बांगड़ूनामा

गाँव का ठैरा

मई 7, 2017 ओये बांगड़ू

एक तुकबन्दी! इस तुकबन्दी के सभी पात्र और खुद तुकबन्दी करने वाला भी काल्पनिक है यह कहीं दूसरे ग्रह की बात है अपने उत्तराखंड की नहीं उत्तराखंड से इन घटनाओं का संयोग महज इत्तफाक होगा तो महाराज सुनो !

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

ओल्ले घर में हाथ बना है
पल्ले घर नेकर और डंडा
मल्ले घर में हाथी आया
तल्ले घर कुर्सी का झण्डा

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

प्रसाशन दावत पर अटका
मतदाता रावत पर अटका
छप्पन लेकर सुस्त पड़े हैं
कौन लगाए बिजली झटका

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

अंग्रेजी गानों में करते
पधान जी भी हिप हॉप
जीलाधीस कुर्सी में बैठे
चूस रहे हैं लालीपॉप

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

शराब माफिया चंवर ढुलाए
खनन माफिया आरत गाए
दिल्ली से दिल लगी राज की
जनता से ताली पिटवाए

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

चीनी कटक हुआ सब महंगा
महंगी हो गयी गेहूं रोटी
गाड़ी से हूटर हटवाकर
नोच रहे चुपके से बोटी

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

टूरिस्टों की टयामटुम
ठेकदार की रेलमपेल
बकरी सा जीवन है अपना
नेताओं की ठेलम ठेल

पहाड़ में रहता हूँ गाँव का ठैरा
दाज्यू मैं तो पीपल की छाँव सा ठैरा

डाक्टर अनिल कार्की की यह तुकबन्दी पहाड़ के उस भोले मानुष पर है जो शांत रहता है, कुछ कहता नहीं , विरोध कम ही करता है. लेकिन पता उसे सब रहता है. फिर भी वह कहता है पीपल की छाँव सा हूँ क्योंकि गाँव का हूँ.

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