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होली पर विशेष-खन्तोली की होली -3

फरवरी 24, 2018 ओये बांगड़ू

पहाड़ों में होली सिर्फ रंग लगाकर नहीं मनाई जाती,पहाड़ों में होली गाकर मनाई जाती है,यहाँ होली सिर्फ एक दिन नहीं होती बल्कि पूरे फागुन के महीने में होती है.पहाड़ की होली पर एक विशेष सीरिज आपके सामने प्रस्तुत है मशहूर व्यंगकार विनोद पन्त की कलम से

व्यंगकार विनोद पन्त

हमारे गाँव में होली बगैर किसी हुडदंग के सम्पन्न होती है . छोटे बडे का सम्मान , लिहाज , बुजुर्गों का मार्गदर्शन कुछ ऐसी चीजें हैं कि आधुनिक युग में भी शान्त होली होती है .
सबसे कठिन तपस्या मुख्य होलार की होती है . पूरे पाँच दिन तक चीर के पीछे पीछे चलकर हर घर तक होली को पहँचाना , होली गाना और सकुशल निभाना मुख्य होलार ही का दायित्व होता है . और होलार तो बीच में ब्रैक ले सकते हैं . उठकर घूम सकते हैं . ढोल के साथ नाच सकते हैं . पर मुख्य होलार एक मर्यादा में बंधा होता है . पहले तल्लागाँव के भैरवदत्त बडबाज्यू होलार थे . होलार के सिर पर पगडी बंधी होती है . सबसे पहले घर पर होली आने पर उसे ही टीका किया जाता है . फिर होली की भेंट स्वरूप कुछ रुपये दिये जाते हैं . इन्ही रुपयों से होली के पूजापाठ . कन्यापूजन , भण्डारा , प्रसाद वितरण किया जाता है . ये दायित्व भी मुख्य होलार का होता है . एक तरह से पूरे पाँच दिन वही गाँव की होली का मुखिया होता है . जब से मुझे होश फाम आई तब से तल्लापोली के उमेश का मुख्य होलार थे . उनके बाद से अब तक तल्लापोली के ही मोहन दा मुख्य होलार का कर्तव्य बखूबी निभा रहे हैं . खास बात ये हैं कि मुख्य होलार किसी तरह की नशा पत्ती नहीं करते . पहले मुख्य होलार के अलावा दो चार और बरिष्ठ होलार भी पगडी में रहते थे . और होलार गाँधी टोपी में. नाघर कर्ताखाली के मेहन का अपने मफलर से ही पगडी बांधकर होली की पक्ति में बैठते थे . मैने इतने समर्पित होलार नहीं देखे . दिन रात हर होली में चाहे गरमी हो बरसात हो . ये कोई होली नहीं छोडते थे . बेहद शौकीन थे . . कपडे सबके सफेद होते हैं . हमारे गाँव की विशेषता अभी तक भी ये है कि रंग डालना , अबीर गुलाल लगाना सभी सभ्य तरीके से होता है . चूंकि हर घर में रंग डाला जाता है . अबीर लगता है . किसी को असहजता हो तो वो हाथ उपर कर दे तो उस पर गुलाल जबरदस्ती फिर नहीं लगाया जाएगा . .एक बात और है यदि कोई ब्यक्ति बरसी(जिसके घर में किसी की मृत्यू हुई हो) वाला हुवा तो वह भी होली गा सकता है पर वह लाइन में तभी बैठेगा जब रंग गुलाल डालने का काम सम्पन्न हो चुका हो . क्योकि बारसी वाले को रंग वर्जित होता है . उसे पिठ्या भी नहीं लगता .
हमारे यहां खडी होली प्रमुखता से गायी जाती है . पर गायी बैठकर जाती है .दो पक्तियों में आमने सामने हालियार बैठ जाते हैं बीच में ढोल बजाने और मजीरे वाला बैठता है . कुछ लोग भीड ( दीवार ) में बैठते हैं . सब पक्तिबद्ध . जो खडे होकर गोल घेरा बनाकर गाते हैं उसे हमारे यहां बन्जार कहते हैं . इसमें गोलाकार वृत्त में धूमते हुए और अपनी जगह पर ही गोल धूमकर गाया जाता है . किसी घर में होली गायन के बाद ढोल वाला नगाडा बजाता है . जिसे पहाडी में नंगाड हाणण कहते हैं . यहां पर ढोल वाले को रुपये मेहनताना जैसा हर घर से मिलता है . एक घर से दूसरे घर तक जाने पर ढोली छलरिया बाजा बजाता है
. जिसमें सभी होलार नाचते हुए पूरी मस्ती में जाते हैं जिसमें बीच बीच में – होय होय होय .. खेल खेल खेल का सामूहिक नारा जैसा लगाया जाता है . ढोल के साथ नाच के बीच में -छाय हौ रधुलि छाय जैसे उत्साहवर्धक स्वर निकाले जाते हैं ताकि जोश और मस्ती कायम रहे . पहाडों में एक किस्सा है – होलिनक बामण और बरेतिक ठाकुर . आप कल्पना कर सकते हैं कि कितनी मस्ती होती होगी . छोटा बडा अमीर गरीब चाचा भतीजा बुबू नाती सब बराबर . कौन किसकी टांग खींच दे पता नहीं . अनलिमिटेड मस्ती . माहौल ऐसा कि कूप ही में यहां भंग पडी है की कहावत चरितार्थ . पर सब कुछ मर्यादा के अन्दर .हमारे यहां एक कहावत प्रचलित है – होइनैकि खाप ( होली की जुबान ) . कोई छोटा किसी बडे की मजाक कर दे या कोई किसी से कुछ बोल दे तो यह सोचकर दूसरा सह लेता है कि होली की खाप ठहरी . सब चलता है . मजाक किससे हो जाय तय नहीं . हमारे यहां वर्षों से शेरराम ढोली आते हैं . मजाक उनसे भी हो जाती है . अगर कहीं चाय पी रहे हों तो शेरराम तुरन्त मजाक कर देगा . – पौणज्यू लागि द्यूल हां .. पौणज्यू जवाब में कहेंगे – लागि दि कि हैरौ छौड हालि द्यूल . होय भै सब चलौं .
मजाक देवर भाभी के बीच भी खूब होती है . महिलाओं की होली अलग होती है . अगर होली भरनौला की तरफ हो तो महिलाओं की पारगांव की तरफ होगी . देवर भाभियों में मजाक खूब होगी पर उसमें गरिमा का पूरा खयाल रखा जाता है . राह चलते टकरा गये तो मेरे जैसा कोई खाप कुखाप कहकर आगे निकल जाएगा वहां से भी भरपूर जवाब आएगा पर शारीरिक स्पर्श अश्लीलता आदि से अभी भी हमारा समाज कोसों दूर है . अगर कभी किसी भाभी के साथ उनकी सास यानि हम लोंगों की काकी हो तो फिर मजाक भी नहीं . कोइ भी अकेली भाभियां कहीं गांव में आये जाये कोई देवर लोग बदतमीजी कतई नहीं करेंगे . पूरा मजाक ठिठोली एक सीमा में होता है .
( अगले भाग में कुछ प्रचलित होली की पक्तियां और होलियारों के बारे में )

(डिस्क्लेमर :सभी फोटो फेसबुक और गूगल से ली गयी हैं,असली फोटोग्राफर का नाम पता न होने के कारण साभार फेसबुक और गूगल )

होली में और क्या क्या होता है ये जान्ने के लिए यहाँ पढ़ें 

होली पर विशेष-खन्तोली की होली -2

 

 

 

 

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