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फितरत के करिश्मे(चमचे भक्त एक ही हैं)

नवंबर 21, 2018 ओये बांगड़ू

इस लेख  के लेखक हमारे दाज्यू हैं,वो कहते हैं कि एसा लेख लिखने के बाद गाली खाने की सम्भावना में 50 % की वृद्धी देखी गयी है इसलिए इसमें नाम नी देने की हुई

30-32 साल के पहले जब से थोडा याद है हर जगह कांग्रेस जीतती थी .सही मायनो में शिक्षित व्यक्ति कांग्रेस को पसंद नहीं करता था तब भी कांग्रेस जीतती थी. कांग्रेस्सियो के घरों में इंद्रा नेहरु की फोटो लगी होती थी ये मुफ्तखोर जनता के पैसे योजनाओ से पोषित होते थे कांग्रेस के खिलाफ बोलने वालो को ये ‘हेय दृष्टि’ से देखते थे .
आज 30-32 साल बाद उनके घरो नयी पीढी ने नेहरु इंद्रा की तस्वीर निकाल दी है ये चुपके से सिफ्ट हो गये हैं अब उनमे अमित शाह मोदी की तस्वीर लगी है आज भी वो मुफ्तखोरी कर रहे हैं सरकारी योजनाओ का लाभ/ठेके शराब जल जमीन रेता की रॉयल्टी खा रहे हैं उनकी अहंकारी दबंग पैसे के रसूक वाली नयी पीढी को लोग वोट कर रहे हैं चुनाव जीत रहे हैं वोटर्स वही हैं इनका समर्थन न करने वाले अब देशद्रोही हैं

इनके लिए यतीम फिल्म का एक डायलोग याद आता है “डाकू का बेटा डाकू ”
और पब्लिक के लिए वही बचा खुचा पैसा लगता है उसी के सड़कें स्वाथ्य शिक्षा में काम होता है बस छींटें

चमचे जिनकी पहली पीढी इंद्रा नेहरु राजीव की चमचागिरी करते थे अब उनकी नयी पीढी मोदी की करते हैं फितरत है कि बदलती नहीं

 

भगत सिंह, आजाद, बोस , राजगुरु , सुखदेव , लोहिया , विपिन त्रिपाठी श्रीदेव सुमन निर्मल पंडित , जैसे नेता केवल राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि में प्रयोग के लिए बने हैं इनके सिद्धांत कहीं प्रयोग नहीं होते बस निहित स्वार्थ के लिए मात्र सिम्बल हैं ….ये सब होता रहेगा जब तक जनता जागेगी नहीं और पक्ष पार्टी को छोड़ व्यवस्था परिवर्तन की लडाई नहीं लडेगी

दाज्यू का लिखा

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