बांगड़ूनामा

बापू – रामधारी सिंह दिनकर

अक्टूबर 2, 2018 ओये बांगड़ू

रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ ‘बापू’ की बातों की ही तरह बीतते वक़्त के साथ और प्रासंगिक होती जा रही हैं. दिनकर ने बापू और उनके किए बलिदानों को अपने शब्दों में खूबसूरती के साथ पिरोया. जून, 1947 में दिनकर का एक काव्य-संग्रह छपा. जिसमें सिर्फ   चार कविताएँ थी उस संग्रह का नाम था ‘बापू’. महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती पर पेश है ‘बापू’ संग्रह की ही एक कविता-

 

संसार पूजता जिन्हें तिलक, रोली, फूलों के हारों से,

मैं उन्हें पूजता आया हूँ बापू ! अब तक अंगारों से ।

अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पी कर जो आते हैं,

ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नई भर जाते हैं ।

 

उनका किरीट, जो कुहा-भंग करते प्रचण्ड हुंकारों से,

रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की धारों से ।

झेलते वह्नि के वारों को जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,

सहते हीं नहीं, दिया करते विष का प्रचंड विष से उत्तर ।

 

अंगार हार उनका, जिनकी सुन हाँक समय रुक जाता है,

आदेश जिधर का देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है ।

आते जो युग-युग में मिट्टी-का चमत्कार दिखलाने को,

ठोकने पीठ भूमण्डल की नभ-मंडल से टकराने को ।

 

अंगार हार उनका, जिनके आते ही कह उठता अम्बर,

‘हम स्ववश नहीं तबतक जब तक धरती पर जीवित है यह नर’ ।

अंगार हार उनका कि मृत्यु भी जिनकी आग उगलती है,

सदियों तक जिनकी सही हवा के वक्षस्थल पर जलती है ।

 

पर तू इन सबसे परे; देख तुझको अंगार लजाते हैं,

मेरे उद्वेलित-ज्वलित गीत सामने नहीं हो पाते हैं ।

 

 

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