यंगिस्तान

हिंदी Medium- अपनी सी कहानी

मई 31, 2017 Girish Lohni

अगर आप अपने छोटे से गांव से किसी भी छोटे या बड़े शहर के नामी स्कूल में दाखिला लेकर पढ़े हैं तो इन दिनों आपके लिये सिनेमा हॉल में एक बढ़िया फिल्म लगी है नाम है-हिंदी मीडियम. कल्पना के धरातल पर यथार्थ की कच्ची कलम से लिखी फिल्म हिंदी मीडियम के कई हिस्से दिल को छू लेने वाले हैं. फिल्म में इन्टरव्यू वाले टंटे को छोड़ दे तो एकबारगी आपको लगेगा कि किसी ने आपके बचपन का फ्लैश बैक आपको एक नई लोकेसन में दिखा दिया हो.

फिल्म के शुरुआती हिस्से में डू नॉट टॉक  इन हिंदी वाला एक दृश्य आपको अपने बचपन में ले जायेगा जहॉ हमें पहाड़ी में बात करने की मनाही होती थी. हमारी पहाड़ी और हिंदी की जंग को निर्देशक ने हिंदी और अंग्रेजी की जंग में बुना है. बात-बात पर लो-कान्फीडेंस वाली धमकी आपको वो पल महसूस करायेगी जब आप पहाड़ी टोन के कारण कक्षा में सवाल पुछनने से स्वयं को रोक देते थे. कैसे एक भाषा गांव के स्कूल के सबसे होनहार बच्चे को नये स्कूल का सबसे कमजोर बच्चा बना देती है हमसे बेहतर कौन जान सकता है.

दिल्ली के चांदनी चौक से वसंत विहार पहुंचे जोड़े की इस कहानी में बेरीनाग से पिथौरागढ़ या पौढ़ी से देहरादून या टिहरी से देहरादून या दन्या से अल्मोड़ा आये अपने मॉ-बाप की झलक देख सकते हैं. वही बच्चों के लिये कुछ भी कर गुजरने वाली जिद्द. फिल्म में मॉ जैसे सूट से जींस में अवतार लेती हैं हमारी मॉ ने धोती से साड़ी या सूट में अवतार लिया था.धूल खा चुकी हमेशा चमक के साथ खुलने वाली इंग्लिश स्पोकन रेपिटेक्स की रटन पर पिताजी की मेहनत आपको फिल्म के और करीब ले जाती है.

फिल्म भले ही एक नाटकीय यूटोपीयाई अंदाज में खत्म हो लेकिन फिल्म का अंत होने तक आप अंदर तक चुभने वाले दर्द को महसूस कर सकते हैं क्योंकि आप ये सब कुछ झेल चुके हैं. इस दर्द की खास बात ये है कि आप थियेटर के बाहर कदम रखते ही फेसबूक पर अ मस्ट वॉच मूवी हिंदी मीडियम का स्टेटस सजाकर अपने बच्चे को बेबी डोन्ट डू दिस का नारा लगा किनारे करा लेते हैं.

कुल मिलाकर अपने यो मैन वाले चोले को उतार कुछ पलों के लिये उन लम्हों में खो जाने के लिये जिनसे जिंदगी में हमने सबसे ज्यादा सीख ली है, हिंदी मीडियम फिल्म एक अच्छा माध्यम है. बांकि तो यो मैन वाली जिंदगी को हमने पहले ही खून में उतार रखा है.

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