गंभीर अड्डा

संस्मरण-गाँव के बहाने पलायन का दर्द

जनवरी 21, 2019 ओये बांगड़ू

गाँव,जो अपने आप मे हमारे देश की संस्कृति को सहेजने और संरक्षित रखने के सच्चे वाहक हैं .उनके बारे मे लिखना बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी का शरीर देखकर उसकी आत्मा को छूने की कोशिश करना .ऐसे ही अपने ही गाँव की कहानी लिख रहा हूँ.जिसे मैंने सुना नहीं. जिया है .

डाक्टर ईशान पुरोहित

लेखक डाक्टर इशान पुरोहित

काफी वक़्त के बाद गाँव जाना हुआ (मेरे लिए 6 महीने का समय काफी वक़्त लगता है),तो इस बात ये सोचकर आया की अपना संस्मरण शब्दों मे व्यक्त करूंगा,और अपने दोस्तों के साथ बांटूंगा भी.आज से 10 साल पहले भी गाँव जाने मे जितना वक़्त और मेहनत लगती थी आज भी तकरीबन उतना ही वक़्त लगता है.दिल्ली से बदरीनाथ तक ये सड़क नेशनल हाईवे है.हाँ उन्ही बदहाल सड़कों पर गाड़ियां जरूर आ गयीं हैं.अगर आप भाग्यशाली हैं और आपको GMO की किसी गाडी की खिड़की वाली सीट पर बैठने का मौक़ा नसीब हुवा हो.तो आप हरिद्वार या ऋषिकेश से पहाड़ के सफ़र का आनंद ले सकते हैं.उंचाई के साथ साथ आपको प्रकृति की अलग सी खूबसूरती का अहसास होगा.चाहे बादलों की ओट से छंटने की कोसिस करते जंगल या नदी के किनारे-किनारे सुरमई सा सफ़र,बस देखिये,महसूस कीजिये आप आत्म संतुष्ट होंगे,बिलकुल ऐसे जैसे गूंगा गुड की मिठास बयान नहीं कर सकता.

रुद्रप्रयाग जिले से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर,मेरा गाँवपाली (जैखंडा) रुद्रप्रयाग जनपद के चोपड़ा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है,जो सिर्फ अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित ही नहीं रखे हुए है बल्कि वक़्त के साथ साथ इसने विकास की हर तस्वीर तो आत्मसात भी किया है,चोपड़ा क्षेत्र अपनी भोगोलिक स्थिति के कारण एक सुरक्षित क्षेत्र है जहाँ कुदरत ने यहाँ रहने वालों को सब कुछ बख्शा है,जंगल हों,पानी हो,खेत हों या मौसम.आज तक यहाँ बादल फटने या अतिवृष्टि के बारे मे नहीं सुना,क्षेत्र को सबसे बड़ा वरदान है कुदरत का इसके सम्मुख “हरियाली देवी” पर्वत.जो मेरे गाँव के सामने से एक धनुष की तरह प्रतीत होता है,जिसको “अलकनंदा” नदी धनुष की प्रत्यंचा की तरह बांधती है.बेहद खूबसूरत,सम्मोहक.

वैसे रुद्रप्रयाग से चोपड़ा-कुरझन की सदर तो बहुत पहले बन गयी थी.जो अब कांडई गाँव तक चली गयी है,कांडई गाँव के ही अमर शहीद सुनील कांडपाल के नाम पर ही कारगिल युद्ध के बाद इस मार्ग का नाम शहीद सुनील कांडपाल मार्ग घोषित किया गया था,और एक बोर्ड भी लगाया गया था .जो आज कहीं नज़र नहीं आता.लेकिन सुनील का नाम बहुत प्रासंगिक बना देता है इस क्षेत्र को, सुना था की सुनील को करीब 28 गोलियां लगी थी ,लड़ाई में जिसकी अदम्य वीरता के लिए उसको पदक मिला था.हाईवे पर सुनील के नाम से एक पेट्रोल पम्प भी है.

