यंगिस्तान

गाँव का पियार – इक प्रेम पत्र

अक्टूबर 16, 2018 ओये बांगड़ू

वैसे तो पियार (प्यार) का कोन्हों रंग नहीं होता लेकिन इह प्रेम पत्र कुछ ख़ास है जेकर ऊपर सादगी का रंग सजा है तो इह गाँव के पियार का खुबसूरत इजहार लिखे है बिहार के सीवान जिले के राजीव कुमार भारती  जो आजकल दिल वालों की दिल्ली में पत्रकारिता की पढाई कर रहे हैं.

 माई डियर सुगनियाँ 

तोहार कोमल आऊर मोलायम चरण छुकर….

प्रणाम,

हम तोहार करेजा के टुकड़ा अँखियन के चैन बोल रहें हैं. तोहरा माथे पर ललका लागल ऊ बिंदिया को चूम कर पियार दे रहें हैं .बाकी तोहार जवन छज्जन चाचा के खोंपी के आड़ा से लुका (छुपकर) कर हवा वाला चुम्मा फेंकत रही उसका इंतजार हैं.

हम बहुते बड़का शहर दिल्ली आरे, हाँ ऊहे-ऊहे भारत के राजधनिया वाला दिल्ली, हमको हिंया आए 12-15 दिन होई गवा तोहार कवनो ख़बर नाहि मिली तो जियरा कुहुक रहा हैं.  मन मे कईगो बिना मतलब वाला ख्याल ज़बरन का घुसिया रहा हैं. जईसे लता मंगेशकर मो. रफ़ी के गाने में नेहा कक्कड़ आऊर रईपर हनी सिंहवा समा कर ढुक जाता है. तोहरे चिन्ता में सुख कर आम का आँठी (गुठली) भईल जा रहें हैं.

पर तुम हमरा चिन्ता तनिकों मत करना बस आपन धियान रखना. हमको मालूम हैं तुम हमारे हिंया आने से बहुते कष्ट में हो. जहिआ से हम तुम से दूर आए है, तुम्हारे कलेजे मे प्रतिदिन जुदाई की पीड़ा बाढ़ जईसन उमड़ कर तुमको बिरहिन बनाए हुए हैं. तुम रोज शाम को रेडियो के चैनल विविध भारती पर जाते हो परदेश पिया जाते ही खत लिखना वाला गाना सुनने के लिए फरमाईस भेजती हो आऊर हमरा नाम लिख कर डेडीकेट करती हो.

जवन सूरूज (सूर्य देव)  तोहार कन्याकुमारी नियन सुघड़ (सुंदर) रूप देख कर उगत रहे अब तोहार रेगिस्तान के बंजर रेत जईसन सूरतिया देखकर बादल में हीं लुकाईल रहिते है.

तोहार मैना जईसन ऊ खील-खलाती हँसी जिसको सुनकर पाड़े बाबा के महुआ के पेड़ पर कोयल बोलने लगती थी ऊ अब सोनपुर के मेला मे कहीं हेरा गई हैं.

अरे ! हमार सोन चिरईया हम हिंया हैं तो का हुआ तुमको रोज ईयाद करतें हैं. आऊर अढ़ाई रूपया वाला पोस्ट कार्ड पर प्रेम संदेश तो भेजबे करेंगे 14×7 वाला साईज काफी छोट पड़ जाता हैं हमारा हाल-ए-दिल बड़का वाला पोस्ट कार्ड एहिजा मिलिए नाही रहा हैं .

हमको ईहो मालूम हैं तुम डाकियाँ काका को रोज रोक कर हमारे पत्र का आश लगाए रहती हो आउर ऊ बेचारे रोज एकही जवाब देते है बिटीयाँ आजों नाही है कवनो संदेशा तोहरा नाम का तब तुम्हारा मुँह आलू का चोखा जईसन हो जाता है .

खै़र….. 

