यंगिस्तान

फिल्म रिव्यू : बहन होगी तेरी!

जून 10, 2017 ओये बांगड़ू

‘सहर’ करीब दस साल से पढ़ने और लिखने के शौक को काम की तरह करते हैं। तीन साल से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं। खुद को अति-प्रैक्टिकल मानते हैं इसलिए इनकी कहानियों में भी प्रैक्टिकल ज्ञान साफ़ झलकता है। फ़िलहाल, प्राइवेट कंपनी में एडमिनिस्ट्रेटर हैं और अपने घर में राइटर। कहानियां लिखते हैं, गज़लें लिखते थे, अब इन दिनों उपन्यास लिख रहे हैं। आगे क्या लिखेंगे इसका क़तई कोई ज्ञान नहीं पर लिखते रहेंगे,इसका भरोसा है।

लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’

 

कहानी

शुरू होती है लखनऊ के मोहल्ले की दीवारों से चिपके लड़कों से, हर तरफ आतंक का सा माहौल है. सारे लड़के घबराए-घबराए घूम रहे हैं. जिनमे से एक है शिव यानी गट्टू (राजकुमार राव). इस मोहल्ले के लड़कों को ‘कंजरिंग’ से ज्यादा डर इस बात का लगता है कि कहीं मोहल्ले की कोई लड़की इन्हें भाई न बना दे. घंटाघर में छुपे इन लड़कों को खबर मिलती है कि इनका एक दोस्त और शहीद हो गया है जिसे बिन्नी अरोड़ा (श्रुति हसन) ने जबरदस्ती अपनी ही बहन से राखी बंधवा दी है. बिन्नी ही वो लड़की है जिसे गट्टू पंद्रह साल से प्यार करता है. पर छोटे मोहल्ले की तरह उसकी जुबान भी छोटी है इसलिए वो कभी उसे कह नहीं पाता. उस पर कोढ़ में खाज ये कि उसके पापा समेत सारा मोहल्ला उसे बिन्नी का भाई बनाए बैठा है. इसी गट्टू का वीरू जैसा एक दोस्त है भूरा (हैरी तंगिरी) जो गट्टू के लिए कुछ भी कर सकता है और बिन्नी को अपनी बहन मानता है. लेकिन कहानी में ऐसा ट्विस्ट, ऐसा कन्फ्यूजन, कि सब बिन्नी और भूरे का आपस में चक्कर समझ लेते हैं और गट्टू को बना देते हैं ‘उसका परमानेंट भाई’. एनआरआई राहुल (गौतम गुलाटी) से बिन्नी का रिश्ता तय कर दिया जाता है. अब गट्टू किस तरह अपनी मुहब्बत कामयाब करेगा ये फिल्म देख कर पता चलेगा.
फिल्म की कहानी विनीत व्यास ने लिखी है, उन्हें बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने गली मोहल्लों की इस समस्या को सामने लाने का साहस दिखाया.

एक्टिंग –

राजकुमार राव दबे कुचले शर्मीले स्वाभाव वाले रोल में स्वाभाविक लगे है. उन्होंने लखनऊ की तहज़ीब भरी भाषा बखूबी पकड़ी है. उनकी एक्टिंग पर कोई शक़ करना व्यर्थ है. श्रुति हसन मासूम गुड़िया सी लगी हैं (जैसी की वो हमेशा लगती हैं) उनको पंजाबी लड़की का रोल दिया गया है ताकि उनकी बेतरतीब हिंदी की कमी कवर हो जाए. (मैडम तुम और तू में कन्फ्यूज रहती हैं). हैरी तंगिरी को आप ‘एम एस धोनी – दी अनटोल्ड स्टोरी में’ युवराज का किरदार निभाते देख चुके होंगे. इस बार वो हरियाणवी जाट बने हैं, उनकी एक्टिंग और कॉमिक टाइमिंग दोनों ठीक है, अच्छी है. दर्शन जरीवाला बॉलीवुड में आज के युग के बेस्ट पिताजी है, उनकी कॉमिक टाइमिंग, डायलॉग डिलीवरी या फिर एक्सप्रेशंस सब ‘अति-उत्तम’ है. इन्हें आप ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ में रणबीर के पिता बने भी देख चुके होंगे. श्रुति की बहन बनी रीना अगरवाल ओवेराक्टिंग की दुकान हैं. निनद कामत श्रुति के भाई बने है, कॉमिक टाइमिंग इनकी भी अच्छी है. गुलशन ग्रोवर और रंजीत का छोटा-छोटा सा रोल है जिसे इग्नोर करना असंभव है. गुलशन ग्रोवर की एंट्री बिलकुल साउथ इंडियन फिल्मों जैसी है, जब वो आते हैं तो सब गायब हो जाते है, बैकग्राउंड म्यूजिक बजने लगता है, सब डरने लगते हैं. अब बात, इस फिल्म के दूसरे स्टार गौतम गुलाटी की जो शायद टीवी पर बहुत बड़ा नाम हों, पर इस फिल्म में वेस्टेज या लगेज से ज्यादा कुछ नहीं है.
कुलमिलाकर एक्टिंग सबकी ज़ोरदार है, असरदार और हंसाने के लिए पर्याप्त है.
डायरेक्शन/स्क्रीनप्ले