रुद्रप्रयाग जिले के इस क्षेत्र  को तल्ला नागपुर कहते हैं ,जिसमें पुरोहित समुदाय के चार मुख्य गाँव हैं,पाली,सनगु,क्वीली और कुरझन,मेरा गाँव सिर्फ यहाँ रहने वाले 30-35″पुरोहित” परिवारों से नहीं बनता,ये बनता है चार-धार,मुल्लीबोण और पंजेराबोण के जंगलों से,मल्ली पंजेरा और मुल्ली पंजेरा के प्राकृतिक धारों से,हरियाली देवी के सम्मुख पहाड़ से,घाटी मे अलकनंदा नदी से,अमडाली,राडढुंगा, मवाण, खिरना-खोलि और अम्मो-गदरा जैसे स्थापित मूल चिह्नों से,खिलोटी बेंड के खेल के मैदान से,आयर सदाबहार मुल्ली बोण के पटले से जो आज भी एकांतवास मे बैठने का सबसे प्रिय स्थान है. गाँव मे मूल रूप से तीन थान हैं,नंदादेवी का,भुवनेश्वरी का,और भूम्याल (भेल्द्यो) का,और एक “हनुमान जी का खदरा” भी,बरसात के मौसम मे हर परिवार कम से कम तीन बार सारे थानों पर दिया बत्ती जरूर करता है,नाग, नरसिंह और सिद्ध्वा देवताओं को ईस्ट देवता माना जाता है,नंदा देवी ईस्ट देवी है.

हर बारह वर्ष मे पाली और सनगु गाँव, पाली मे मिलकर नंदा देवी के प्रसिद्द त्यौहार”पात बीड़ा” का आयोजन करते हैं.वहीँ इसी तरह का आयोजन हर 12 साल बाद क्वीली और कुरझन गाँव मिलकर गाँव क्वीली मे यह आयोजन करते हैं.उसी प्रकार गाँव मे समय-समय पर”नाग, नरसिंह” नचाने का रिवाज भी है जो पंचायती रूप मे होता है.हर्ष हुवा देखकर की आजकल हर महीने गाँव मे किसी न किसी अवसर पर महिलायें कीर्तन और “अखंड रामायण” का पाठ करवा रही हैं.

ज़िन्दगी आज भी इतनी आसान नहीं है इस क्षेत्र  मे .अभी कुछ महीने पहले ही मेरे गृह जिले मे उखीमठ मे बादल फटने से बहुत तबाही मची थी .मेरे गाँव मे रहने के दौरान ही श्रीकोट मे बाघ ने एक आठ साल के बच्चे को अपना शिकार  बनाया,लेकिन तमाम मुश्किलों के बाद भी लोग जानते हैं .पहाड़ का पहाड़ की तरह ही दुष्कर होता है.

गाँव की अपनी यात्रा का वर्णन मे पहले लेख मे कर चुका हूँ .हर बार मैं गाँव मे अपने बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने जरूर जाता हूँ.ये सोचकर की अगली बार किसका साया गाँव के ऊपर रहे न रहे .पिछली ‘पात बीड़ा’ के बाद अभी तक तीन बुजुर्गों से प्रयाण कर किया है.मुल्ली खोला की दादी से सुना कि, बिचली खोला की दादी बहुत हल्ला करती है,मिलने गया,दादी जोर-जोर से दाल कूट रही थी, बीच बीच मे अपने आप से भी बातें कर रही थी,शायद इस खामोशी को स्वीकार नहीं रही थी जो बेटों और नाती पोतों के बाहर जाने से पैसा हुई है,या फिर अपने आप को ये होसला देने के लिए सुबह से रात तक काम मे व्यस्त रहती है.कि वो अभी हारी नहीं है,पधान खोला की दादी अपनी बहू पर नाराज है,बच्चों को अंग्रेजी स्कूल मे पढ़ाने की जिद मे वो भी श्रीनगर चली गयीं,जबकि चोपड़ा मे ही भानुप्रकाश भेजी ने अंग्रेजी स्कूल खोल दिया है.जो बहुत अच्छा चल रहा है.