ई बताओ की हुंहा का सब का क्या हाल हैं ! रामखेलावन की ऊ करियकी भैंसीया जवन 8-9 महीना का पेट से रही. इस बार भूअर अंग्रेज पाड़ी (बछड़ा भैंस) दी की नाही ? बेचारा बड़ा भारा भाखे हैं (मन्नत मांगे हैं ) वईसें हीं पहिले तीन गो पाड़ा (बछड़ा भैंसा) देकर गाँव का जनसंख्या बहुते बढ़ा चुकी हैं. सलीम भाई की उजरकी करियकी भूअरकी सब बकरीयाँ ठीक से हैं न ? ऊ चराने ले जाते हैं की नही नदी के ओह पार ? ऐह बार बक़रीद पर जरूर एगो दुगो का टिकट कटिए गया होगा जन्नत का? इस बार ऊ लोग ईद के दिने बिरयानी का टीपिन भेजा था कि नही ?

ऊ भी का दिन था न हमार सोनपापड़ी ईस्कूल का जब हम घोड़ी बेंच कर सुतल रहते थे. तुम आकर हमारे घर माई से कहती थी की हस्तिनापुर के महाराजा तो अभी तक सोये ही होंगे ? पढ़ने तो दूर झाड़ा फिरने (फ्रेश होने ) भी नही जाए . ई कुम्भकरण के बड़की नानी के एकलौते राजकुमार तब माई की भन्नाहट वाली 10-20 लज़ीज गारी खाकर हमारी भोर की नींद शताब्दी से भी तेजी से दऊड़ कर भागती थी. तब जाकर हम लाट साहेब नित्य क्रिया से निपट कर ईस्कूल के लिए तोहार बाट खदेरन के घर के पिछे वाला झुलिनी पुल पर निहारते थे. जब तुम ईस्कुल के ड्रेस मे आती हुई लऊकती थी. तब जाके जियरा में ठंडक पड़ती रही . फिर बतियाते-बतियाते जब तक ईस्कूल पहुँचते थे .

हम लोग तब तक घंटी बज चूकी होती प्रार्थना गायत्री मंत्र सब समाप्त हो गया होता था. फिर माहटरसाहेब और गुरू जी की रोज वाली डाँट हमको मुर्गा बना कर 11 ठो ईंटा पिठ पर रखवा देते आऊर तुमसे पूरे ईस्कूल में झाडु लगवाए देते . हमारे न किये हुए गृह कार्य के लिए तुम अपना कॉपी देकर हमको बचा लेती खुद इतना मार खाती थी की हाथ में मेंहदी लगी हुई वईसे लाल हो जाया करती थी . ई पियार ही तो था तोहार पर हम ऐत्ते बड़के बकलोल बुड़बक गंवार थे की बहुत दिन बाद समझें ई बात .

अबहीं आम का मौसम चल रहा हैं तुम खुबे आम खा रही होगी . ईयाद हैं एह सीजन में हम दुनु तोंता मैना की तरह लोगो की बगईचे (गॉर्डन) में जाकर चोरा के आम खाते थे. एक बार पकड़ाए भी थे ईयाद होखबें करेगा ! पंडित जी

केतना बड़हन सजा दिए बाँध दिए दुन्नु लोग को एक साथ ओही आम के पेड़ मे जिस पर से तोड़े रहे हम लोग. एतना कस कर बाँधे रहे की हम दोनो एक होई गए रहें .

तब्बे से हमको तुम से पियार हो गया था. तोहर ओढ़नी बिछा कर ओही पर केतना चैन सकून के नींद मे सुत जाते थे . हम तुम जो हमारा सर अपनी गोद मे रख कर बालों को हौले-हौले जब सहलाती थी “कसम पहाड़ी वाले के ब्रह्म बाबा” की बुझाता था कायनात की सारी जन्नत तुम्हरे पास ही हैं .

1 thought on “गाँव का पियार – इक प्रेम पत्र”

  1. गजब लिखते हो भिया हम त इहे सलाह देव की मीडियई छोड़ी आ राइटरी में हाथ लगाई एकदम्मे धुरा उड़ा देम रउआ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *