। हम थोड़ा पिछड़ भी गए हैं तो क्या? बातें तो बातें हैं, बातें होती रहनी चाहिए.

अब मोदी जी ने शुरू किया है तो हर जगह भगत हड़बड़ी में ऐसे आधे-अधूरे स्वच्छता अभियान गढ़ते ही जा रहे है। जिनमें उन नागरिकों को शपथ दिलवाई जा रही है, जिन्हे यह भी नहीं पता कि रोज़ उनके घर से निकला कूड़ा शहर के अंदर या शहर के बाहर किस ढलाव पर कूड़े के पहाड़ में बदल जाता है? फिर वह वहाँ से आगे की निपटान प्रक्रिया के लिए कहाँ जाएगा? ऐसी स्थिति में उन्हे कैसे पता होगा कि सुबह किया उनका मल किन नालियों, नालों, सीवरों से होता हुआ नदियों में मिल रहा है या बरसात के पानी में मिलकर वापस उन्हीं के घर में मिलकर घर को सुगंधित कर रहा है।

वैसे अब हम भी क्या कर सकते हैं? हम भी भाई अपनी आदत से मज़बूर हैं, जहाँ जगह मिली वहां थूक दिया, जहाँ जगह वहां लगे मूतने, जहाँ जगह मिली वहां बैठ गए वातावरण को सुगंधित करते।

लिखते-लिखते वो एक फ़िल्म का डाइलॉग याद आ गया जी, ‘ सच तो यह है कि कसूर अपना है, इसकी हमें सजा तो मिलनी ही थी।’ कल शायद मैंने कोई कूड़ा ऐसे ही खुले में फेंक दिया होगा इसलिए आज मेरे सामने कूड़े का ढेर है।

भाई हम तो मज़बूर हैं। लड़की को देख कर हाथ से ताली और मुंह से सीटी तो बजा सकते हैं लेकिन थोडा उठकर कूड़े को कूड़ेदान में नहीं डाल सकते। हम तो बस दूरदर्शन पर विद्या बालन के जहाँ सोच वहाँ शौचालय वाले विज्ञापन देखते रहेंगे और खुले में जाते रहेंगे और गाते रहेंगे ‘लड़की देखी मुंह से सीटी बजे हाथ से ताली, जय हो!’

 

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