ऐसा नहीं है कि इस छेत्र मे पलायन वर्तमान की ही स्थिति हो,पहले पलायन होता था आजीविका के लिए.लोग बाहर जाते थे,और शहरों मे छोटी मोटी नौकरी कर कुछ कमा लेते थे,सातवीं आठवीं कक्षा मे समाज शास्त्र मे ये सवाल हमसे भी पुछा जाता था की ‘प्रतिभा पलायन’ क्या है.इस पर निबन्ध लिखिए ,जीवन यापन के लिए जरूरतें इतनी ज्यादा नहीं होती थीं जितनी आजकल हैं,बाकी जरूरतें खेती से ही पूरी होती थीं.हमारे गाँव मै तकरीबन 90 प्रतिशत से ज्यादा जमीन असिंचित है .इसका मतलब खेती के लिए सिर्फ और सिर्फ आसमान पर निर्भर रहना पड़ता है.यकीन मानिए आज भी (आजादी के 60 साल से अधिक बीत जाने के बाद भी) यही आलम है.हमारे गाँव की औरतें इस खेती को “बरखा की बाडी” भी संबोधित करती हैं.गाँव के लोग पहले बम्बई मे ज्यादा गए,और काफी हद तक वहाँ बस भी गए ,लेकिन विकास के साथ साथ जैसे दूरियां कम होती गयीं.पलायन नजदीकी शहरों तक सिमटता चला गया.आजकल क्षेत्र के लोग मुंबई नहीं दिल्ली का रुख ज्यादा करते हैं .क्षेत्र  के लोगों के लिए एक और आसान विकल्प फौज मे भारती होना भी था ,जो कि आज तक बदस्तूर जारी है.इसे हिमालयी भोगोलिक परिस्थिति कहिये या प्रकृति का वरदान कि छोटे से राज्य उत्तराखंड मे दो रेजिमेंट्स हैं .गढ़वाल रायफल्स और कुमाऊं रेजिमेंट,एक ज़माना था जब औसतन हर परिवार से एक फौजी जरूर होता था गाँव मे,मेरे गाँव मे भी बहुत सारे फ़ौजी हैं.

वक़्त के साथ-साथ लोगों की आर्थिक स्थिति तो नहीं बदली,लेकिन एक बात लोगों को समझ आ गयी कि अगर आगे बढना है तो शिक्षा को अपनाना होगा और लोगों ने ये काम शुरू किया,मेरे गाँव “पाली” को लोग “मास्टरों की पाली” से भी संबोधित करते हैं .क्योंकि इस क्षेत्र  मे शिक्षा के क्षेत्र  मे यहाँ के लोगों ने बहुत कार्य किया ,स्वर्गीय श्री बच्चीराम पुरोहित जी, स्वर्गीय श्री माया राम पुरोहित जी, स्वर्गीय श्री भज राम पुरोहित जी सबसे पुरानी पीढी के प्रतिनिधि थे जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा मे अध्यापन किया.इसी तर्ज पर क्षेत्र  के अन्य लोगों ने भी अध्यापन को अपनाया ,बाद की पीढी मे मेरे गाँव से बहुत सारे लोग शिक्षक बने,जिनमे मेरे पिताजी श्री शिव प्रसाद पुरोहित ने तो लगभग आजीवन इंटर कोलेज चोपड़ा मे ही शिक्षण किया,वो यही से सन 2005 मे प्रधानाचार्य सेवानिवृत्त हुए.मेरे चाचा जी डा के सी पुरोहित जो गढ़वाल विश्वविध्यालय मे प्रोफेसर हैं और दुनिया मे जाने माने भूगोलविद हैं.

