यंगिस्तान

फिल्म समीक्षा:बिजली गुल मीटर चालू

सितंबर 22, 2018 कमल पंत

एक फिल्म देखी ठैरी ‘बिजली गुल मीटर चालू’ गजब की फिल्म हुई हो.इतना ठैरा लगाया ठैरा कि जिन्दगी में मैंने नही लगाया अभी तक बल. बिजली के बिल पर बनाई ठैरी फिल्म. औसत से थोड़ा सा नीचे हुई,मतलब ये समझ लो कि पांच में 2 नम्बर पूरे के पूरे दिए ठैरे मैंने. क्यों दिए ये स्टोरी जानकार समझ जाओगे बल.

अब फिल्म में जो मुद्दा उठाया ठैरा वह ये हुआ कि बिजली का बिल वाला मुद्दा ,मतलब एक अच्छे से मुद्दे पर फिल्म बनाई ठैरी जिस पर हम लोगों ने अभी तक ध्यान नही दिया बल. अगर हम ध्यान दे देते तो ये फिल्म में थोड़ा सा खुद को जोड़ भी पाते. फिल्म के क्लाईमेक्स में शाहिद बिजली कम्पनी के मालिक से पूछता है कि जो झप झप वाली बत्ती जलती है उसका कितना बिल आता है तो मालिक कहता है 5 पैसा यानी 75 करोड़ बना ठैरा हिसाब टोटल. तब मुझे पता चला कि ओहो यहाँ तो जबर्दस्त घपलेबाजी है, इसलिए मुद्दा जो उठाया डाईरेक्टर ने उस पर पूरे 5 में चार देने वाला हुआ मैं नम्बर.

अब कहानी पर आता हूँ,तीन पहाडी नाम ठैरे त्रिपाठी नौटियाल और पन्त. पन्त हुए अपने शहीद कपूर नौटियाल हुई श्रद्धा कपूर और त्रिपाठी ठैरा अपना दिव्यांशु. तीनों बचपन के बेस्ट फरेंड ठैरे. पहले हाफ में तीनों जमकर हंगामे करने वाले हुए,मतलब इन तीनों को घुमाने के बहाने डाईरेक्टर ने जो पहाड़ की खूबसूरती दिखाई है उस पर पूरे नम्बर में आधे उसको,मतलब जितना दिखाया उतना फुल दिखाया,बड़ी वाली स्क्रीन में टिहरी कमाल दिख रहा था.खैर डाईरेक्टर साहब ने किस्सा सुनवाया है विकास और कल्याण के मुख (मुंह)से, दोनों ये पहाडी हैं,और पहाडी बस में सफ़र कर रहे हैं,तो पहाडी बस में सफ़र करते हुए विकास और कल्याण की असलियत सीन में बयां कर रहे हैं,मतलब सच कहता हूँ विकास और कल्याण को बस में पहाडी बसों में धक्के खाते घुमते देख मजा ही आ गया,निर्देशक साब ने सरकारों के कानों में मेसेज भेजा है कि देख लो ये है विकास. अब कहानी आगे बडती है जो हिस्सा मुझे पसंद नहीं आया,बिजली को लेकर उत्तराखंड को बड़ा पिछड़ा सा दिखा दिया है.मतलब पूरे भारत में बिजली की सबसे ज्यादा कमी कहीं दिखाई है तो वह उत्तराखंड में. हाँ उत्तराखंड में कमी है बिजली की,लेकिन इतनी भी नहीं कि आती कम जाती ज्यादा, उत्तराखंड के इण्डस्ट्रियल एरिया में है ही,खैर फिल्म है काल्पनिक ज्यादा होती है इसलिए इस हिस्से को माफ़ किया जा सकता है मगर संदेश तो गलत देती ही है.

लोग पूछते हैं पहाड़ों में मकान कैसे बनते हैं,इस फिल्म में देखना पंतजी त्रिपाठी जी और नौटियाल का मकान आपको पता चलेगा कि पहाड़ों में कैसे मकान होते हैं. खैर फिल्म आगे बडती है दुसरे हाफ के आने से पहले तीनो दोस्तों में मनमुटाव हो जाता है कि श्रधा कपूर किसकी गर्लफ्रेंड बनेगी,वो चुन लेती है दिव्यांशु को पंजी यानी त्रिपाठी जी रिसा(नाराज) जाते हैं. अब फिल्म का जरूरी हिस्सा बिजली का बिल आना.54 लाख का बिल आने से त्रिपाठी जी टूट जाते हैं और सुसाईड कर लेते हैं,उधर पंजी वापस आते हैं और दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए बिजली कम्पनी पर केस कर देते हैं और उसके बाद वही होता है जो हर फिल्म में होता है.

तो कुल मिलाकर यही थी फिल्म,कुछ हिस्सों में पांच में पांच देने का मन किया तो कुछ में पांच में जीरो . इसलिए पूरी फिल्म को एवरेज निकालकर दो दे दिए. बाकी एक्टिंग की चर्चा न ही करें तो बेहतर है,बोली को पकड़ा कम है उसकी मजाक ज्यादा बनाई है,पहाडी भेषभूसा पकड़ने के नाम पर सिर्फ स्वेटर पहन ली है,बाकी स्टाईल मुम्बई वाला ही है. लोकेशन अच्छी हैं,ख़ूबसूरती पहाड़ की दिखाई गयी है.दिव्यांशु ने फिल्म को सम्भाला है कहीं कहीं पर,शाहिद कपूर ने हैदर में जैसा कश्मीर को पकड़ा था वैसा इस फिल्म में उत्तराखंड को नहीं पकड पाए हैं ओवर एक्टिंग टाईप फील आ जाती है.श्रद्धा का ठैरा बल इतना ज्यादा बनावटी दिखा कि क्या कहूं.

देखना है तो पहाड़ की ख़ूबसूरती देखने के लिए जरूर देखना,भरपूर पहाड़ दिखाया गया है,ड्रोन वगेरह सबका इस्तेमाल बढ़िया किया गया है,पहाडी कस्बों शहरों पर फोकस किया है,सड़कें दिखाई हैं.

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