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इनकी वजह से फिजिक्स कठिन हुई

दिसंबर 11, 2017 कमल पंत

भौतिकी ,एक एसा विषय जो बचपन में मेरी समझ में अच्छी तरह आता था मगर वो मुझे नहीं समझ पाता था,आपको भी अगर भौतिकी के साथ दुश्मिनी रही है तो आपको इनके बारे में जानना बहुत जरूरी है क्योंकि इनके बिना भौतिकी इतनी कठिन शायद नहीं होती.

भौतिकी यानी की फिजिक्स में इन्होने तो नोबल प्राईस जीत लिया मगर हमारे लिए छोड़ दिये कुछ थ्योरम ,कुछ प्रमेय कुछ सिद्धांत जिन्हें रट रट कर हम इस तरह आगे बड़े जैसे भैंस पीठ में सारस को बैठाकर आगे बडती है.जैसे सारस का होना न होना भैंस के लिए मायने नहीं रखता वैसे ही इस फिजिक्स का होना न होना हमारे लिए मायने नहीं रखता था.

लेकिन बड़े होकर बुजुर्गों ने समझाया कि बेटा सब कुछ भौतिकी है,तुम न समझे तो क्या हुआ है तो वही सब कुछ. खैर एक नोबल प्राईस विजेता हुए मैक्स बोर्न ,पोलेंड में इनका जन्म हुआ था 1882 में और 1970 में इनकी मृत्यू हो गयी ,जर्मनी और ब्रिटिश नागरिकता ली हुई थी. बड़े जबर्दस्त वैज्ञानिक थे,थ्योरिटिकल फिजिक्स पर इन्होने इतना काम किया कि साईंस वाले बच्चे और कालेज में फिजिक्स वाले बच्ची आज भी पढ़ रहे हैं उस काम को.

अभी इस लेख को लिखते समय जब इनके बारे में पढ़ रहा था तो भौतिकी छोड़ कर सब कुछ अच्छा अच्छा लगा जैसे ये सेना में भर्ती हुए,ग्रेजुएशन के दौरान बर्लिन में पोस्टेड थे हालांकि ज्यादा लम्बी नौकरी नहीं कर पाए,अस्थमा का अटैक आया और आ गए रिटायर्मेंट मगर वहां भी इन्होने बहुत कुछ सीखा,वो वैज्ञानिक का दिमाग होता है न हर जगह कुछ न कुछ नया ढूँढने का वही इनका भी था.

वो 1905 में महान अईंसटीन का एक पेपर प्रकशित हुआ,रीसर्च पेपर,आन द इलेक्ट्रो डायनामिक्स आफ मूविंग बाडीज अबाउट स्पेस रिलेटिविटी , इसे समझना है तो खुद समझ लेना कि ये होता क्या था क्योंकि मेरी फिजिक्स कमजोर थी. तो जैसे ही ये पेपर प्रकशित हुआ जाने क्यों मैक्स बार्न साहब भी लग गए  स्पेस पर रिसर्च करने में,इनके साथ जो वैज्ञानिक थे उन्होंने इन्हें किसी रीसर्च वर्क में लगा दिया, उनकी डेथ हो गयी और इनका काम लटक गया. हालांकि बाद में कुछ एक्स्ट्रा मेहनत के बाद काम हो गया.

हुआ क्या कि मैक्स बार्न साहब जर्मनी में जहाँ पढ़ा करते थे,वहां ये फेसिलिटी थी कि आप आसानी से यूनिवर्सिटी बदल सकते थे,तो बार्न साहब बारी बारी पहले हीदबर्ग में पढ़े उसके बाद ज्यूरिक में ,वहां उन्हें किसी ने बताया कि गोटिंगन (University of Göttingen) आ गए ,ये लास्ट वाली यूनिवर्सिटी का नाम नहीं लिया जा रहा मुझसे. तो बस यहाँ आने के बाद वो मैथमेटिक्स के पीछे पड़ गए.अच्छे थे इसलिए प्रोफेशर भी कद्र करते थे तो धीरे धीरे नजरों में आने लगे.

फिर लम्बे समय बाद (मने कालेज वालेज सब स्किप कर दो) इन्होने अपने एक साथी के साथ क्वांटम मेकेनिक्स पर काम किया ,प्रोबेबिलटी डेंसिटी फंक्शन पर इन्हें नोबल प्राईस मिला. उसके बाद इन्होने रची वो सारी थ्योरियाँ जो हमें आज तक समझ नहीं आई ,इसलिए उनके बारे में बातें करना बेहद कन्फ्यूजन पैदा करना होगा.तो बाकी डीटेल जानने में जिसका भी इंटरेस्ट है वो विकिपीडिया देख सकता है.

https://en.wikipedia.org/wiki/Max_Born

 

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