यंगिस्तान

मुनस्यारी – हमारे लिए तो अंग्रेजी रहन-सहन मंगल ग्रह था

अक्टूबर 9, 2018 ओये बांगड़ू

इस कहानी के लेखक लवराज वैसे तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत लेकिन लिखने का भी शौक रखते हैं. आज यह अपनी लेखनी के जरिए उत्तराखंड के छोटे से पर बेहद खुबसूरत शहर मुनस्यारी की यादें साझा कर रहें है

90 के उस दौर में, अंग्रेजी रहन सहन हमारे लिये मंगल ग्रह था. अंग्रेजी हमारे लिये पूर्ण रूप से “बिदेसी” भाषा थी. जो कुल मिला कर दो चार शराबियो के श्रीमुख से ही , एक आध पव्वा घोड़िया रम अंदर जाने के बाद बरसती थी. उनके द्वारा धुत अवस्था में कहे जाने वाले, “फलाना धिमकाना is the principal of the son ” जैसे जुमले , हमारे लिये पंचाम्रत हुआ करते थे . कुछ जिज्ञासु ,ज्ञान के भूखे हमउम्र ये तकिया कलाम अपनी कॉपी  में भी नोट कर लिया करते.

हमारा आचरण और रहन सहन पूर्ण रूप से स्वदेशी था. हमारी पीढ़ी एक आदर्श , भ्यास , होकलेट किस्म की पहाड़ी नस्ल थी हालांकि ऐसा बिल्कुल नही था कि पहाड़ पर उन दिनों हम जैसे पहाड़ी घुघुते ही पाये जाते थे. हमारे अलावा मैदानों में बसी ,हमारे चाचा, ताऊ, बुआ, फूफा के कुलदीपको की भी एक प्रजाति थी . यह प्रजाति हमसे जरा अधिक जेंटलमैन हुआ करती थी. सामान्य रूप से मैदानों में बसने वाली यह नस्ल , बिरादरी के काज कामो के मौसम में ,प्रवासी पक्षियों की तरह गाँव में अवतरित होती.

सात जेबो वाली कारगो की  पैंट पहनने वाले , ये चचेरे ममेरे भाई बहन हमारे लिये भीषण डाह का विषय हुआ करते थे.  हमारी जुबान “टू बन जा टू” करने में लड़खड़ाया करती औऱ हमसे ठीक उलट ,देश के यह कर्णधार हमारे अभिभावकों को टिंकल टिंकल लिटिल इस्तार  सुना के बलाये लेते . इस प्रतिभा प्रदर्शन का हमारे अभिभावकों पर बड़ा ही गहरा  प्रभाव पड़ता था . नैसर्गिक रूप से इनके पूरे प्रवास के दौरान सबसे गर्म रोटी इन्ही की थाली में गिरती थी .मानव स्वभाव के अनुसार इनमें से कुछ बगुले बड़े काइयाँ और टुच्चे किस्म के होते थे .झुठी मार का बहाना बना  के डुदाट मार कर रोना उनकी पसन्दीदा हॉबी  हुआ करती थी. हमारा चरम अवस्था तक कूटा जाना ही उनके लिये मोक्ष था .

ऐसे काइयाँ चचेरे ममेरे भाई यदा कदा  organized accident के तहत, बिच्छु घास की झाड़ियों के हवाले किया जाते थे . मौका मिलने पर किये गये ऐसे विद्रोह के किस्से साहब , आपको मुनस्यारी में उस दौर में रहा कोई भी लौंडा सुना देगा. यह प्रवास बड़ा घातक हुआ करता था . प्रवासी पंछियो के निकल जाने के बहुत दिनों बाद भी , हमारे  अभिभावक उनके हैंगओवर में रहते थे. नतीजन वो 19 का पहाड़ा अंग्रेजी में याद कराने की जिद पकड़ लेते .इसका परिणाम हमे अगले कुछ हफ़्तों तक लतियाये जाने के रूप में भुगतना पड़ता था.

“मेहँदी के छूटने पर रँग दिखाने” वाली कहावत का सही सही मतलब मैंने उसी दौर में कभी सीखा.

 

 

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