अब पलायन शुरू  हुआ उच्च शिक्षा के लिए.क्षेत्र  मे कोई यूनिवर्सिटी न होने के कारण पहले लोग उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते थे,गरीबी थी,दिशा दर्शाने वाला कोई प्रतिनिधि नहीं था.इसलिए ये कुछ समय तक लोगों के विकास यात्रा यहीं तक सिमट कर रह गयी,अब लोग शिक्षित होकर सरकारी नौकरियां पाने लगे थे .लेकिन नौकरी के साथ-साथ गाँव किसी ने नहीं छोड़ा था.गढ़वाल विश्वविध्यालय बनने के बाद क्षेत्र  के युवा सपनो को कुछ और उड़ान मिली.जो लोग आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा से वंचित थे वो अब आसानी से पढाई जारी रख सकते थे.इसका असर ये हुवा की आसमान बड़ा होता चला गया.जो पलायन सिर्फ शिक्षा के लिए था वो अब रोजगार के लिए भी होने लगा जो कि पहाड़ मे उपलब्ध नहीं था.

पहले लोगों ने सपने देखना शुरू किया.फिर उनको पूरा करना और इस बहाव मे जरूरतें बढ़तीं गयीं. लोगों ने पाया की बेहतर शिक्षा गाँव मे नहीं बल्कि शहरों मे है (जो कि वर्तमान मे भी एक कटु सत्य है)फिर धीरे-धीरे लोगों ने अपनी भविष्य की योजनायें इस तरह से बनानी शुरू कर दीं की आने वाले कल मे शिक्षा के लिए भटकाव न सहना पड़े .श्रीनगर बहुत लम्बे समय तक हमारे गाँव ही नहीं बल्कि क्षेत्र  के लिए उच्च शिक्षा का केंद्र रहा.और वर्तमान मे तो गढ़वाल विश्वविध्यालय को केंद्रीय विश्वविध्यालय का दर्जा हासिल हो गया है.लोगों ने पढ़ना जारी रखा तो विकल्प भी खुलने लगे. फौज और मास्टरी से आगे भी लोग सोचने लगे.

चोपड़ा गाँव के “शास्त्री जी” के जिक्र के बिना इस क्षेत्र  पर कोई भी लेख या शोध अधूरा है .मुझे भी शास्त्री जी का मूल नाम ज्ञात नहीं है.लेकिन उनका जिक्र उनके नाम से ज्यादा प्रासंगिक है.शास्त्री जी मूल रूप से प्राथमिक अध्यापक थे.जिनके 6 बच्चे उस जमाने मे इंजिनियर बने थे.एक बच्चे ने तो 60 -70 के दशक मे आई आई टी (IIT Delhi) से ऍम टेक किया था.

वैसे इस क्षेत्र  ने देश को प्रशाशनिक अधिकारी भी दिए.लेकिन रास्ट्रीय और अंतररास्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉ डी आर पुरोहित के जिक्र के बिना यह संस्मरण अधूरा रह जाएगा.जिन्होंने यही के इंटर कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की और गढ़वाल यूनिवर्सिटी मे अंग्रेजी विषय मे प्रोफेसर का पद प्राप्त किया.लेकिन उनका शोध कार्य गढ़वाल की संस्कृति के क्षेत्र  मे है जहाँ उन्होंने गढ़वाल के बाद्य यंत्र “ढोल” पर उच्च कोटि का शोध कार्य किया और गढ़वाल की संस्कृति को देश विदेश मे मुकम्मल पहचान दिलवाई. उनके द्वारा स्थापित सांस्कृतिक ग्रुप द्वारा वर्तमान मे ‘चक्रव्यूह’ नाटक का मंचन देश के कई हिस्सों मे सफलतापूर्वक किया जा चूका है.

नोट-लेखक ने तीन साल पहले संस्मरण लिखा था