अजय पन्नालाल की डायरेक्ट की हुई ये पहली फिल्म है, फिल्म की स्क्रिप्ट भी विनीत व्यास ने ही लिखी है. डायरेक्शन अच्छा है, स्क्रीनप्ले के लिए भी डिट्टो शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं, फिल्म कुलजमा दो घंटे की है फिर भी कुछ जगह स्क्रिप्ट ढीली लगती है. लेकिन कहीं-कहीं इतनी कसी है कि सीट से हिल न पायें.
लेकिन अच्छी स्क्रिप्ट और पहले डायरेक्शन को देखते हुए पूरे नंबर देना अनुचित न होगा.

म्यूजिक/लिरिक्स 

ऊंट-पटांग और बेतुके म्यूजिक से फिल्म लैस है. इसमें ऋषि रिच, (मुझे भी कार्टून रिची रिच का नाम याद आया था), कौशिक-आकाश-गुड्डू, जयवेद कुमार और यो यो हनी सिंह नामक संगीतकारों ने मिलकर लस्सी बनाई हैं. हर फिल्म में अरिजीत सिंह का एक गाना होता है, इसमें भी है, पर बेअसर है. हाँ, जागरण में एक ‘तैनू काला चश्मा’ का पैरोडी वर्शन जबरदस्त बना है.

संवाद 

फिल्म के डायलॉग्स फिल्म की बैक बोन हैं. ये भी विनीत व्यास के लिखे हैं. जहाँ एक तरफ बहुतेरी फिल्म्स वल्गर डायलॉग्स से काम चलाने की कोशिश करती हैं वहीँ इस फिल्म में व्यंग और कटाक्ष से गुदगुदाया है. “आज कल बच्चे माँ का दूध नहीं मोबाइल का दूध पीते हैं”,
“मोहल्ले की लड़कियां या तो माँ-बहन होती हैं”
“काश ये रात कभी न ख़त्म हो, तुम हम और दादी की लाश, युगों तक ऐसे ही पड़ी रहे”
“बेटा, प्रेसिडेंट बनना हो तो वार करानी ही पड़ती है” (सामने सीनियर और जूनियर बुश का पोस्टर लगा है)
ऐसे ही दर्जनों संवाद हैं जो हँसाने, गुदगुदाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर देंगे.

क्लाइमेक्स 

अंत सोच के हिसाब से हल्का है, सारी फिल्म राजकुमार राव बोलता कम और हकलाता ज्यादा है लेकिन अंत में आकर भड़ास निकालता है. अंत बिना किसी तेज़ मसाले के है जो कि मसाला फिल्म के लिहाज से थोड़ा हल्का पड़ जाता है.

फिल्म देखने की वजह?

हल्की फुल्की सी फिल्म, सबकी अच्छी एक्टिंग, कॉमेडी के साथ-साथ सटायर का तड़का और हर मोहल्ले की भारी मुसीबत कि ‘पड़ोस की लड़की तो तुम्हारी बहन है’ पर फिल्म देखना चाहें तो घाटे का सौदा नहीं होगा. (वैसे भी राबता और ममी तो डब्बा साबित हो रही हैं)
फिल्म न देखने का बहाना? – बड़े स्टार का न होना, टिकेट रेट भी कम न होना, अच्छे गाने भी नहीं और… और कोई बहाना नहीं!
Rating – 7.5*/10
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ये तो थी प्रोफेशनल बातें! अब फिल्म का समाज पर पड़ता असर भी तो देखें क्या होता है. हमारे समाज में लड़कों के छेड़ने पर बहन बनाना सिखाया जाता है न कि दोस्त बनाना. लड़का अगर एन आर आई है तो वो सर्व गुण संपन्न मान लिया जाता है. लड़की को देखने आए लड़के वाले, उसे गवा के, चला फिरा के, पूरी तसल्ली कर के चेक करते हैं जैसे वो नई वाशिंग मशीन ले रहे हों. पैसे के आगे बड़ी से बड़ी मुहब्बत हार सकती है (जैसे श्रुति गौतम की तरफ खिचने लग जाती है) और आखिरी बात, अपने बच्चों को इतना डराया, इतना धमकाया जाता है कि वो कभी खुद से कोई फैसला न ले सकें.
ये सब बीमार समाज की मानसिकता है जिसका इलाज बरसों से चला आ रहा है और हर दिन ये बीमारी पहले से ज्यादा फैलती जा रही है. क्योंकि, बीमारी का इलाज बर्बाद मानसिकता वाले उन लोगों के हाथों में है जिन्हें इस बीमारी से सबसे ज्यादा फायदा है. इसी से उनकी दुकान चलती है.

= रिव्यु कैसा लगा, इसकी खबर मुझतक ज़रूर पहुंचाए.

#सहर

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