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गैरसैंण-उत्तराखंड का रामू-काका

अप्रैल 2, 2018 Girish Lohni

उत्तराखंड का राजकोषीय घाटा इस वर्ष 2018-19 में 6710.25 करोड हो जायेगा. राजकोषीय घाटा किसी सरकार के व्यय का आय से अधिक होने को कहा जाता है. उत्तराखंड को अपना बजट बनाने के लिये हर साल पांच हजार करोड उधार लेना पडता है. राज्य सरकार की आय की निर्भरता पूर्ण रुप से शराब और खनन पर टिकी है. सरकार के कुल व्यय में 55 फीसदी व्यय वेतन पेशन व अनुदान में होता है. 11 फीसदी पिछले कर्ज के ब्याज के रुप में. जबकि केवल 13 प्रतिशत हिस्सा विकास कार्यों में खर्च होता है. उत्तराखंड लगभग हर बार अपने बजट का 40 प्रतिश्त हिस्सा उधारी से लाता है.

इतना सब होने के बावजूद राज्य सरकार ने बड़ी बेशर्मी से विधायको के वेतन में 120 प्रतिशत की वृद्धि कर दी. सवाल पूछने पर वित्त मंत्री का कुतर्क आता है हमने सचिवालय के चालकों का वेतन भी 3000 से 12000 कर दिया है. साहब आपका पुराना वेतन ही 45000 था. जो कि इन चालकों के वर्तमान वेतन से पहले ही तीन गुना अधिक है. ये सब हुआ राज्य की स्वप्न राजधानी गैर-सैंण में बनी राज्य विधान सभा में.

गैर-सैंण वर्तमान में उत्तराखंड राजनीति में वेश्या की भूमिका निभा रहा है. जिसके साथ पिछले सत्रह साल में कांग्रेस और भाजपा बारी-बारी से सोये हैं. जो सत्ता में होता है गैर-सैंण को अपनी रखेल बनाकर रखता है. उसके लिये खर्च करता है, उसे सँवारने की बात करता है, उसके साथ कभी-कभी रात गुजारता है लेकिन जब उसको स्थान देने की बात आती है तो पीछे हट जाता है और गैर-सैंण को भावनात्मक मुद्दा बता देता है.

आखिर क्यों जरुरी है गैर-सैंण ही उत्तराखंड की राजधानी? इस सवाल का उत्तर इस वर्ष 6 दिन तक चला उत्तराखंड का बजट सत्र है. भराणीसैंण में हुए इस विधानसभा सत्र में पहुचते-पहुचते कई विधायक उल्टी और चक्कर से पस्त हो गये. कई अधिकारी को जाने के दो दिन बाद दस्त लग गये. किसी को सर्दी तो किसी को बुखार आ गया. सुनने में तो यहां तक आया एक अफसर ने पूरे हफ्ते तक नहीं नहाया. ब्लोवर और मखमली कम्बल न मिलने पर भी कुछ विधायक लाल-पीले होते पाये गये.

जब तक ये विधायक अफसर पहाड में जायेंगे नहीं पहाड़ की समस्या समझेंगे कैसे? उत्तराखंड के लगभग अधिकांश विधायकों के पास मैदानी इलाकों में अपना मकान है. पलायन की समस्या इतनी गम्भीर है कि राज्य के मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री दोनों अपने-अपने गांव से सालों पहले पलायन कर चुक़े हैं. राज्य की सबसे बडी परेशानी यह है कि हमारा प्रतिनिधित्व करने वाला विधायक ही चुनाव जितने के बाद सबसे पहले पलायन करता है. फिर ये मुद्दा सुलझायेंगे कैसे?

नेता के इंतजार में स्थानीय कुर्सी फोटो साभार गूगल

उत्तराखंड के एक अलग राज्य के रुप में अस्तित्व में आने का कारण क्या था? उसकी भौगोलिक विशिष्टता. तो उसकी राजधानी कहां होनी चाहिये? जहां वह भौगोलिक विशिष्टता मौजूद हो. गैर-सैंण वो सभी भौगोलिक विशिष्टता रखता है जो कि उत्तराखंड का अन्य कोई पहाड़ी क्षेत्र. सरकार का यह कहना कि गैर-सैंण इसलिये राजधानी नहीं बनाई जा सकती क्योंकि उसके सामने पानी की समस्या है सड़क की समस्या है उसका जटिल मौसम समस्या है. तो महाराज यही तो पहाड का जीवन है.

इसके साथ ही तो हम जीते हैं. जिस आबो-हवा में आकर तुम छेरी जाते हो जिस आबो-हवा में आकर तुम्हारी नाक बहने लग जाती है, महाराज वहां हम हर दिन जीते हैं. और जब तक तुम हमारी तरह इसके आदी नहीं हो जाते तो किस बात के प्रतिनिधि हुए? तो महाराज समझिये ये केवल  भावनात्मक मुद्दा नहीं ना ही अव्यहारिक मुद्दा है. ये राज्य के विकास में पहला व्यहारिक फैसला होगा.

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