यंगिस्तान

साबुन से सापुंण तक का इतिहास

अगस्त 7, 2018 Girish Lohni

सत्तर के दशक तक भारत में साबुन नाम की बला सामान्य व्यक्ति के जीवन में लगभग नहीं के बराबर हुआ करती थी. हाँ पानी में गुलाब के पत्तों से लेकर नीम के पत्तों का प्रयोग छुपते-छुपाते यदा-कदा विशेष अवसरों पर जरुर   किया जाता था लेकिन शरीर में घिसने के लिये साबुन नाम के किसी पदार्थ का प्रचलन नहीं था. शादी ब्याह के अवसरों पर हल्दी का उपयोग सदियों पुराना है.

वैसे एक दिलचस्प बात यह है कि हमारे देश में बना पहला साबुन किसी विदेशी कंपनी का नहीं बल्कि भारतीय कंपनी का है. मैसूर रियासत के रजवाड़ों की कंपनी मैसूर सैंडल सोप भारत का पहला साबुन है. युवा कैमिस्ट गरलपुरी शास्त्री ने इंग्लैंड से साबुन बनाने की तकनीक से भारत में ऐसा साबुन बनाया कि ब्रिटेन के शाही घरानों में भी यही साबुन चलने लगा. इस कंपनी के साबुन आज भी दक्षिण भारत में मिल जायेंगे. 

वैसे साबुन के इतिहास संबंधित विज्ञापन में अगर आपकी यादों में कोई चित्र होगा वो शायद ऐश्वर्या राय का हो. लेकिन बादाम खाने वालों को शर्मिला टैगोर,  परवीन बाबी के विज्ञापन भी याद होंगे. वैसे भारत में 1941 का लीला चिटसन का फीचर किया विज्ञापन शायद ही किसी को याद हो. बालीवुड की मशहूर अदाकारा लीला चिटसिन पहली भारतीय महिला थी जिसने लक्स साबुन का विज्ञापन किया था. लीला चिटसन के विज्ञापन में होने के कारण भारत में लक्स की वृध्दि में बेतहासा वृध्दि हुई थी. लीला चिटसन के बाद लक्स के विज्ञापन में शर्मिला टैगोर,  परवीन बाबी, हेमा मालिनी, जैसी अनेक स्टार अभिनेत्री देखी गयी. वैसे खूबसूरती का पर्याय  बन चुका लक्स साबुन लम्बे समय तक टायलेट सोप नाम से ही आता था.



साबुन के विज्ञापन में आपको सबसे अधिक रोमांचित करने वाली तस्वीर लगेगी गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की. रवींद्र नाथ टैगोर ने एकबार गोदरेज वेजिटेबल सोप का विज्ञापन किया. इस विज्ञापन में टैगोर का अंग्रेजी में छपा एक वाक्य है कि मुझे गोदरेज साबुन जितने अच्छे किसी विदेशी साबुन की जानकारी नहीं है.


साबुन के विज्ञापनों को ही अगर खंगाला जाये तो पियर्स साबुन का विज्ञापन बेहद दिलचस्प है. इसके विज्ञापन में सरस्वती को कमल के फूल में बैठा दिखाया गया है.  पियर्स के विज्ञापन निर्माताओं ने कलात्मकता का परिचय देते हुए पियर्स की तुलना सीधा लक्ष्मी के कमल से कर दी है.
 

जाहिर सी बात है जब भारत में नहीं आया तो साबुन का पहाड़ चढ़ पाना और ही मुश्किल है. पहाड़ के जीवन की कठोरता ही है कि पहाड़ चढ़ते-चढ़ते साबुन का सापुण हो गया.  आम भाषा में साबुन नाम से प्रचलित हमारे यहॉ सापुण कहलाता है. सापुण के प्रयोग से पहले पहाड़ों में उबटन का प्रयोग हाथ मुह धोने के लिये किया जाता था. शरीर रगड़ने के लिये चिकने पत्थरों का प्रयोग भी किया जाता था. कपड़े धोने के लिये रिठे और राख को पानी में उबाल कर बनाये मिश्रण को प्रयोग में लाया जाता था. सिर धोने के लिये रिठे के छिलकों का प्रयोग किया जाता था. मने रिठे का छिलका ही आधुनिक शैम्पू है.


पहाड़ों में पहला साबुन सनलाइट साबुन था. सफेद और नीले कागज में लिपटा बादामी रंग का आदमी का सार फोड़ने की क्षमता रखने वाला टू इन वन सनलाइट साबुन. उससे आप नहा भी सकते थे और उसी से कपड़े धो सकते थे. फिर आया सबका हीरो लाइफ़बाय. लाल गत्ते में लिपटा लाइफबाय तंदरुस्ती के दम पर आया. सनलाइट का ही सनलाइट फ्लक्स नाम का साबुन बाद में लक्स हुआ. पहाड़ों में लक्स का प्रवेश साबुन के इतिहास में एक क्रांतिकारी घटना थी. इसके बाद फरिश्ता, निरमा, घडी जैसे साबुन कपडे धोने वाले साबुन घोषित कर दिये गये. सिंथौल लाइफबाय और लक्स ने नहाने वाले साबुन की. डिटजेंट पाउडर में रिन पहला डिटर्जेंट था जिसने पहाड़ों में कदम रखा मजे की आत यह है कि अपने प्रारंभिक काल से ही रिन सर्फ के नाम से बिकता है. जैसे गुटखा मने दिलबाग, दूध पावडर मने एवरिडे, चायपत्ति मतलब ताजा, टायलेट क्लीनर मने हार्पिक, टूथपेस्ट मने कालेगेट, पाउडर मने पौंडस वैसे डिटरजैंट मने सर्फ.

दरसल पूरे भारत की तरह पहाड़ो में भी साबुन को विलासिता का सूचक माना जाता था. सामान्य व्यक्ति के द्वारा सापुन का प्रयोग करने पर उसका मजाक उड़ाया जाता था. कमाल इस बात का है कि कभी प्रयोग में ही ना आने वाली एक वस्तु आज हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.

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